
टीनू सिंह बिहार के जमुई की रहने वाली हैं. 27 साल की उम्र है. पिछले पांच साल से वे सरकारी नौकरी पाने की कोशिश में जुटी थीं. कभी वैकेंसी नहीं आई, तो कभी इतनी कम आईं कि बात बनते-बनते रह गई. मगर इस गुजरते साल के आखिरी दिनों में बंपर सफलता ने उनके दरवाजे पर दस्तक दी है.
22 से 26 दिसंबर के बीच के पांच दिनों में पांच सरकारी नौकरियों के प्रस्ताव उन्हें मिले हैं. पांच-पांच ज्वाइनिंग लेटर पकड़े टीनू अब सोच रही हैं कि इनमें से किसे स्वीकार करें और किसे छोड़ दें. हालांकि टीनू की यह सफलता दुर्लभ है, मगर हाल के कुछ महीनों में बिहार में कई युवाओं को एक साथ दो-दो, तीन-तीन नौकरियों में सफलता मिली है.
कभी जो युवा एक अदद सरकारी नौकरी के लिए वर्षों तपस्या में जुटे रहते थे, अब उनके पास चयन का ऑप्शन है. किसे चुने, किसे छोड़ दें. बिहार में सरकारी नौकरियों की यह बहार इसलिए आई है, क्योंकि राज्य सरकार ने पिछले एक साल में लगभग साढ़े चार लाख सरकारी नौकरियों की वेकेंसी निकाली है और इनके रिजल्ट भी फटाफट आ रहे हैं.
अपनी सफलता के बारे में बताती हुई टीनू कहती हैं, “22 दिसंबर को लखीसराय डिस्ट्रिक्ट में डेटा एंट्री ऑपरेटर के पद पर चयनित होने का मेरा रिजल्ट आया. 23 दिसंबर को बिहार एसएससी-सीजीएल परीक्षा में उत्तीर्ण होने की सूचना और सहायक प्रशाखा पदाधिकारी के पद का नियुक्ति पत्र मिला. 25 दिसंबर को बीपीसी टीआरई-2 में छठी से आठवीं कक्षा के शिक्षक के तौर पर चयन हुआ. 26 दिसंबर को इसी परीक्षा में नौंवीं-दसवीं के लिए और ग्याहरवीं-बारहवीं के लिए आयोजित अलग-अलग परीक्षाओं में मेरा चयन हुआ. इस तरह 22 से 26 दिसबंर के बीच मुझे पांच सरकारी नौकरियों का ऑफर मिला है. मैंने और मेरे घर वालों ने मिलकर सोचा है कि मैं सहायक प्रशाखा पदाधिकारी के पद पर ज्वाइन करूंगी. ऐसी उम्मीद है कि जनवरी में मेरी ज्वाइनिंग हो जाये.”

दिलचस्प है कि टीनू ने अपनी पूरी पढ़ाई जमुई जैसे छोटे से शहर में रहकर की है. वहीं से पोस्ट ग्रेजुएशन किया, बीएड किया और वहीं रहकर सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रही थीं. टीनू के पिता मुन्ना कुमार सिंह फौज में हैं, उनकी मां पिंकी सिंह और मामा अनिमेष मिलकर ही उसे पढ़ाई के लायक माहौल देते और तैयारियों में मदद करते थे. टीनू की मां पिंकी की भी पढ़ाई-लिखाई में विशेष दिलचस्पी थी. उन्होंने भी बीपीएससी की परीक्षा दो दफे दी थी, मगर उनका रिजल्ट आ नहीं पाया. वे कहती हैं, “मेरा सपना अब मेरी बेटी पूरा कर रही है.”
टीनू ने तीन दफे बिहार दारोगा की परीक्षा दी थी, तीनों बार कुछ अंकों से उनका चयन होते-होते रह गया. बिहार लोकसेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में भी वे पास होते-होते रह गईं. अब इन सफलताओं ने उन्हें आत्मविश्वास से भर दिया है. वे कहती हैं, “मैं अभी नौकरी ज्वाइन करने के बाद यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करूंगी. मेरा लक्ष्य वही है.”
टीनू सिंह की सफलता तो अनूठी है. मगर मधेपुरा की मुन्नी यादव और उनके भाई-बहनों की सफलता भी अलग तरह की है. उन्हें और उनके भाई और बहन को पिछले छह महीने के भीतर कई सरकारी नौकरियों के ऑफर मिले. मुन्नी कहती हैं, “मेरी बड़ी बहन सोनम कुमारी पहले से पंचायती राज में ऑपरेटर थीं, अभी वे बीपीएससी टीआई-1 में चयनित हुई हैं. बड़े भाई आशुतोष कुमार छह महीने पहले बिहार सरकार के भू-राजस्व विभाग में अमीन के पद पर चयनित हुए थे. यह वेकेंसी 17-18 साल बाद निकली थी. फिर बीपीएससी टीआरई-1 में चयनित हुए. फिर केंद्रीय विद्यालय में भी उनकी नौकरी हो गयी. मेरा चयन भी बीपीएससी टीआरई-1 में हुआ था, जिसे मैं ज्वाइन कर चुकी थी. फिर केंद्रीय विद्यालय में शिक्षक के पद पर मेरा चयन हुआ तो 14 दिसंबर को मैंने उस नौकरी को छोड़ कर यह नौकरी ज्वाइन कर ली.”

मुन्नी के पिता एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षक हैं, मां होम मेकर हैं. अब इनके तीनों बच्चे सरकारी नौकरी पाकर, उत्तर भारत की भाषा में कहें तो 'सेट' हो गये हैं. उनके घर में सात सरकारी नौकरियों के ऑफर लेटर आये.
अररिया के सरफराज आलम की कहानी बिल्कुल अलग है. 2010 में बीटेक पास किया, 2012 में गेट क्वालिफाई किया, 2014 में एमटेक किया. मगर उन्हें कोई ढंग की नौकरी नहीं मिली. वे एजुकेशन सेक्टर में जाना चाहते थे. मगर इतनी अच्छी पढ़ाई के बावजूद उन्हें किसी इंजीनियरिंग कॉलेज में अच्छी नौकरी नहीं मिली. मजबूरन पटना के कोचिंग संस्थानों में बच्चों को नीट की तैयारी कराने लगे. फिर शादी हो गयी और वे अपने शहर अररिया लौट आये. मजबूरन सरकारी स्कूल में शिक्षक के लिए कोशिश करने लगे.
उन्होंने बीपीएससी टीआरई-2 में कोशिश की तो तीनों श्रेणी छठी से आठवीं, नौंवी-दसवीं और ग्यारहवीं-बारहवीं में वे क्वालिफाई कर गये. अब तीन सरकारी नौकरियों के ऑफर उनके पास हैं. तीनों उनके घर के पास. वे एजुकेशन सेक्टर में जाना चाहते थे, इंजीनियरिंग कॉलेज में तो उन्हें मौका नहीं मिला, मगर बच्चों को पढ़ाने का मौका मिल गया है.
हाल के दिनों में बिहार में दो सरकारी नौकरियों के ऑफर पाने वाले सैकड़ों युवा हैं. उनमें केबीसी विनर सुशील कुमार भी हैं, जिनकी स्टोरी इंडिया टुडे हिंदी में पहले आ चुकी हैं. इस लिंक पर पढ़ी जा सकती है.
इतने बड़े पैमाने पर सरकारी नौकरियां पाने की वजह बिहार सरकार द्वारा हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर निकाली गयी भर्तियां हैं. बिहार में अब तक युवा सरकारी नौकरियों के लिए आंदोलन और ट्विटर कैंपेन चलाते थे. रेलवे भर्ती और अग्निवीर योजना के विरोध में भी हाल के महीनों में बिहार में हिंसक आंदोलन हुए. महागठबंधन ने 2020 का विधानसभा चुनाव ही नौकरियों के नाम पर लड़ा था और घोषणा की थी कि सरकार बनते ही दस लाख सरकारी नौकरियों की घोषणा की जायेगी.
अगस्त, 2022 में जब बिहार में महागठबंधन की सरकार बनी तो सरकार ने विभिन्न विभागों से खाली पदों की सूचना मांगी. इन सूचनाओं के आधार पर अब तक साढ़े चार लाख सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन मांगे जा चुके हैं. हालांकि इनमें ज्यादातर नौकरियां शिक्षा विभाग की हैं. इस विभाग में अब तक 2.40 लाख पदों के लिए परीक्षाएं आयोजित हुई हैं. स्वास्थ्य विभाग में डेढ़ लाख पदों पर भर्ती की घोषणा की जा चुकी है. लगभग 50 हजार पदों पर पुलिस विभाग में भी भर्ती की प्रक्रिया चल रही है. बिहार सरकार का कहना है कि 2025 तक दस लाख सरकारी नौकरियों की भर्ती की प्रक्रिया पूरी कर ली जायेगी.
इन वजहों से बिहार में सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले युवा खुश हैं और उन्हें लगता है बरसों बाद यह मौका आया है, जब इतनी सहजता से सरकारी नौकरी मिल रही है.

सरकारी नौकरियों के लिए प्रयासरत युवाओं के लिए लंबे अरसे से संघर्ष करने वाले संगठन 'युवा हल्ला बोल' के संस्थापक और प्रमुख अनुपम भी बिहार में इस बदले हालात से खुश हैं. अनुपम कहते हैं, "निश्चित तौर पर सरकारी नौकरियों को लेकर बिहार सरकार की जो नीति अब नजर आ रही है, वह सकारात्मक है और युवाओं के हित में है. दरअसल बिहार ही ऐसा राज्य है, जहां के युवा सरकारी नौकरियों के लिए सबसे अधिक प्रयासरत रहते हैं. ऐसे में अभी जिस तरह सरकारी नौकरी मिल रही है, वह सुखद है."
हालांकि अनुपम इनमें कुछ कमियां भी देखते हैं. वे कहते हैं, “एक तो शिक्षा और पुलिस विभाग में ही नौकरी मिल रही है. स्वास्थ्य विभाग में मिलने वाली है. मगर दूसरे विभागों में अभी नौकरियां नहीं है. दूसरी बात सरकार अभी भी नौकरियों को लेकर कोई रूटीन व्यवस्था नहीं बना पायी है. आठ-दस साल से भर्तियां हो नहीं रही थीं. एक झटके में सारी भर्तियां निकाल ली गयीं. इससे यह हुआ कि जो लोग अभी नौकरियों के लिए प्रयासरत हैं, उन्हें तो खूब नौकरियां मिल रहीं. जबकि आठ-दस साल पहले जो लोग सरकारी नौकरियों के लिए प्रयासरत थे. उनकी आयु सीमा पूरी हो गयी. उन्हें समुचित अवसर नहीं मिला.”
अनुपम के मुताबिक आदर्श स्थिति यह है कि इन भर्तियों का एक कैलेंडर होना चाहिए. हर साल जितने पद खाली हो उनकी वैकेंसी निकले और समय से वह भर्ती प्रक्रिया पूरी हो. चुनाव के वक्त एक साथ पांच–दस साल के खाली पदों पर नौकरी बांटने से दलों को राजनीतिक लाभ तो हो सकता है, युवाओं का ठीक से भला नहीं हो सकता.

