
“नीतीश जी का तो ऐसा है कि हर तीसरे-चौथे दिन कुछ ऐसा बोल या कर देते हैं कि उनके बीजेपी के साथ जाने की खबरें चलने लगती हैं. वे शायद ऐसा करके सोचते हैं, इस तरह वे कांग्रेस से मोलभाव कर लेंगे या इंडिया गठबंधन में कुछ बड़ा हासिल कर लेंगे. मगर यही उनकी कमजोरी भी है, इसी वजह से गठबंधन के दूसरे दलों, यहां तक कि कांग्रेस को भी भरोसा नहीं हो पाता उन पर. डर लगा रहता है कि उनको संयोजक बना दिया जाये और वे किसी रोज गठबंधन छोड़कर चले जाएं.” कांग्रेस के एक सीनियर लीडर ने ऑफ द रिकार्ड बातचीत में जब यह कहा तो उससे उनकी पार्टी और नीतीश के बीच के अंतर्संबंधों का पता चल रहा था.
दरअसल 19 अक्तूबर, 2023 को मोतिहारी में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सीधा यूपीए-1 की सरकार पर हमला बोल दिया था. वे महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बोल रहे थे. अपने ग्यारह-बारह मिनट के संबोधन में वे ज्यादातर वक्त यही बोलते रहे कि यूपीए-1 सरकार मोतिहारी में केंद्रीय विवि बनाने के लिए तैयार नहीं थी, उस वक्त के शिक्षा मंत्री (कपिल सिब्बल) गया में केंद्रीय विवि बनवाना चाहते थे, तमाम कोशिशों को बाद भी वे उनकी बातें मानने के लिए तैयार नहीं थे. बातों-बातों में उन्होंने सभागार में बैठे भाजपा नेताओं को अपना साथी बता दिया और यह भी कह दिया कि 'हमारा आपका संबंध कभी खत्म नहीं होगा'.
कांग्रेस पर हमला और भाजपा से ताउम्र दोस्ती वाले उनके इस बयान के बाद ऐसी राजनीतिक हलचल मची कि उनकी पार्टी के दो सीनियर नेता राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह और अशोक चौधरी को मीडिया में आकर मामला साफ करना पड़ा. अशोक चौधरी ने तो यहां तक कह दिया कि नीतीश राजनीतिक विरोधियों से भी दोस्ती निभाते हैं, इसलिए सरकार बदलने के बाद भी उन्होंने भाजपा के पांच मंत्रियों को उन्हीं के बंगले में रहने दिया है. खुद डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव भी सामने आकर बोले कि राजनीति में व्यक्तिगत संबंध अलग होते हैं, राजनीतिक विचारधारा अलग. राजनीतिक विरोध का मतलब सामाजिक दुश्मनी नहीं होती.
जब इससे भी विवाद सुलझता नजर नहीं आया तो 21 अक्तूबर, 2023 को नीतीश खुद मीडिया के सामने आए. उन्होंने कहा, “हम तो यह बताने की कोशिश कर रहे थे कि मोतिहारी केंद्रीय विवि के लिए हमने कैसी कोशिशें की हैं. लोग पुरानी बातें भूल जाते हैं, हम बस उसको याद दिला रहे थे.” उन्होंने इस विवाद के लिए मीडिया को ही दोषी ठहरा दिया और कहा, “आप लोग आजकल दबाव (राजनीतिक) में काम करते हैं. हमारी पूरी बात बताते नहीं हैं. ऐसा रहा तो आज के बाद हम आप लोगों से कुछ कहेंगे ही नहीं.” पैचअप के लिए उन्हें यह भी कहना पड़ा कि यह बच्चा (तेजस्वी) ही हमारा सबकुछ है.
इन तमाम कोशिशों को बावजूद नीतीश और कांग्रेस के बीच सतह पर आ गई दरार छिपती नजर नहीं आ रही. भले ही महागठबंधन के सभी दल इस बयान को व्यक्तिगत संबंधों की संज्ञा दे रहे हैं और बेवजह बता रहे हैं, मगर राजनीतिक जानकार बताते हैं कि नीतीश बेवजह कोई हल्की टिप्पणी नहीं करते. मोतिहारी में उनकी टिप्पणी सोची समझी थी. गठबंधन में रहने के बाद कोई नेता अपने साथी के साथ के अपने पुराने विवादों पर टिप्पणी नहीं करता.
राजनीतिक विश्लेषक और एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक डीएम दिवाकर कहते हैं, “दरअसल बिहार में सिर्फ 2.9 फीसदी आबादी वाली जाति के नेता पिछले तकरीबन बीस साल से इसी तरीके से राजनीति में खुद को प्रासांगिक बनाए हुए हैं. वे पहले मंडल विरोधी विचार वाले दल और जातियों के बल पर सत्ता में आए. और फिर जब उनकी महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय राजनीति में जाने की हुई तो वे मोदी और सांप्रदायिकता के विरोध के नाम पर लालू के साथ चले गए. वे सांप्रदायिकता के नाम पर भाजपा को छोड़ते रहे हैं और भ्रष्टाचार के नाम पर लालू को. बिहार में उनकी यह नीति सफल भी रही है. मगर इस बार उनका सामना कांग्रेस से है, जो बहुत धैर्य वाली पार्टी है. वह हड़बड़ाती नहीं, इंतजार करती है. मोलभाव नहीं करती, वफादारी देखती है. नीतीश अपनी बदलती नीतियों की वजह से कांग्रेस के भरोसेमंद नहीं हो पा रहे, इसलिए वह इन्हें संयोजक बनाने में हिचक रही है.”
जानकार यह भी बताते हैं कि नीतीश इस बार अपने उस व्यवहार को काबू करने की कोशिश में हैं. वे अब बार बार सहयोगी बदलने की अपनी छवि से बाहर निकलने की कोशिश भी कर रहे हैं. मगर इस बार उनकी हड़बड़ाहट की वजह पांच राज्यों में हो रहे चुनाव हैं. उन्हें मालूम है कि इस चुनाव में कांग्रेस को बढ़त मिलने जा रही है, इसके बाद पार्टी शायद उन्हें और भाव न दे.

दिवाकर कहते हैं, “अब तो असंभव लगता है. एक बार रामचंद्र गुहा ने कहा था, कांग्रेस में नेता नहीं है, नीतीश के पास पार्टी नहीं है. दोनों एक साथ आ जाएं तो स्थितियां बदल सकती हैं. तब कांग्रेस बहुत कमजोर थी. नेतृत्व के संकट से जूझ रही थी. जब कांग्रेस ने उस वक्त नीतीश को भाव नहीं दिया तो अब तो वह अपेक्षाकृत मजबूत ही हो रही है. अब क्यों भाव देगी. नीतीश भी यह समझते हैं.”
राजनीतिक विश्लेषक हेमंत कुमार झा इस बात से सहमत दिखते हैं. वे कहते हैं, “यह सच है कि केंद्रीय राजनीति में नीतीश की प्रासंगिकता तभी तक थी, जब तक कांग्रेस कमजोर थी. अब तो कांग्रेस लगातार मजबूत हो रही है, छवि के मामले में भी और राजनीतिक ताकत के मामले में भी. अब राहुल गांधी की छवि भी एक मेच्योर नेता की हो गई है. यही वजह है कि पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस नीतीश की मदद नहीं ले रही. इन चुनाव के नतीजे आने के बाद तो स्थितियां और बदल जाएंगी.”
वे कहते हैं, “लेकिन नीतीश अब भाजपा के साथ जाएंगे, इस बात पर मेरा भरोसा नहीं है. भाजपा के कुछ नेता ऐसी हवा बनाते रहते हैं कि वे भाजपा के साथ आने वाले हैं. मगर इस पार्टी से उन्हें क्या मिल सकता है. न उन्हें केंद्रीय मंत्री बनने का लालच है, न राज्यपाल. इससे अधिक भाजपा कुछ देने वाली थी तो पहले दे देती. सरकार ही नहीं बदलती. उन्हें जो कुछ मिलना है वह विपक्ष से ही मिलना है. कांग्रेस ही दे सकती है. इसलिए वे कहीं नहीं जाएंगे.”
दिवाकर कहते हैं, “मगर लगातार मजबूत होती कांग्रेस उन्हें कोई बड़ा पद देगी, इसमें अब संशय है.” अगर वे ऐसा कुछ चाहते हैं तो उन्हें अपनी मोलभाव वाली नीति छोड़नी पड़ेगी.

