राम मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे की कथित चोरी के मामले ने जिस तरह राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और धार्मिक बहस को जन्म दिया, उसके बाद अयोध्या में पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), विश्व हिंदू परिषद (VHP) और स्थानीय संत समाज एक साझा मंच पर दिखाई दिए. मणिरामदास छावनी स्थित श्रीराम सत्संग भवन में 23 जुलाई को हुई इस मैराथन बैठक को केवल धार्मिक विमर्श नहीं बल्कि क्राइसिस मैनेजमेंट की एक अहम कवायद माना जा रहा है.
बैठक में RSS के अवध प्रांत प्रचारक कौशल किशोर विशेष रूप से लखनऊ से पहुंचे. VHP के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री बजरंग लाल बागड़ा सहित संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद रहे. इनके अलावा लगभग 200 प्रमुख संतों, महंतों और अखाड़ों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया. यह बैठक ऐसे समय हुई, जब एक दिन पहले ही श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की नौ सदस्यीय धार्मिक समिति का पुनर्गठन कर उसमें अयोध्या के पांच प्रमुख संतों को शामिल किया गया था. इससे मंदिर की पूजा-पद्धति, धार्मिक आयोजनों और दैनिक व्यवस्थाओं में स्थानीय संतों की भूमिका पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हो गई.
बैठक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह रहा कि संत समाज ने ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय के समर्थन में खुलकर मोर्चा संभाल लिया. लगभग सभी वक्ताओं ने उन्हें निर्दोष बताया और कहा कि जांच पूरी होने से पहले उनके खिलाफ किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है. साथ ही यह भी कहा गया कि चढ़ावा चोरी की घटना को आधार बनाकर पूरे राम मंदिर आंदोलन और उससे जुड़े लोगों को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है.
बैठक में यह भी स्वीकार किया गया कि घटना ने करोड़ों रामभक्तों के मन में सवाल पैदा किए हैं और उन सवालों का जवाब देना भी उतना ही जरूरी है जितना दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करना. इसी वजह से श्रद्धालुओं से SIT जांच पर भरोसा रखने और अफवाहों से दूर रहने की अपील की गई.
"चंपत राय पर सवाल नहीं, दोषियों पर कार्रवाई हो"
बैठक के दौरान लगभग हर संत ने एक स्वर में दो बातें कहीं. पहली, चढ़ावा चोरी के दोषियों को किसी कीमत पर बख्शा नहीं जाना चाहिए. दूसरी, इस घटना के आधार पर चंपत राय या पूरे ट्रस्ट को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं है. धार्मिक समिति के सदस्य आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने कहा, "राज्य सरकार ने SIT गठित की है. सभी आरोपी जेल में हैं. अगर जांच में कोई और दोषी पाया जाता है तो उसे भी जेल भेजा जाएगा. लेकिन इस एक घटना को आधार बनाकर राम मंदिर के खिलाफ कोई मुहिम नहीं चलनी चाहिए." उन्होंने यह भी कहा कि अयोध्या के संत लंबे समय से ट्रस्ट में अपनी अधिक भागीदारी की मांग करते रहे हैं और अब धार्मिक समिति में स्थानीय संतों को शामिल किया जाना सकारात्मक कदम है.
रामवल्लभाकुंज के अधिकारी स्वामी राजकुमार दास ने कहा कि जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी. उनका कहना था कि संत समाज की मान्यता है कि चंपत राय के चरित्र और उनकी निष्ठा पर संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है. मणिरामदास छावनी के उत्तराधिकारी महंत कमल नयन दास ने अपने संबोधन में कहा, "यह चोरी नहीं बल्कि विश्वासघात है. दोषियों को परिणाम भुगतना होगा. लेकिन इस घटना के बहाने राम मंदिर को बदनाम करने की साजिश भी चल रही है."
VHP के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री बजरंग लाल बागड़ा ने भी स्पष्ट कहा कि जिन लोगों ने अपराध किया है, उनके खिलाफ कार्रवाई जारी है, लेकिन चंपत राय निर्दोष हैं और उन्होंने अपना पूरा जीवन रामलला की सेवा में समर्पित किया है. महंत राघवेश दास ने कहा कि हिंदुत्व के गौरव चंपत राय को बदनाम करने का अभियान स्वीकार नहीं किया जाएगा. वहीं महंत शशिकांत दास ने आरोप लगाया कि जिन लोगों ने राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए संघर्ष किया, उन्हें सुनियोजित तरीके से निशाना बनाया जा रहा है.
ट्रस्ट में संतों की भूमिका बढ़ाने की भी मांग
बैठक का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू केवल चंपत राय के समर्थन तक सीमित नहीं रहा. संतों ने ट्रस्ट के ढांचे में अयोध्या के स्थानीय संतों की अधिक भागीदारी की मांग भी दोहराई. दरअसल, लंबे समय से अयोध्या के अनेक संत यह महसूस करते रहे हैं कि राम मंदिर आंदोलन का केंद्र होने के बावजूद मंदिर के प्रशासनिक और धार्मिक निर्णयों में उनकी भूमिका अपेक्षाकृत सीमित रही. धार्मिक समिति के पुनर्गठन के बाद पहली बार उन्हें पूजा-अर्चना, आरती, भोग, पर्व-त्योहार और धार्मिक परंपराओं के संचालन में औपचारिक जिम्मेदारी मिली है. बैठक में इस निर्णय का स्वागत किया गया और कहा गया कि रामानंदी परंपरा के अनुरूप मंदिर की पूजा-पद्धति संचालित होना चाहिए. साथ ही ट्रस्ट की मुख्य संस्था में भी अयोध्या के किसी प्रमुख संत को ट्रस्टी बनाए जाने की मांग रखी गई.
कुछ संतों ने संत समाज का अधिकृत प्रवक्ता नियुक्त करने का सुझाव भी दिया ताकि भविष्य में किसी विवाद की स्थिति में संतों का पक्ष एक स्वर में सामने आ सके. वहीं हनुमानकिला के महंत परशुराम दास ने उन लोगों के सामाजिक बहिष्कार का सुझाव दिया, जो बिना तथ्य के राम मंदिर, हिंदुत्व और संत समाज को निशाना बनाते हैं; इन मांगों से यह संकेत भी मिला कि स्थानीय संत अब केवल धार्मिक भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहते बल्कि मंदिर प्रबंधन के निर्णयों में भी उनकी निर्णायक भागीदारी चाहते हैं.
2027 चुनाव से पहले भरोसा बचाने की रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरी कवायद केवल धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है. राम मंदिर BJP की सबसे बड़ी वैचारिक और राजनीतिक उपलब्धियों में शामिल रहा है. ऐसे में मंदिर से जुड़ी किसी भी नकारात्मक खबर का असर केवल ट्रस्ट तक सीमित नहीं रहता बल्कि व्यापक राजनीतिक विमर्श को भी प्रभावित करता है.
अयोध्या में साकेत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य वी. एन. अरोड़ा कहते हैं, "राम मंदिर BJP और व्यापक हिंदुत्व राजनीति की सबसे बड़ी प्रतीकात्मक उपलब्धि है. अगर श्रद्धालुओं के बीच यह धारणा बनती है कि मंदिर के चढ़ावे में भ्रष्टाचार हुआ है या ट्रस्ट पारदर्शी नहीं है तो इसका राजनीतिक असर भी हो सकता है. इसलिए संत समाज को आगे लाकर भरोसा बहाल करने की कोशिश स्वाभाविक रणनीति मानी जाएगी." वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक निश्लेंद्र कुमार का कहना है, "2027 का विधानसभा चुनाव BJP के लिए केवल सरकार बचाने का चुनाव नहीं होगा बल्कि राम मंदिर की उपलब्धि को राजनीतिक पूंजी में बदलने की भी परीक्षा होगी. ऐसे समय में संगठन, ट्रस्ट और संत समाज का एक मंच पर आना यह संदेश देता है कि विवाद को बढ़ने नहीं दिया जाएगा."
राजनीतिक मामलों के जानकार अजय कुमार मानते हैं, "राम मंदिर आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत हमेशा संत समाज की नैतिक स्वीकृति रही है. इसलिए अगर संत खुलकर ट्रस्ट और चंपत राय के समर्थन में आते हैं तो इसका उद्देश्य केवल व्यक्ति विशेष का बचाव नहीं बल्कि पूरे आंदोलन की विश्वसनीयता को सुरक्षित रखना भी है." जानकार यह भी मानते हैं कि विपक्ष द्वारा लगातार उठाए जा रहे सवालों के बीच यह बैठक BJP और उससे जुड़े वैचारिक संगठनों की ओर से एक राजनीतिक संदेश भी थी कि राम मंदिर के मुद्दे पर संत समाज अभी भी उनके साथ खड़ा है.

