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अनंत सिंह की विधायकी बचेगी या जाएगी?

मोकामा से लगातार सात चुनाव जीत चुके अनंत सिंह पर जदयू ने दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की मांग की है. पार्टी का आरोप है कि उन्होंने विधान परिषद चुनाव में उसके उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार किया था

मोकामा विधायक अनंत सिंह (फाइल फोटो)
अपडेटेड 4 नवंबर , 2026

अनंत कुमार सिंह के पास बिहार विधानसभा की सदस्यता बचाने के लिए सात दिन का समय है. 2 नवंबर को विधानसभा सचिवालय ने मोकामा के विधायक को नोटिस जारी कर पूछा कि दलबदल विरोधी कानून के तहत उन्हें क्यों न अयोग्य ठहराया जाए.

यह नोटिस जनता दल (यूनाइटेड) यानी जदयू की एक याचिका के बाद जारी किया गया है. पार्टी ने आरोप लगाया है कि हाल ही में पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से बिहार विधान परिषद के चुनाव में दूसरे उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करके अनंत सिंह ने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है.

इस कार्रवाई ने ऐसे नेता को लेकर संवैधानिक लड़ाई शुरू कर दी है, जिसने बार-बार साबित किया है कि मोकामा में उसकी चुनावी जीत किसी खास पार्टी के चुनाव चिह्न पर निर्भर नहीं है.

जदयू ने 24 अक्टूबर को अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था. अब पार्टी संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत उनकी विधायकी खत्म कराने की कोशिश कर रही है. नोटिस पर अनंत सिंह का जवाब तय कर सकता है कि वे अपनी उस सीट पर बने रहेंगे या नहीं, जिसे उन्होंने 2025 में 28,206 वोटों के अंतर से जीता था.

यह कानूनी चुनौती ऐसे समय आई है जब उन्हें एक और झटका लग चुका है. 30 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने दुलारचंद यादव हत्याकांड में उनकी जमानत रद्द कर दी और उन्हें 1 दिसंबर तक आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान यादव की मौत के मामले में अनंत सिंह आरोपी हैं. वे अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार करते हैं.

अनंत सिंह ने 2015 में मोकामा से जदयू के उम्मीदवार नीरज कुमार को हराया था (फाइल फोटो)
अनंत सिंह ने 2015 में मोकामा से जदयू के उम्मीदवार नीरज कुमार को हराया था (फाइल फोटो)

आपराधिक मुकदमा और विधानसभा में दलबदल विरोधी कानून के तहत चल रही जांच अलग-अलग मामले हैं. लेकिन दोनों ने मिलकर मोकामा के विधायक पर कानूनी दबाव काफी बढ़ा दिया है.

दलबदल का यह मामला अनंत सिंह के जन सुराज उम्मीदवार अनुज कुमार सिंह के पक्ष में प्रचार करने से जुड़ा है. अनुज ने पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में जदयू के आधिकारिक उम्मीदवार और मौजूदा विधान परिषद सदस्य नीरज कुमार के खिलाफ चुनाव लड़ा था. 

जदयू का कहना है कि अनंत सिंह ने बार-बार पार्टी के निर्देशों की अनदेखी की, दूसरी पार्टी के उम्मीदवार के लिए प्रचार किया और वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां कीं. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार को शिकायत सौंपी है. इसके साथ दस्तावेज और वीडियो सबूत भी दिए गए हैं.

संवैधानिक सवाल यह है कि क्या अनंत सिंह का आचरण दसवीं अनुसूची के पैरा 2(1)(a) के तहत स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ने के दायरे में आता है. यह अंतर अहम है. किसी विधायक को पार्टी से निष्कासित कर देने भर से उसकी सदस्यता अपने आप खत्म नहीं होती. इसी तरह, पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार करना भी अपने आप में दलबदल साबित नहीं करता.

पिछले दो दशक से मोकामा पर अनंत सिंह और उनके परिवार का दबदबा रहा है. अनंत सिंह ने फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव में पहली बार जदयू के टिकट पर जीत हासिल की थी. अक्टूबर 2005 के चुनाव में भी उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी. 2010 में भी वे जदयू के टिकट पर जीते. 2015 में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के साथ जदयू के गठबंधन को लेकर नीतीश कुमार से मतभेद होने के बाद उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और जदयू के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज कुमार को हरा दिया.

2020 में अनंत सिंह RJD में शामिल हो गए और फिर चुनाव जीत गए. 2022 में आर्म्स एक्ट के एक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उनकी विधायकी चली गई. इसके बाद उनकी पत्नी नीलम देवी ने RJD के टिकट पर उपचुनाव लड़ा और परिवार की सीट बरकरार रखी. 2025 में जदयू में लौटने के बाद अनंत सिंह फिर चुनाव जीते. इस बार उन्होंने जेल में रहते हुए चुनाव लड़ा था.

2022 में अनंत सिंह के जेल जाने के बाद उनकी पत्नी नीलम देवी उपचुनाव जीती थीं (फाइल फोटो)
2022 में अनंत सिंह के जेल जाने के बाद उनकी पत्नी नीलम देवी उपचुनाव जीती थीं (फाइल फोटो)

इस तरह उनके परिवार ने लगातार सात चुनावी जीत दर्ज की हैं. इनमें छह बार अनंत सिंह और एक बार उनकी पत्नी जीतीं. फरवरी 2005 के बाद से मोकामा में कोई दूसरा उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सका है. 'छोटे सरकार' के नाम से मशहूर अनंत सिंह ने दिखाया है कि इस विधानसभा क्षेत्र में अक्सर उम्मीदवार की राजनीतिक पहचान पार्टी के चुनाव चिह्न से ज्यादा मायने रखती है.

कानूनी स्थिति

किसी विधायक को राजनीतिक पार्टी से निष्कासित कर देने भर से उसकी विधानसभा सदस्यता खत्म नहीं होती. दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 191(2) और दसवीं अनुसूची में है. इसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए जोड़ा गया था.

दसवीं अनुसूची में किसी राजनीतिक दल के टिकट पर चुने गए सदस्य को अयोग्य ठहराने के दो प्रमुख आधार दिए गए हैं:

  • अगर सदस्य स्वेच्छा से उस राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है, जिसके टिकट पर वह चुनाव जीतकर आया है.
  • अगर सदस्य पार्टी के निर्देश के खिलाफ सदन में मतदान करता है या मतदान से दूर रहता है. ऐसा करने से पहले उसने पार्टी की अनुमति नहीं ली हो और पार्टी 15 दिनों के भीतर उसके इस कदम को माफ भी न करे.

जदयू का मामला पहले आधार पर टिका है. पार्टी का आरोप है कि अनंत सिंह के आचरण से साबित होता है कि उन्होंने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है.

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 'स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ने' का अर्थ सिर्फ औपचारिक रूप से इस्तीफा देना नहीं है. 1994 में रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ मामले में अदालत ने कहा था कि किसी सदस्य का आचरण यह दिखा सकता है कि उसने अपनी राजनीतिक पार्टी छोड़ दी है. ऐसे में सार्वजनिक रूप से विरोधी उम्मीदवार का समर्थन करना, पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार करना और पार्टी नेतृत्व पर लगातार हमले करना सबूत के तौर पर देखे जा सकते हैं. 

हालांकि इनमें से कोई भी गतिविधि अकेले दलबदल साबित नहीं करती. विधानसभा अध्यक्ष को सभी गतिविधियों और सबूतों की समग्र रूप से जांच करनी होगी. इसके बाद ही वे तथ्यों के आधार पर फैसला ले सकते हैं.

एक अन्य अहम फैसला 1996 का जी. विश्वनाथन बनाम तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष मामला है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पार्टी से निष्कासित सदस्य को भी दसवीं अनुसूची के तहत उसी राजनीतिक दल का सदस्य माना जाता रहेगा जिसके टिकट पर वह चुनाव जीतकर आया था. दूसरे शब्दों में कहें तो पार्टी से निष्कासन के बाद भी सदस्य दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों से बच नहीं सकता.

याचिका पर फैसला लेने से पहले विधानसभा अध्यक्ष को अनंत सिंह को अपना पक्ष रखने का उचित मौका देना होगा. सात दिन का नोटिस इसी प्रक्रिया का हिस्सा है. अध्यक्ष को जदयू के सबूतों, अनंत सिंह के जवाब और जन सुराज के उम्मीदवार को समर्थन देने से जुड़ी परिस्थितियों की जांच करनी होगी.

विधानसभा अध्यक्ष का फैसला न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं होगा. 1992 के किहोटो होलोहान बनाम जाचिल्हू मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दसवीं अनुसूची के तहत फैसला लेने के लिए विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका को सही ठहराया था. साथ ही स्पष्ट किया था कि उनके फैसले की न्यायिक समीक्षा हो सकती है. 

इसमें संविधान का उल्लंघन, अधिकार क्षेत्र से जुड़ी गलती, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन, दुर्भावना और मनमानी जैसे आधार शामिल हैं. अगर विधानसभा अध्यक्ष अनंत सिंह को अयोग्य ठहराते हैं तो उनकी विधायकी खत्म हो जाएगी और मोकामा सीट खाली हो जाएगी. हालांकि इस फैसले को संवैधानिक अदालत में चुनौती दी जा सकती है.

विडंबना

पार्टी से निष्कासन के एक दिन बाद अनंत सिंह ने पत्रकारों से कहा था कि उन्हें इसका "कोई अफसोस नहीं" है. उन्होंने कहा कि जदयू नीतीश की पार्टी है और अब जब नीतीश सक्रिय भूमिका में नहीं हैं तो पार्टी "खत्म हो चुकी है". उन्होंने भविष्यवाणी की कि अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी को 10-12 सीटें जीतने के लिए भी संघर्ष करना पड़ेगा. उन्होंने यह भी कहा कि किसी दूसरी पार्टी में शामिल होने के बजाय वे अपनी पार्टी बनाएंगे. साथ ही उन्होंने दावा किया कि नीतीश के साथ उनके निजी संबंध अब भी बरकरार हैं.

इससे पहले अनंत सिंह चुनावी राजनीति से पीछे हटने और मोकामा से अपने बेटे को चुनाव लड़ाने की बात कह चुके थे. पार्टी से निष्कासन के बाद उन्होंने संकेत दिया कि अगर दबाव जारी रहा तो वे अपने फैसले पर फिर विचार कर सकते हैं और दोबारा चुनाव लड़ सकते हैं.

इस पूरे घटनाक्रम में विडंबना साफ नजर आती है. जिस पार्टी ने 2005 में उन्हें टिकट दिया, 2015 में उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर अपना उम्मीदवार हराते देखा, फिर उन्हें वापस पार्टी में लिया और 2025 में जेल में रहते हुए भी टिकट दिया, वही पार्टी अब विधान परिषद के चुनाव में दूसरे दल के उम्मीदवार का समर्थन करने के लिए उनकी विधायकी खत्म कराना चाहती है.

मोकामा के मतदाता बार-बार अनंत सिंह या उनके परिवार के किसी सदस्य को विधानसभा पहुंचाते रहे हैं. अब इस कार्रवाई से एक अलग सवाल खड़ा हो गया है. क्या दलबदल विरोधी कानून उस राजनीतिक दबदबे को खत्म कर सकता है जिसे विरोधी उम्मीदवार और पार्टी बदलने की घटनाएं भी नहीं तोड़ सकीं?

जदयू के लिए यह मामला इस बात की परीक्षा है कि पार्टी अपने उस प्रभावशाली स्थानीय नेता के खिलाफ कार्रवाई करने को लेकर कितनी गंभीर है, जो बार-बार पार्टी के फैसलों से अलग अपनी राह चुनता रहा है. पार्टी ने पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव खत्म होने के बाद ही कार्रवाई शुरू की. अब मामला विधानसभा अध्यक्ष के पास है.

अगर विधानसभा अध्यक्ष इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि जन सुराज के उम्मीदवार के लिए अनंत सिंह का प्रचार और पार्टी नेतृत्व पर उनके सार्वजनिक हमले यह साबित करते हैं कि उन्होंने स्वेच्छा से जदयू की सदस्यता छोड़ दी है तो मोकामा सीट खाली हो जाएगी. 

अगर अध्यक्ष कानून की संकीर्ण व्याख्या करते हैं तो पार्टी से निष्कासित होने के बावजूद अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता बरकरार रह सकती है. दोनों ही स्थितियों में इस कार्रवाई ने एक असाधारण राजनीतिक सफर को व्यक्तिगत वफादारी, पार्टी अनुशासन और संवैधानिक कानून के बीच लाकर खड़ा कर दिया है.

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