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चार मौतों ने फिर खोली बिहार में शराबबंदी की पोल

बिहार में शराबबंदी के 10 साल बाद भी शराब की तस्करी और अवैध कारोबार जारी है. चार लोगों की मौत ने कानून के अमल और शराब के नेटवर्क पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं

एक मृतक के परिजन
अपडेटेड 14 सितंबर , 2026

अगस्त के आखिरी रविवार को पटना जिले के बाढ़ थाना क्षेत्र के बेढ़ना गांव में चार लोग एक साथ बैठकर शराब पी रहे थे. चारों राजमिस्त्री थे और पड़ोसी होने के साथ-साथ दोस्त भी थे. उनमें से एक ने मछली और शराब के साथ खाने के लिए अपनी मां से चावल भी पैक करवाया था.

शराब पीने के कुछ ही मिनट बाद चारों अचानक गिर पड़े और उनके मुंह से झाग निकलने लगा. तीन लोगों को बाढ़ अस्पताल पहुंचाया गया लेकिन चारों की जान चली गई.

अगले दिन गंगा किनारे सती स्थान घाट पर चारों का एक साथ अंतिम संस्कार किया गया. उनकी चिताएं एक साथ जलीं. उनके कमरे से शराब की एक खुली बोतल भी मिली. इस घटना से गांव के लोगों में गुस्सा और डर दोनों था. पुलिस ने कमरे को सील कर दिया और जांच के लिए वहां मिले नमूने फोरेंसिक लैब भेज दिए गए.

दो दिन के अंदर ही इस घटना को लेकर अलग-अलग बातें सामने आने लगीं. गांव के पुलिस अधिकारियों का कहना था कि एक युवक इस बात से नाराज था कि उसकी बहन का रिश्ता शराब पीने वाले एक युवक के साथ था. पुलिस के मुताबिक, उसने शराब में जहर मिलाकर चारों को पिला दिया.

वहीं कुछ लोगों का कहना था कि पड़ोसी राज्य से तस्करी करके लाई गई इंडियन मेड फॉरेन लिकर (IMFL) में केमिकल मिलाया गया हो सकता है. ऐसा होने पर शराब जहरीली हो गई होगी. कुछ लोगों को चारों की इतनी जल्दी हुई मौत सायनाइड के जहर से हुई मौत जैसी लगी. विसरा रिपोर्ट से मौत की असली वजह पता चलेगी लेकिन इससे इस घटना को लेकर चल रही बहस खत्म नहीं होगी.

वैसे इन लोगों को शराब पीने के लिए बैठना ही नहीं चाहिए था. बिहार में अप्रैल 2016 में शराब बनाने, बेचने, ले जाने और पीने पर रोक लगा दी गई थी. शराबबंदी के दस साल बाद भी उस कमरे में शराब की बोतल मिलना बताता है कि बिहार में शराबबंदी के बावजूद शराब लोगों तक पहुंच रही है.

बिहार के सीमावर्ती जिलों में आसानी से शराब की तस्करी होती है (फाइल फोटो)
बिहार के सीमावर्ती जिलों में आसानी से शराब की तस्करी होती है (फाइल फोटो)

बेढ़ना कोई ऐसा गांव नहीं है, जिसके बारे में लोग जानते ही न हों. यह पटना जिले के बाढ़ अनुमंडल में है और राज्य सचिवालय से करीब एक घंटे की दूरी पर है. यही सचिवालय पिछले दस साल से बिहार में शराबबंदी लागू करवाने में लगा है. चारों की मौत राजधानी से इतनी दूर नहीं हुई कि उनके शवों को पोस्टमार्टम के लिए पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल भेजा जा सके लेकिन इतनी दूर जरूर हुई कि वहां गैरकानूनी शराब की बोतल आसानी से पहुंच गई.

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी अपने से पहले मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार के समय लागू की गई शराबबंदी को खत्म नहीं कर रहे हैं. उन्होंने पहले शराबबंदी को महिलाओं की भलाई के लिए लिया गया एक बड़ा फैसला बताया था. उनका कहना था कि राज्य की आधी आबादी अब भी शराबबंदी के साथ है. ऐसे में हर साल करीब 20,000 करोड़ रुपए की सरकारी कमाई का नुकसान भी शायद शराबबंदी खत्म करने के लिए काफी नहीं है.

कानून अब भी लागू है लेकिन इसे लागू करने की सख्ती पहले जैसी नहीं रही. फिर भी 9 सितंबर को शराबबंदी लागू करने वाली पुलिस और दूसरी टीमें एक बार फिर कई जगहों पर कार्रवाई करती नजर आईं. गया में एक टीम ने 3,548 लीटर विदेशी शराब ले जा रहे ट्रक को पकड़ा. वैशाली में बलीगांव थाना क्षेत्र के एक पोल्ट्री फार्म से 1,740 लीटर शराब मिली.

सीवान में 1,080 लीटर बीयर ले जा रही पिक-अप गाड़ी पकड़ी गई और दो लोगों को गिरफ्तार किया गया. नवादा के कौआकोल चेकपोस्ट पर एक चार पहिया गाड़ी से 198 लीटर शराब मिली. भागलपुर में पुलिस ने एक ट्रक की जांच की तो उसमें 2,799 लीटर शराब मिली. लखीसराय में एक कार और एसयूवी से 540 लीटर शराब मिली और तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया. इन छह जिलों में उस दिन करीब 10,000 लीटर शराब पकड़ी गई. यह सिर्फ उन्हीं छह जिलों का आंकड़ा है, जो सामने आया है.

भागलपुर से सीवान तक और गया की सड़क से लेकर वैशाली के पोल्ट्री फार्म तक, पूरे बिहार में शराबबंदी लागू कराने के लिए लगातार छापेमारी हो रही है. शराब तस्कर भी लंबे समय से शराब को छिपाकर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के नए-नए तरीके अपनाते रहे हैं. कभी शराब मुर्दाघर ले जाने वाली गाड़ियों में छिपाई गई, कभी दूध के टैंकरों और एंबुलेंस में, तो कभी गाड़ियों के नीचे बनाए गए फर्जी फर्श में छिपाकर ले जाई गई. 9 सितंबर को पकड़ी गई शराब के मामलों में भी शराब छिपाकर ले जाने के ऐसे ही नए तरीके सामने आए. इसके लिए पिक-अप गाड़ी, ट्रक और एसयूवी का इस्तेमाल किया गया.

भारी मुनाफे के चक्कर में लोग शराब तस्करी का जोखिम उठाते हैं (सांकेतिक तस्वीर)
भारी मुनाफे के चक्कर में लोग शराब तस्करी का जोखिम उठाते हैं (सांकेतिक तस्वीर)

गैरकानूनी शराब के कारोबार में कमाई इतनी ज्यादा है कि तस्कर गिरफ्तार होने का खतरा भी उठाने को तैयार हैं. उनके लिए गिरफ्तारी भी इस कारोबार में होने वाले खर्च का हिस्सा बन गई है. शराब के इस गैरकानूनी कारोबार को रोकने के लिए अब तक कितनी बड़ी कार्रवाई हुई है, इसका अंदाजा इन आंकड़ों से लगाया जा सकता है.

2016 से बिहार में 10 लाख से ज्यादा मामले दर्ज हो चुके हैं, 16 लाख से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है, करीब 4.5 करोड़ लीटर शराब जब्त की गई है और करीब 1.6 लाख गाड़ियां जब्त की गई हैं. शराबबंदी लागू करने के लिए बनाई गई व्यवस्था का दायरा भी बढ़ा है. ड्रोन, नाव, स्कैनर, सांस में शराब की जांच करने वाली मशीनें और सीमा पर बने चेकपोस्ट अब इस पूरी व्यवस्था का हिस्सा हैं. इस साल मई तक पुलिस 17.5 लाख लीटर शराब जब्त कर चुकी थी और करीब 57,000 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका था.

जिस नीति को लागू करने के लिए इतनी बड़ी कोशिश करनी पड़ रही है, वह शराब पीने की उस आदत को खत्म नहीं कर पाई, जिसे रोकने के लिए यह नीति लाई गई थी. इसके बजाय शराबबंदी ने इसी लड़ाई को और मुश्किल एवं थका देने वाला बना दिया है. हर बार शराब पकड़ा जाना एक जीत है, लेकिन साथ ही यह भी बताता है कि शराब पहुंचाने का नेटवर्क अब भी चल रहा है.

घरों से मिले आंकड़े भी यही बताते हैं. 2023-24 में किए गए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 के मुताबिक, बिहार में 15 साल और उससे ज्यादा उम्र के 16.5 फीसदी पुरुष अब भी शराब पीते हैं. पिछली बार केंद्र सरकार की ओर से किए गए सर्वे में यह आंकड़ा 15.4 फीसदी था. ग्रामीण बिहार में 17.1 फीसदी पुरुष शराब पीते हैं, जबकि शहरों में यह आंकड़ा 12.8 फीसदी है. महिलाओं में शराब पीने वालों का आंकड़ा 0.4 फीसदी है.

ये आंकड़े बताते हैं कि शराब पीना खत्म नहीं हुआ है, बस लोग अब दूसरे रास्तों से शराब तक पहुंच रहे हैं. सबसे ज्यादा शराब पीने वाले लोग उन दक्षिणी जिलों में हैं, जिनकी सीमा शराब बनाने वाले राज्य झारखंड से लगती है. इनमें गया, जहानाबाद, नवादा, जमुई, औरंगाबाद, नालंदा और पटना शामिल हैं.

यहां इन जिलों की जगह भी बहुत मायने रखती है. उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल में शराब खुले तौर पर बिकती है. नेपाल के साथ बिहार की 800 किलोमीटर लंबी सीमा है, जहां से लोग रोज काम और पूजा के लिए आते-जाते हैं और अगर चाहें तो शराब पीने के लिए भी जा सकते हैं.

सिर्फ एक राज्य में शराब पर रोक लगाकर शराब आने-जाने के इन सभी रास्तों को बंद नहीं किया जा सकता. शराबबंदी के पीछे की सामाजिक वजहों के चलते ही यह कानून अब भी जारी है. कई महिलाओं का मानना है कि शराब की वजह से घर में हिंसा होती है, घर की कमाई खत्म हो जाती है और कर्ज बढ़ जाता है. इसलिए उससे बढ़ने वाले कर्ज से जोड़कर देखती हैं. उनके लिए सरकार का शराब की दुकानें दोबारा न खोलने का फैसला यह दिखाता है कि सरकार इस सामाजिक समस्या को गंभीरता से ले रही है.

यही एक वजह है कि बिहार के पहले बीजेपी मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शराबबंदी को बदलने के बजाय इसे जारी रखना चुना है. इस साल नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की एक रिपोर्ट में शराबबंदी खत्म करने की मांग की गई. रिपोर्ट में कहा गया कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा में कमी नहीं आई है और गैरकानूनी शराब के कारोबार ने सरकार को होने वाली कमाई को भी कम कर दिया है. चौधरी ने इसका जवाब देते हुए तीन बातें सामने रखीं- महिलाओं की चिंता, नीतीश की शराबबंदी और 2030 में अपने फैसले का जवाब देने का वादा.

शराबबंदी से पहले बिहार में शराब से सरकार को काफी कमाई होती थी, जैसा दूसरे राज्यों में भी होता है. शराबबंदी के बाद बिहार ने शराब से मिलने वाली टैक्स की कमाई खो दी और इसके बदले पुलिस पर काम का बोझ इतना बढ़ गया कि उसका असर अब अदालतों पर भी पड़ रहा है. शराब पीने वालों, शराब ले जाने वालों और छोटे स्तर पर शराब बेचने वालों के मामले अदालतों में बढ़ते जा रहे हैं.

जेल के आंकड़ों में शराब पीने वाले गरीब लोगों की संख्या ज्यादा है, जबकि शराब रखने या उसकी सप्लाई करने वाले बड़े लोगों की संख्या कम दिखाई देती है.

फिर बात आती है गैरकानूनी शराब की. इसमें मिलावट जानलेवा साबित हो सकती है. अप्रैल में पूर्वी चंपारण में जहरीली शराब पीने से कम से कम पांच लोगों की मौत हो गई. एक थाने के प्रभारी को निलंबित कर दिया गया. अधिकारियों के मुताबिक, इस साल मार्च तक जहरीली शराब से 354 लोगों की मौत हो चुकी थी और इसके बाद भी ऐसी मौतें हुई हैं. विपक्ष का कहना है कि जहरीली शराब से मरने वालों की संख्या इससे भी ज्यादा है.

शराबबंदी के बाद भी दूसरे नशीले पदार्थों का इस्तेमाल कम नहीं हुआ है. कोडीन वाली सिरप, गांजा, अफीम, हेरोइन और इंजेक्शन से लिए जाने वाले नशीले पदार्थों का इस्तेमाल भी कुछ जगहों पर बढ़ा है, जहां पहले शराब की दुकानें हुआ करती थीं.

अब कई लोगों का एक ही सुई इस्तेमाल करना भी HIV/AIDS के फैलने का डर बढ़ा रहा है. यह उस राज्य में हो रहा है, जहां एक दशक से भी ज्यादा समय पहले शराबबंदी इस सोच के साथ लागू की गई थी कि इससे घर-परिवार शराब के नुकसान से बचेंगे.

बेढ़ना की यह घटना शराबबंदी के इन दस सालों से अलग नहीं है. इस एक कमरे की घटना में शराबबंदी के पूरे दस साल की कहानी दिखाई देती है. चारों लोगों ने देसी शराब पी थी, मिलावटी IMFL पी थी या किसी निजी दुश्मनी के चलते जहर मिला हुआ पेय पी लिया था, यह जांच से साफ होगा लेकिन इतना तय है कि उन्होंने शराब उसी बाजार से हासिल की, जिसे खत्म करने में राज्य ने इतने साल लगा दिए हैं.

लाइसेंस वाली शराब की दुकान में खराब बोतल का नाम-पता होता है और उसके लिए जिम्मेदारी तय की जा सकती है लेकिन शराबबंदी वाले राज्य में वही बोतल एक अंतिम संस्कार, एक नई कहानी और एक और एफआईआर की वजह बन जाती है. सरकारी कागजों में बिहार अब भी शराबबंदी वाला राज्य है, लेकिन सीमाओं से शराब लगातार आ रही है, छापेमारी भी जारी है और वह कारोबार भी चल रहा है, जिसे खत्म करने की कोशिश की गई थी.

गंगा किनारे एक साथ जली चार चिताएं बिहार की शराबबंदी की उस सच्चाई को सामने लाती हैं, जहां कार्रवाई होती तो है लेकिन कई बार बहुत देर से.

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