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यूपी के लिए BJP की राज्यसभा सूची में दिख रही 2027 से आगे की रणनीति

BJP की राज्यसभा सूची सिर्फ 2027 के यूपी चुनाव की तैयारी नहीं दिखाती. आठ नए चेहरों के जरिए पार्टी ने सामाजिक समीकरण साधने, संगठन को मजबूत करने और आगे की राजनीतिक रणनीति के लिए भी संकेत दिए हैं

BJP meeting UP lok Sabha polls
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)
अपडेटेड 6 अक्टूबर , 2026

जब उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सीटों के लिए BJP के उम्मीदवारों की सूची आखिरकार सामने आई तो सबसे पहले इस बात पर ध्यान गया कि इसमें कौन-कौन नहीं हैं. केंद्रीय कैबिनेट मंत्री हरदीप सिंह पुरी का नाम नहीं है. उनके मंत्री सहयोगी बी.एल. वर्मा भी सूची से बाहर हैं. अरुण सिंह, सीमा द्विवेदी, नीरज शेखर, बृज लाल और गीता शाक्य को भी दोबारा मौका नहीं मिला.

आठवें निवर्तमान राज्यसभा सदस्य दिनेश शर्मा ने सितंबर में ही राज्यसभा सीट से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद उन्होंने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के उपराज्यपाल के रूप में शपथ ली. यानी इन आठ में से कोई भी वापस नहीं आ रहा है.

इनकी जगह BJP ने धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार को चुना है. इनमें से कुछ ही नाम उत्तर प्रदेश से बाहर जाने जाते हैं. और यही इस सूची की रणनीति का हिस्सा था.

अगले कुछ दिनों में पार्टी इस सूची को समावेशी प्रतिनिधित्व की कवायद के तौर पर पेश करेगी. इसमें तीन OBC हैं: एक लोध, एक पाल और एक कुर्मी. दो दलित, दो ब्राह्मण और एक राजपूत हैं. आठ में से दो महिलाएं हैं. यह विवरण सही है लेकिन इससे इस सूची के ज्यादातर मकसद सामने नहीं आते.

निवर्तमान आठ और नए आठ नामों की तुलना करें तो कई समानताएं साफ दिखती हैं. दो ब्राह्मण, द्विवेदी और शर्मा, की जगह दो ब्राह्मण ओझा और पांडेय आए हैं. दो महिलाएं बाहर गईं और दो महिलाएं आईं. लोध सीट लोध के पास ही रही. वर्मा की जगह धर्मपाल सिंह को चुना गया है, जो आंवला से पांच बार विधायक रह चुके हैं और योगी आदित्यनाथ सरकार में पशुपालन एवं दुग्ध विकास मंत्री हैं. यह चुनाव अपने आप में काफी कुछ बताता है.

प्रियंका सिंह रावत पासी समुदाय से आती हैं (फाइल फोटो)
प्रियंका सिंह रावत पासी समुदाय से आती हैं (फाइल फोटो)

इसके अलावा जो बदलाव हुए हैं, वे ज्यादा दिलचस्प हैं. वरिष्ठ बरेली नेता संतोष गंगवार की बेटी श्रुति गंगवार के जरिए रोहिलखंड को एक कुर्मी चेहरा मिला है. BJP के प्रदेश OBC मोर्चा के प्रमुख प्रकाश पाल, पाल समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं. एक दूसरी दलित सीट भी जोड़ी गई है. इसके बदले पार्टी ने अपनी दो ठाकुर सीटों में से एक, अपने शाक्य प्रतिनिधि और अपना एकमात्र राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना जाने वाला नाम पुरी को छोड़ दिया है.

इनमें से कुछ भी संयोग नहीं है. कुर्मी और पाल जैसी छोटी पिछड़ी जातियां वे समुदाय थे जहां समाजवादी पार्टी (SP) प्रमुख अखिलेश यादव के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे ने 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया था. अब पार्टी सीधे इन समुदायों पर ध्यान दे रही है. गीता शाक्य को हटाना ज्यादा जोखिम वाला फैसला है. मध्य उत्तर प्रदेश में शाक्य-मौर्य-कुशवाहा वोट ऐसा नहीं है जिसे BJP अपने पक्ष में तय मान सकती है. पार्टी के स्थानीय नेता जानना चाहेंगे कि उसकी सीट क्यों चली गई.

चुनाव में भौगोलिक पैटर्न भी नजर आता है. आठ में से दो, धर्मपाल सिंह और श्रुति गंगवार बरेली जिले से आते हैं. इसमें चौहान को पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभार मिलने को जोड़ें तो सूची का झुकाव रोहिलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तरफ ज्यादा है. 2024 में SP ने इन इलाकों में BJP की पकड़ में सेंध लगाई थी. ऐसा लगता है कि पार्टी ने तय किया है कि इस इलाके पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है.

ठाकुर प्रतिनिधित्व में कटौती ज्यादा सावधानी से की गई है. सूची में एकमात्र राजपूत राम प्रताप सिंह चौहान को अगस्त में ही पार्टी के पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र का प्रभारी बनाया गया था. यही वह इलाका है जहां पिछले लोकसभा चुनाव से पहले टिकट बंटवारे को लेकर ठाकुरों की नाराजगी खुलकर सामने आई थी. उन्हें दिल्ली भेजने का मकसद उन दो ठाकुर सांसदों की जगह भरना है जो पहले यह काम कर रहे थे.

हरदीप सिंह पुरी मोदी सरकार के अकेले सिख चेहरे रहे हैं (फाइल फोटो)
हरदीप सिंह पुरी मोदी सरकार के अकेले सिख चेहरे रहे हैं (फाइल फोटो)

धर्मपाल सिंह के राज्यसभा जाने का असर लखनऊ में भी पड़ेगा. उनके निर्वाचित होते ही उन्हें आंवला सीट और व्यावहारिक तौर पर राज्य मंत्रिमंडल में अपना पद छोड़ना होगा. मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 22 मई 2027 को खत्म हो रहा है. ऐसे में सीट खाली होने के बाद करीब सात महीने ही बचेंगे. 

आंवला सीट खाली होने के बाद विधानसभा चुनाव में एक साल से कम समय बचा होगा. ऐसे में चुनाव आयोग (EC) के लिए इस सीट पर उपचुनाव कराना जरूरी नहीं होगा. यानी BJP बिना उपचुनाव लड़े एक मौजूदा विधायक की सीट खाली करा सकती है. वहीं जब BJP चुनाव की तैयारी में जुटी होगी योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल में एक पद खाली हो जाएगा.

यह सूची उन नेताओं के लिहाज से भी अहम है जिन्हें जगह नहीं मिली. दोनों दलित उम्मीदवार जाटव नहीं हैं. 2014 में बाराबंकी से चुनाव जीत चुकीं प्रियंका सिंह रावत पासी हैं. पासी उत्तर प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा दलित समुदाय है और इसकी बड़ी आबादी अवध में है. पूर्व लोकसभा सांसद विद्यासागर सोनकर BJP के दलित संपर्क अभियान के पुराने नेता हैं. दोनों चयन BJP की उस पुरानी रणनीति के अनुरूप हैं, जिसमें गैर-जाटव दलितों को प्राथमिकता दी जाती रही है.

अभी यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP) की स्थिति कमजोर है. BSP का लोकसभा में कोई सांसद नहीं है. अगस्त में उमाशंकर सिंह के निधन के बाद उत्तर प्रदेश में उसका एकमात्र विधायक भी नहीं रहा. पार्टी की तरफ से अकेले राज्यसभा सदस्य रामजी गौतम नवंबर में रिटायर हो रहे हैं. तीन दशक से ज्यादा समय में पहली बार जाटव वोट वास्तव में खुले तौर पर दूसरे दलों के लिए उपलब्ध नजर आ रहा है. इसके बावजूद BJP ने इन आठ सीटों के जरिए उसे अपने पक्ष में लाने की कोशिश नहीं की है.

सूची में कोई जाट भी नहीं है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों को ध्यान में रखते हुए संजीव बालियान का नाम प्रदेश स्तर की सूची में था लेकिन उन्हें भी हटा दिया गया. BJP फिलहाल इस समुदाय को अपने सहयोगी राष्ट्रीय लोक दल (RLD) के लिए छोड़ती दिख रही है.

योगी सरकार के मंत्री धर्मपाल सिंह को भी BJP ने राज्यसभा उम्मीदवार बनाया है (फाइल फोटो)
योगी सरकार के मंत्री धर्मपाल सिंह को भी BJP ने राज्यसभा उम्मीदवार बनाया है (फाइल फोटो)

सहयोगी दलों को भी कुछ नहीं मिला. अपना दल, ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP), RLD और निषाद पार्टी इस चुनावी साल में इस दौर से एक भी राज्यसभा सीट के बिना आगे बढ़ेंगे. 16 अक्टूबर को वोटिंग के दिन इसका असर पड़ सकता है क्योंकि BJP आसानी से चुनाव से बच सकती थी लेकिन उसने ऐसा नहीं करने का फैसला किया.

जीत के लिए उम्मीदवार को करीब 37 वोट चाहिए. आंकड़ों के मुताबिक SP अपने दम पर तीसरी सीट नहीं जीत सकती और BJP अपने तय वोटों के बिना आठवीं सीट नहीं जीत सकती. एक अनुमान के मुताबिक BJP को सिर्फ चार वोटों की कमी है. पिछली राज्यसभा चुनाव में बगावत करने वाले विधायकों को अलग कर दें तो SP के पास कांग्रेस समेत 99 विधायक हैं और तीसरी सीट के लिए उसे नौ और वोट चाहिए.

आठ उम्मीदवार उतारने का मतलब है कि BJP इन वोटों को कहीं और से जुटाने का इरादा रखती है. पिछली बार भी उसने ऐसा किया था. फरवरी 2024 में पार्टी के आठवें उम्मीदवार संजय सेठ 43 वोटों के साथ चुने गए थे. उन्हें SP के उन विधायकों की मदद मिली थी जिन्होंने क्रॉस वोटिंग की थी. सेठ को BSP, RLD, SBSP और राजा भैया का भी समर्थन मिला था.

अखिलेश उस दिन को भूले नहीं हैं. इस बार उनकी पार्टी कथित तौर पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के नाराज विधायकों से संपर्क कर रही है. इनमें SBSP भी शामिल है. BJP के सहयोगी दलों को कुछ नहीं मिलने से इन बातचीत का रास्ता और आसान होगा.

इसलिए 16 अक्टूबर का चुनाव आठ सीटों के लिए वोटिंग इस बात की परीक्षा ज्यादा है कि दोनों पक्ष अपने विधायकों को साथ रख पाते हैं या नहीं. अगर BJP आठों सीट जीतती है तो वह 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अभियान में इस संदेश के साथ जाएगी कि SP के विधायकों को एक बार फिर अपने पाले में लाया जा सकता है. अगर SP अपने विधायकों को एकजुट रखती है और NDA की तरफ से कुछ वोट हासिल कर लेती है तो चर्चा सत्तारूढ़ गठबंधन में दरार की होगी. यह सब राज्य में नई सरकार के चुनाव से कुछ ही महीने पहले होगा.

SP के अपने उम्मीदवार इस अंतर को और साफ करते हैं. उसने अपने महासचिव और अखिलेश के चाचा राम गोपाल यादव को उम्मीदवार बनाया है. दूसरे उम्मीदवार गुजरात के कारोबारी धनराज परिमल नाथवानी हैं, जिनके नाम ने पार्टी के कई लोगों को भी चौंकाया. 

जिस पार्टी ने PDA के नारे के सहारे वापसी की, उसने एक यादव और एक कारोबारी को उम्मीदवार बनाया है. इसके उलट BJP ने उत्तर प्रदेश के आठ लोगों को भेजा है जिनमें ज्यादातर पिछड़े या दलित समुदायों से हैं. दोनों सूचियों को साथ रखकर देखें तो BJP की सूची SP की तुलना में PDA के फॉर्मूले से ज्यादा मेल खाती है. BJP के नेता चुनाव प्रचार के दौरान यही बात कह सकते हैं.

इन सभी बदलावों को यह मानना आसान है कि दिल्ली की BJP ने प्रदेश इकाई को ज्यादा स्वतंत्रता दी है. लेकिन सूची तैयार होने का तरीका कुछ ज्यादा जटिल कहानी बताता है. आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कोर कमेटी की बैठक में करीब 20 नामों पर चर्चा हुई थी. प्रदेश इकाई ने इसके बाद संभावित उम्मीदवारों की एक लंबी सूची भेजी थी. इसमें स्मृति ईरानी, हरदीप पुरी, संजीव बालियान और पूर्व AAP नेता कुमार विश्वास के नाम भी शामिल थे. लखनऊ से दिल्ली के बीच हर बड़े नाम को किसी न किसी स्तर पर हटा दिया गया.

इन आठों नेताओं की अपनी राजनीतिक पकड़ सीमित है. वे अपने उभार का श्रेय आखिरकार उन्हीं लोगों को देते हैं, जिन्होंने उन्हें आगे बढ़ाया. यह राज्य स्तर पर पार्टी के प्रबंधन की रणनीति से मेल खाता है. साथ ही यह केंद्रीय नेतृत्व की उस पुरानी शैली को भी दिखाता है जिसमें ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाया जाता है जिनकी राजनीतिक पहचान और तरक्की उसी नेतृत्व की वजह से हुई हो.

धर्मपाल सिंह के मामले को दोनों तरह से देखा जा सकता है. आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल से एक वरिष्ठ मंत्री को राज्यसभा भेजना लंबे समय की सेवा का इनाम हो सकता है. या फिर चुनाव से पहले मुख्यमंत्री की टीम को छोटा करने का तरीका. कौन-सी व्याख्या सही है, यह तब ज्यादा साफ होगा जब यह पता चलेगा कि इन आठ नेताओं में से किसका झुकाव मुख्यमंत्री, संगठन या किसी उपमुख्यमंत्री के खेमे की ओर है. लखनऊ में फिलहाल इसी सवाल पर सबसे ज्यादा नजर है.

पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए संदेश ज्यादा साफ है. प्रकाश पाल OBC मोर्चा चलाते हैं, चौहान एक क्षेत्र का प्रभार संभालते हैं, पांडेय किसान मोर्चा से आते हैं और इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष ओझा के RSS से लंबे समय से संबंध हैं. 

पार्टी ने इस साल अपने छह संगठनात्मक क्षेत्रों का नए सिरे से गठन किया है और बूथ नेटवर्क को मजबूत किया है. अब वह संगठन के लिए काम करने वालों से कह रही है कि यह काम उन्हें संसद तक पहुंचा सकता है. मतदाता आमतौर पर अपने राज्यसभा सांसदों के नाम याद नहीं रखते लेकिन पार्टी कार्यकर्ता इस बात पर नजर रखते हैं कि टिकट किसे मिला.

पुरी का बाहर होना भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल में बन रही एक बड़ी तस्वीर का हिस्सा है. जून में BJP ने 10 राज्यों की 24 राज्यसभा सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम घोषित किए थे. इसमें राजस्थान से राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू और मध्य प्रदेश से जॉर्ज कुरियन को दोबारा मौका नहीं दिया गया था. मंत्रिपरिषद में अकेले ईसाई मंत्री कुरियन ने 21 जून को कार्यकाल खत्म होने के दो दिन बाद इस्तीफा दे दिया. 

बिट्टू संविधान में गैर-सांसद मंत्री के लिए दी गई छह महीने की समयसीमा के तहत एक और महीने पद पर रहे और फिर 24 जुलाई को इस्तीफा दे दिया. पार्टी ने संकेत दिया था कि वह अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें पंजाब में वापस चाहती है. अगले ही दिन धर्मेंद्र प्रधान ने NEET-UG पेपर लीक के दबाव में शिक्षा मंत्री पद छोड़ दिया.

पुरी का राज्यसभा कार्यकाल 25 नवंबर को खत्म हो रहा है. अगर पार्टी उन्हें किसी दूसरे राज्य से सीट नहीं दिलाती है तो वह प्रधान के बाद मोदी सरकार 3.0 छोड़ने वाले दूसरे कैबिनेट मंत्री हो सकते हैं. दोनों के हालात बिल्कुल अलग हैं. 

प्रधान ने कई हफ्तों तक चले छात्रों के विरोध के दबाव में पद छोड़ा था. पुरी इसलिए जा सकते हैं क्योंकि पार्टी ने उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजने का रास्ता नहीं खोला. इस साल के उदाहरण बताते हैं कि फैसला होने के बाद BJP ज्यादा इंतजार नहीं करती. कुरियन ने दो दिन में इस्तीफा दिया और बिट्टू ने एक महीने में. राज्य मंत्री बी.एल. वर्मा के सामने भी यही गणित है.

इसमें पंजाब का एक पहलू भी है जिसे दिल्ली में नजरअंदाज नहीं किया गया होगा. 9 जून 2024 को शपथ लेने वाली केंद्रीय मंत्रिपरिषद में पुरी और बिट्टू ही दो सिख मंत्री थे. बिट्टू के जाने के बाद पुरी सरकार के अकेले सिख मंत्री हैं. अगर वे भी चले जाते हैं तो केंद्र सरकार अगले साल होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में मंत्रिमंडल में एक भी सिख चेहरे के बिना जाएगी. यह चूक है या रणनीति, इस पर पार्टी से सवाल जरूर पूछा जाएगा.

उत्तर प्रदेश में इस फैसले से मिलने वाले चुनावी फायदे को लेकर संदेह की भी वजह है. BJP पहले भी ऐसा कर चुकी है. उत्तर प्रदेश से 2024 की उसकी राज्यसभा सूची भी इसी तरह संतुलित थी. इसमें आर.पी.एन. सिंह को कुर्मी चेहरे के तौर पर पेश किया गया था. अमरपाल मौर्य, संगीता बलवंत और दूसरे नाम भी शामिल थे. कुछ ही महीनों बाद पार्टी उत्तर प्रदेश के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारी, जिसमें कुर्मी बहुल सीटें भी शामिल थीं.

बड़े पैमाने पर बदलाव की भी मिसाल मौजूद है. 2024 में BJP ने उत्तर प्रदेश के सभी निवर्तमान सदस्यों को दूसरी बार मौका नहीं दिया था. सिर्फ सुधांशु त्रिवेदी को दोबारा चुना गया. इस साल जून में जिन राज्यों में चुनाव हुए वहां भी पार्टी ने सभी मौजूदा सांसदों को हटा दिया. इस बार का फर्क यह है कि बदलाव का असर दिल्ली और लखनऊ, दोनों के मंत्रिमंडल तक पहुंच गया है.

फिलहाल 6 अक्टूबर की नामांकन की अंतिम तारीख से पता चलेगा कि SP वास्तव में तीसरा उम्मीदवार उतारती है या नहीं. इसके बाद प्रथम वरीयता के वोटों और इस बात पर नजर होगी कि सहयोगी दलों का हर विधायक मतदान के लिए पहुंचता है और BJP की उम्मीद के मुताबिक वोट करता है या नहीं. 

आठ नाम 2027 की शुरुआत में होने वाले चुनाव को ध्यान में रखकर चुने गए हैं लेकिन रणनीति की पहली परीक्षा 16 अक्टूबर को होगी और इसमें करीब 400 विधायकों की भूमिका होगी.

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