
22 अक्टूबर को पिंक सिटी जयपुर में सवाई जयपुर अवॉर्ड्स 2026 दिए जाने थे. कार्यक्रम में शामिल अतिथि वहां एक और कार्यक्रम के लिए जुटे थे. यह कार्यक्रम ब्रिगेडियर सवाई भवानी सिंह की कांस्य प्रतिमा के अनावरण का था. इसके बाद चाय के साथ बातचीत शुरू हुई और लोग उनसे जुड़ी यादें साझा करने लगे.
कुछ लोगों ने उस व्यक्ति को याद किया, जिसे वे जानते थे. वहीं, कुछ ने सैनिक, महाराजा और राजनयिक के रूप में उनके जीवन के बारे में बात की. कछवाहा राजपूत वंश के जयपुर के पूर्व शाही परिवार ने इस प्रतिमा को बनवाया था. इस प्रतिमा ने भवानी सिंह को सम्मान देने के साथ-साथ उन लोगों को भी उनके जीवन से फिर जोड़ दिया जिन्होंने उन्हें करीब से देखा था.
महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय म्यूजियम ट्रस्ट साल 2000 से सवाई जयपुर अवॉर्ड्स दे रहा है. यह पुरस्कार भवानी सिंह के जन्मदिन यानी 22 अक्टूबर को दिए जाते हैं. इस साल जयपुर अपनी 300वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी कर रहा है. यह वर्षगांठ 18 नवंबर को है. ऐसे में प्रतिमा के अनावरण ने इस मौके को एक नया आयाम दिया : एक ऐसा व्यक्ति, जिसका जीवन राजशाही की पुरानी दुनिया और एक बदलते भारत की मांगों के बीच आगे बढ़ा.
इस कांस्य प्रतिमा को हंगरी के कलाकार और परिवार के पुराने दोस्त ग्युला याकाबफी ने बनाया है. इसे जयपुर में तैयार किया गया और इसका रंग-रूप वैसा ही रखा गया, जैसा भवानी सिंह को पसंद था. इसे बनाने की जगह का भी अपना इतिहास है. यह सिटी पैलेस के उस स्टूडियो में बनाई गई जिसका संबंध महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय से था. उन्हें फोटोग्राफी में अपने नए प्रयोगों और अपने समय के लोगों और जीवन को तस्वीरों में दर्ज करने के लिए याद किया जाता है. जिस जगह कभी कला से जुड़ा काम होता था वहां अब सेवा को समर्पित एक जिंदगी की याद में बनाई गई कलाकृति है.

भवानी सिंह को विरासत में मिली जिंदगी आम शाही परिवारों से अलग थी. पिता महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय की मौत के बाद 1970 में उन्होंने उनकी जगह ली. सरकार ने बाद में उनके महाराजा के खिताब को औपचारिक मान्यता दी. इसके बाद राजघरानों के खिताब और उन्हें मिलने वाला प्रिवी पर्स यानी सरकारी भत्ता खत्म कर दिया गया. हालांकि तब तक भवानी सिंह महल से बाहर भी अपनी पहचान बना चुके थे.
भारतीय सेना की खास 10 पैरा यूनिट के कमांडिंग ऑफिसर के तौर पर उन्होंने 1971 की जंग में हिस्सा लिया. बहादुरी के लिए उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. युद्ध खत्म होने के दो हफ्ते के भीतर ही प्रिवी पर्स खत्म कर दिए गए. बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कहने पर उन्होंने श्रीलंका में भी सेवा दी. उन्हें ब्रिगेडियर का पद भी दिया गया.
यह एक दिलचस्प विरोधाभास था. एक तरफ वह शख्स था, जिसे भारत के सबसे बड़े वीरता पुरस्कारों में से एक मिला था. दूसरी तरफ, उसी समय वह राजनीतिक व्यवस्था खत्म हो रही थी, जिसके सहारे रियासतें चलती थीं. भवानी सिंह की जिंदगी ऐसी नहीं थी, जिसमें कोई राजकुमार बदलावों से दूर सुरक्षित जीवन बिताता हो. प्रिवी पर्स खत्म होने के बाद कई पूर्व शाही परिवारों को अपनी संपत्तियों को लेकर कानूनी विवादों का सामना करना पड़ा. जयपुर में भी भवानी सिंह के भाई-बहनों से जुड़े विवादों के बीच कई संपत्तियों पर अदालत की ओर से रिसीवर नियुक्त किए गए.
संपत्ति को लेकर भवानी सिंह की सौतेली मां राजमाता गायत्री देवी के साथ भी उनके और उनके परिवार के रिश्ते मुश्किल दौर से गुजरे. हालांकि यह दूरी उनके जीवन के आखिर तक नहीं रही. गायत्री देवी ने फिर से सिटी पैलेस आना शुरू किया जिससे दोनों परिवारों के बीच रिश्तों में कुछ गर्मजोशी लौटी.
यह इतिहास भवानी सिंह की इकलौती संतान दीया कुमारी के राजनीतिक सफर की पृष्ठभूमि का भी हिस्सा है. वे राजस्थान में दो बार विधानसभा चुनाव और एक बार लोकसभा चुनाव जीत चुकी हैं. अब दीया कुमारी राज्य की उपमुख्यमंत्री हैं. कुछ लोगों की नजर में उनका सार्वजनिक जीवन जयपुर के शाही परिवार की उस विरासत को आगे बढ़ाता है, जिसे लोकतांत्रिक राजनीति के हिसाब से ढाला गया है. इस विरासत का संबंध उनके पिता के साथ-साथ गायत्री देवी से भी है.
भवानी सिंह ने भी चुनावी राजनीति में किस्मत आजमाई थी. उन्होंने 1989 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा लेकिन हार गए. कुछ लोगों का मानना है कि यह हार दिखाती है कि उनके लिए राजनीति में खुद को ढालना कितना मुश्किल था. पूरी जिंदगी उनकी एक अलग पहचान रही थी : एक पूर्व महाराजा और सेना के अधिकारी, जिन पर दोनों पहचान से जुड़ी जिम्मेदारियां तो थीं लेकिन दोनों में से किसी का सुरक्षा कवच उनके पास नहीं था.
उनकी आर्थिक स्थिति भी पहले जैसी नहीं रही थी. अपने पिता की तरह उनके पास उतनी बड़ी रियासत नहीं थी. प्रिवी पर्स खत्म होने और संपत्ति से जुड़े विवादों ने भी उनकी आर्थिक स्थिति पर असर डाला. इसके बावजूद जयपुर के कई लोगों, खासकर राजपूत समुदाय के लोगों के बीच उनके लिए खास सम्मान बना रहा.
दीया कुमारी ने इंडिया टुडे से कहा, "उनके (भवानी सिंह) सामने चुनौतियां थीं." उन्होंने स्ट्रोक आने के बाद भवानी सिंह को हुई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का भी जिक्र किया. वे बताती हैं, "उन्होंने सैनिक के तौर पर देश के लिए बहुत कुछ किया जबकि वे शाही जिंदगी बिता सकते थे. इसके अलावा जो लोग उनके पास कुछ उम्मीद लेकर आते थे, वे उन लोगों के लिए भी जितना कर सकते थे, करते थे."
इस कांस्य प्रतिमा के बाद जयपुर में भवानी सिंह की याद में एक बड़े सार्वजनिक स्मारक को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है. यह पूरी लंबाई वाली प्रतिमा भी हो सकती है. इस चर्चा से गायत्री देवी की वह कोशिश याद आती है जब उन्होंने अपने पति मान सिंह द्वितीय की प्रतिमा किसी सार्वजनिक जगह पर लगवाने की कोशिश की थी. उस समय मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा राजे ने आखिरकार इस सम्मान को संभव बनाया था.
भवानी सिंह के लिए सार्वजनिक स्मारक का सवाल खास मायने रखता है. उन्होंने महाराजा से पूर्व महाराजा बनने का दौर देखा. उनकी जिंदगी शाही विरासत से निकलकर धीरे-धीरे सेवा के लिए समर्पित होती गई. सिटी पैलेस में लगी कांस्य की यह प्रतिमा उनके परिवार और राजनीति में उनकी जगह को लेकर हुए विवादों को खत्म नहीं करती लेकिन यह उनकी जिंदगी के उस पहलू को सामने जरूर लाती है, जिसे उन्हें करीब से जानने वाले कई लोग आज भी याद करते हैं. वह सैनिक, जो शाही जिंदगी की सुख-सुविधाओं के बीच रह सकते थे लेकिन उन्होंने देश और लोगों की सेवा करने का रास्ता चुना.

