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यूपी चुनाव के लिए BJP की नई टीमें तैयार होते ही विवाद भी शुरू

2027 के यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारी में BJP ने छह क्षेत्रीय टीमें बनाईं लेकिन जातीय और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर ऐलान के साथ ही कई जगह सवाल और नाराजगी सामने आ गई

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रदेश BJP अध्यक्ष पंकज चौधरी (फाइल फोटो)
अपडेटेड 7 सितंबर , 2026

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से करीब एक साल पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने आखिरकार अपनी छह क्षेत्रीय टीमों की घोषणा कर दी है. 3 सितंबर को हुई इन घोषणाओं के साथ पार्टी ने संगठन के उस महत्वपूर्ण हिस्से को भी चुनावी मोड में ला दिया है, जिसे करीब छह साल बाद नए सिरे से गठित किया गया है. 

पश्चिम, ब्रज, कानपुर-बुंदेलखंड, अवध, काशी और गोरखपुर की नई क्षेत्रीय टीमें अब 2027 विधानसभा चुनाव के साथ 2029 लोकसभा चुनाव की तैयारियों को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी संभालेंगी. दिलचस्प यह है कि इन टीमों की घोषणा 15 दिन में करने का दावा किया गया था लेकिन छह क्षेत्रीय अध्यक्षों की घोषणा के करीब दो महीने बाद जाकर तस्वीर साफ हुई. 

25 जून को क्षेत्रीय अध्यक्षों की घोषणा हुई थी और 4 जुलाई को लखनऊ पहुंचे BJP के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बीएल संतोष ने 15 दिनों में क्षेत्रीय टीम और मोर्चों के गठन की बात कही थी. इसके बावजूद नाम तय करने में लंबा समय लगा. पार्टी के भीतर पैरोकारी, स्थानीय दावेदारी और जातीय-सामाजिक संतुलन साधने की कवायद ने संगठन की रफ्तार धीमी की.

टीमों का आकार बढ़ा

BJP की नई क्षेत्रीय कार्यकारिणियों का सबसे पहला संदेश संगठन के विस्तार का है. पार्टी ने पिछली टीमों के मुकाबले क्षेत्रीय स्तर पर जिम्मेदारियों का दायरा बढ़ाया है. कई क्षेत्रों में चार महामंत्री, दस उपाध्यक्ष और दस मंत्री बनाए गए हैं. इससे क्षेत्रीय नेतृत्व को अधिक लोगों को साथ लेकर चलने और अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने का अवसर मिलेगा. 

गोरखपुर की टीम 39 पदाधिकारियों और सदस्यों के साथ सबसे बड़ी टीमों में है जबकि अवध की टीम 34 सदस्यीय है. यह विस्तार महज संगठनात्मक जरूरत नहीं है. चुनावी राजनीति में क्षेत्रीय टीमें प्रदेश नेतृत्व और जिलों के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होती हैं.

CM योगी के गृहक्षेत्र गोरखपुर की क्षेत्रीय टीम सबसे बड़ी है (फाइल फोटो)
CM योगी के गृहक्षेत्र गोरखपुर की क्षेत्रीय टीम सबसे बड़ी है (फाइल फोटो)

इनके जरिए मंडल, जिला और बूथ स्तर तक पार्टी के कार्यक्रम, सरकार की योजनाएं और चुनावी संदेश पहुंचते हैं. इसलिए 2027 के लिए बनी ये टीमें वास्तव में टिकट वितरण से पहले की सामाजिक और राजनीतिक जमीन तैयार करेंगी. BJP के भीतर संगठन विस्तार को 2024 लोकसभा चुनाव के बाद की रणनीतिक जरूरत के तौर पर देखा जा रहा है. यानी करीब दो महीने की देरी के बावजूद पार्टी ने जो ढांचा खड़ा किया है, उसका असली लक्ष्य संगठन को चुनावी मशीनरी में बदलना है.

हर इलाके में अलग सामाजिक गणित

सभी छह क्षेत्रों की टीमों को एक साथ देखने पर BJP की सोशल इंजीनियरिंग की तस्वीर ज्यादा स्पष्ट होती है. प्रदेश संगठन में ओबीसी को महत्व देने की रणनीति अब क्षेत्रीय टीमों में भी दिखाई दे रही है. खासकर महामंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर पिछड़ी जातियों के चेहरों को आगे किया गया है. 

कानपुर क्षेत्र में राजेश पटेल, काशी में कविता पटेल, ब्रज में राजेश्वर पटेल और अवध में अवधेश कटियार को महामंत्री बनाए जाने को कुर्मी समाज तक पहुंच मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 में BJP के सामने केवल अपने परंपरागत समर्थकों को बनाए रखने की चुनौती नहीं है, बल्कि विपक्ष के पीडीए सामाजिक समीकरण को काटने की भी चुनौती है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सामाजिक गणित और ज्यादा जटिल है. यहां जाट, गुर्जर, सैनी, त्यागी, राजपूत, दलित और वैश्य मतदाताओं का अपना-अपना प्रभाव है. नई टीम में सैनी समाज के कई चेहरों को जगह दी गई है. रूपेंद्र सैनी को महामंत्री, प्रदीप सैनी को उपाध्यक्ष, कुमुदिनी सैनी को मंत्री और कृष्णचंद सैनी को सदस्य बनाया गया है. 

इस तरह पार्टी ने एक ही क्षेत्र में कई प्रभावशाली ओबीसी समूहों को साधने का प्रयास किया है. पश्चिम क्षेत्र के नए अध्यक्ष नवाब सिंह नागर को पहले ही गुर्जर समाज के प्रमुख चेहरे के तौर पर देखा गया था. उनकी नियुक्ति को राजनीतिक विश्लेषकों ने पश्चिमी यूपी में गुर्जर समीकरण को साधने की कोशिश बताया था. 

गोरखपुर क्षेत्र की टीम BJP की व्यापक रणनीति को समझने का एक अहम उदाहरण है. 39 सदस्यीय टीम में अध्यक्ष को छोड़कर 25 सवर्ण, 11 पिछड़ा और तीन दलित वर्ग से हैं. ब्राह्मणों की संख्या दस है, जबकि छह क्षत्रिय, पांच भूमिहार, चार कायस्थ और छह वैश्य चेहरों को जगह मिली है.

BJP अपनी क्षेत्रीय टीमों से सपा के PDA की काट भी खोजना चाहती है (सांकेतिक फोटो)
BJP अपनी क्षेत्रीय टीमों से सपा के PDA की काट भी खोजना चाहती है (सांकेतिक फोटो)

 

चौहान, कुशवाहा, सैंथवार और पासवान बेलदार जैसी पिछड़ी और दलित बिरादरियों को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक प्रभाव वाले पूर्वांचल में पार्टी ने एक तरफ पिछड़े और दलित वर्ग को जगह दी है, तो दूसरी तरफ सवर्ण आधार को कमजोर नहीं होने दिया. ब्राह्मणों को दस स्थान मिलना इसका स्पष्ट संकेत है. 

इनके अलावा राहुल श्रीवास्तव और डॉ. सत्येंद्र सिन्हा को महामंत्री, ध्रुव श्रीवास्तव को मंत्री और अनिल कुमार श्रीवास्तव को सदस्य बनाया गया है. पुरानी टीम के छह चेहरों को दोबारा जगह देना भी यह बताता है कि BJP पूरी तरह नए लोगों के भरोसे नहीं जाना चाहती. 

अवध में भी ब्राह्मण प्रतिनिधित्व बढ़ाया गया है. क्षेत्रीय उपाध्यक्ष रहे राजीव मिश्रा को महामंत्री बनाना संगठन के भीतर पदोन्नति के साथ सामाजिक संदेश भी देता है. काशी में पार्टी ने अपेक्षाकृत कम अनुभवी माने जाने वाले अनूप जायसवाल को महामंत्री बनाकर संगठन के भीतर नए चेहरों को बढ़ावा देने का संकेत दिया है. 

काशी की टीम में ब्राह्मण, क्षत्रिय, कायस्थ, वैश्य, पिछड़ा, पटेल, भूमिहार, अनुसूचित जाति, निषाद और राजभर समाज को प्रतिनिधित्व देने का दावा किया गया है.

पश्चिम में ब्राह्मण प्रतिनिधित्व पर सवाल

जहां जातीय संतुलन साधने के प्रयासों की चर्चा है वहीं पश्चिमी यूपी की टीम सबसे ज्यादा सवाल भी खड़े करती है. पिछली टीम में महामंत्री रहे हरिओम शर्मा इस बार नई टीम में नहीं हैं. खास बात यह है कि पश्चिम क्षेत्र की नई कार्यकारिणी में किसी ब्राह्मण चेहरे को महामंत्री या उपाध्यक्ष पद नहीं मिला है.

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिमी यूपी में ब्राह्मण मतदाताओं के साथ-साथ शहरी सवर्ण वोट भी कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है. पार्टी के भीतर इसे लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ब्राह्मणों को संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर अपेक्षित प्रतिनिधित्व मिला है. 

दूसरी बड़ी कमी क्षेत्रीय भौगोलिक प्रतिनिधित्व की है. मुरादाबाद और संभल को इस बार पश्चिम क्षेत्र की कार्यकारिणी में स्थान नहीं मिला. पिछली टीम में दोनों जिलों की भागीदारी थी. इसके उलट बिजनौर की भागीदारी दो से बढ़कर तीन हो गई. रामपुर, जो पिछली कार्यकारिणी में बाहर था, इस बार जगह पाने में सफल रहा. 

मुरादाबाद की ओर से स्थानीय असंतोष का स्वर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि क्षेत्रीय अध्यक्ष नवाब सिंह नागर इस जिले के प्रभारी रह चुके हैं. ऐसे में स्थानीय संगठन को उम्मीद थी कि मुरादाबाद की भागीदारी बढ़ेगी. लेकिन क्षेत्रीय टीम में केवल बिलारी की गीता शर्मा को सदस्य के रूप में जगह मिल सकी. 

ब्रज क्षेत्र की टीम में पार्टी को सबसे सीधा विरोध झेलना पड़ा है. 3 सितंबर को सूची जारी होने के बाद ही सोशल मीडिया पर BJP के भीतर से नाराजगी के स्वर सामने आए. पुराने कार्यकर्ता राजकुमार पथिक ने चाटुकारिता को लेकर टिप्पणी की. अग्रवाल समाज से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी प्रतिनिधित्व कम होने पर नाराजगी जताई.

नई ब्रज टीम में 37 पद हैं. आगरा को दस स्थान मिले हैं. अशोक पिप्पल को मंत्री से महामंत्री बनाकर दलित सामाजिक आधार के बीच संगठन की पहुंच मजबूत करने का संकेत दिया गया है. दूसरी तरफ पिछली टीम के उपाध्यक्ष अवधेश रावत और कोषाध्यक्ष वीरेंद्र अग्रवाल को इस बार सदस्य बनाया गया है. महिलाओं की संख्या भी तीन से बढ़ाकर छह की गई है. 

यही विरोधाभास नई टीमों की सबसे बड़ी चुनौती है. पार्टी ने सामाजिक प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ाया, लेकिन जिन समूहों को लगता है कि उनके प्रभाव के मुकाबले हिस्सेदारी कम हुई है, उनकी नाराजगी भी सामने आ गई. 

लखनऊ में बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुशील पांडेय कहते हैं, “BJP ने इस बार दो स्तरों पर काम किया है. पहला, अपने पारंपरिक सवर्ण आधार को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया. दूसरा, गैर-यादव ओबीसी और दलित बिरादरियों को लगातार संगठन में हिस्सेदारी देकर सामाजिक आधार विस्तार की कोशिश की. महिलाओं और युवाओं को शामिल कर नई पीढ़ी के मतदाताओं तक पहुंच बनाने का प्रयास भी दिखता है.” 

यह रणनीति 2024 के लोकसभा चुनाव के अनुभव से भी जुड़ी है. BJP के सामने अब केवल अपने मजबूत हिंदुत्व और संगठनात्मक ढांचे को बनाए रखने की चुनौती नहीं है बल्कि विपक्ष के सामाजिक गठजोड़ को तोड़ने की भी चुनौती है.

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