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अनंत सिंह के सामने बेबस क्यों दिख रही जेडीयू?

पटना स्नातक सीट पर जेडीयू ने नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाया है लेकिन अनंत सिंह खुलकर उनके खिलाफ प्रचार कर रहे हैं. पार्टी की चुप्पी ने जेडीयू की एकजुटता और अपने ही विधायक पर पकड़ को सवालों के घेरे में ला दिया है

Anant Singh JDU MLA
जेडीयू विधायक अनंत सिंह (फाइल फोटो)
अपडेटेड 29 सितंबर , 2026

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी का नाम जनता दल (यूनाइटेड) या जेडीयू है. इसके नाम के शुरुआती अक्षर आज भी एकजुटता का दावा करते हैं. लेकिन कुछ मायनों में हकीकत शायद इससे अलग है.

नीतीश के मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के पांच महीने बाद जेडीयू चुनावी उम्मीदवार घोषित करने के अलावा बहुत कुछ करने की स्थिति में नहीं दिखती. 23 सितंबर को पार्टी ने एक बार फिर अपने मुख्य प्रवक्ता और पूर्व मंत्री नीरज कुमार को अगले महीने होने वाले विधान परिषद के पटना स्नातक सीट के चुनाव के लिए उम्मीदवार चुना.

लेकिन मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत कुमार सिंह ने नीरज को हराने की कसम खाई है और खुले तौर पर उनके प्रतिद्वंद्वी डॉ. अनुज सिंह का समर्थन कर रहे हैं. 

अनंत और नीरज एक-दूसरे पर लगातार आरोप लगा रहे हैं लेकिन पार्टी ने अब तक अनुशासन की कोई सीमा तय नहीं की है. न कोई कारण बताओ नोटिस, न कोई फटकार.  कभी नीतीश के नेतृत्व में एक आदेश पर चलने वाली पार्टी अब ‘यूनाइटेड’ को सिर्फ नाम के तौर पर इस्तेमाल करती दिख रही है.

अनंत और नीरज के बीच की यह खींचतान पूरी कहानी नहीं है. फिर बिहार की राजनीति में निजी दुश्मनी भी कोई नई बात नहीं है. असली बात यह है कि जेडीयू दोनों में से किसी पर लगाम नहीं लगा पा रही. विधानसभा में पार्टी के 85 विधायक हैं और वह सहयोगी BJP के 88 विधायकों के बाद बिहार की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है.

नीतीश कुमार के दिल्ली जाने के बाद जेडीयू में सत्ता का कोई स्पष्ट केंद्र नहीं है (फाइल फोटो)
नीतीश कुमार के दिल्ली जाने के बाद जेडीयू में सत्ता का कोई स्पष्ट केंद्र नहीं है (फाइल फोटो)

जेडीयू के पास राष्ट्रीय अध्यक्ष, कार्यकारी अध्यक्ष, विधानमंडल दल के नेता और मंत्रिमंडल में एक चर्चित बेटा यानी निशांत कुमार हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि उसके पास मोकामा के इस बाहुबली पर लगाम लगाने का अधिकार नहीं है.

जब तक नीतीश मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे, पार्टी एकजुट दिखती थी क्योंकि सत्ता का एक स्पष्ट केंद्र था. असहमति को दबा दिया जाता था, टाल दिया जाता था या चुपचाप सजा दे दी जाती थी. 

नीतीश अब भी राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं लेकिन उनका पद अब सरकार की मशीनरी से सीधे जुड़ा नहीं है. सार्वजनिक तौर पर वे कम नजर आते हैं, कम मुखर हैं और यहां तक माना जा रहा है कि किसी विवाद को खत्म कराने की उनकी क्षमता भी पहले जैसी नहीं रही.

आखिरकार नीरज के समर्थन में जेडीयू के किसी संगठनकर्ता ने नहीं, बल्कि BJP के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने खुलकर मोर्चा संभाला. चौधरी ने हाल में नीरज को ‘राजनीतिक डॉक्टर’ बताया, जो बीमार व्यक्ति का इलाज कर सकते हैं. 

इसे सहयोगी पार्टी के बाहुबली विधायक के खिलाफ BJP की ओर से जेडीयू उम्मीदवार के समर्थन के तौर पर देखा गया. यानी जब सत्ता में शामिल सहयोगी पार्टी को आपके प्रवक्ता के पक्ष में बोलना पड़े तो समझिए पार्टी के भीतर ही इलाज के लिए डॉक्टर की तलाश शुरू हो गई है.
नीतीश के इकलौते बेटे और उत्तराधिकारी माने जा रहे निशांत भी मंत्रिमंडल और अखबारों में मौजूद हैं. उनके पास उपनाम और मंत्रालय तो है लेकिन कमान नहीं. अभी तक उन्हें वह सार्वजनिक स्वीकार्यता नहीं मिली है जो किसी पद को वास्तविक शक्ति में बदल देती है. 

जेडीयू की दूसरी पंक्ति के नेताओं के पास भी पद और लेटरहेड हैं. विधानमंडल दल में श्रवण कुमार, कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर संजय झा और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह इसके उदाहरण हैं. वे उम्मीदवार घोषित कर सकते हैं. लेकिन अनंत सिंह को पीछे हटने पर मजबूर नहीं कर सकते. 

जब पार्टी अपने ही विधायक को अपने उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार करने से नहीं रोक सकती तब ‘आंतरिक लोकतंत्र’ जैसी दलीलें राजनीतिक दर्शन जैसी लगती हैं.

नीरज कुमार के साथ अनंत सिंह की तनातनी काफी पुरानी है (फाइल फोटो)
नीरज कुमार के साथ अनंत सिंह की तनातनी काफी पुरानी है (फाइल फोटो)

जेडीयू जानती है या ऐसा व्यवहार करती है जैसे वह जानती हो कि अनंत के खिलाफ सामान्य तरीके से अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती. वे अपने इलाके में एक स्थानीय शासक की तरह हैं. 

उन्हें सजा दी तो मोकामा सीट हाथ से जा सकती है, साथ ही भूमिहार बहुल इलाके का एक हिस्सा भी. उन्हें छोड़ दिया तो बाकी बाहुबलियों को संदेश जाएगा कि वे अपनी मर्जी से काम कर सकते हैं और पार्टी का नाम अपने साथ जोड़कर रख सकते हैं.

नीरज और अनंत दोनों पटना जिले की सीमा पर मोकामा-बाढ़ इलाके के भूमिहार हैं. अनंत अपने इलाके में ‘छोटे सरकार’ के नाम से जाने जाते हैं. वे ‘बड़े सरकार’ दिलीप सिंह के छोटे भाई हैं जिन्होंने उनसे पहले मोकामा का प्रतिनिधित्व किया था. 

अनंत जेडीयू नेता के तौर पर, निर्दलीय, जेल में रहते हुए राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के उम्मीदवार के तौर पर और फिर जेडीयू के उम्मीदवार बनकर मोकामा सीट जीत चुके हैं. पुलिस ने पिछले कई वर्षों में अनंत के खिलाफ हत्या के प्रयास, अपहरण और हथियारों से जुड़े कई मामले दर्ज किए हैं. 

अगस्त 2019 में पुलिस ने उनके पैतृक घर पर छापा मारा था और कहा था कि वहां एक एके-47 राइफल, कारतूस और ग्रेनेड मिले. अनंत को दोषी ठहराया गया और उनकी विधानसभा सदस्यता चली गई. अगस्त 2024 में पटना हाई कोर्ट ने उनकी सजा को खारिज कर दिया.

अब अनंत का आरोप है कि इस मामले में उन्हें नीरज ने फंसाया था. अदालतें इससे सहमत हैं या नहीं, यह एक सवाल है. लेकिन मोकामा के लोग अब भी ‘छोटे सरकार’ के वोट जुटाने की क्षमता पर भरोसा करते हैं या नहीं, यह दूसरा सवाल है. इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जेडीयू के कुछ न करने से पार्टी क्या संदेश दे रही है?

नीरज जेडीयू का वह दूसरा चेहरा हैं जिसे पार्टी पटना स्नातक सीट के मतदाताओं के सामने पेश करना चाहती है. वे प्रवक्ता हैं, विधान परिषद सदस्य हैं और इसी सीट से चौथी बार चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं. वे बयानों और टीवी स्टूडियो में नजर आने वाले नेता हैं और पार्टी की आधिकारिक सूची में भी उनका नाम है.

अनंत का आरोप है कि नीरज ने चार चुनावों में उनके खिलाफ काम किया और 2019 के हथियार मामले में भी उनकी भूमिका थी. नीरज ने इसका सबूत मांगा है. 

उन्होंने पार्टी को यह भी याद दिलाया है कि अनंत ने स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार के खिलाफ भी बयान दिए हैं और उनके मुताबिक, नीतीश के खिलाफ भी बोल चुके हैं. एक नेता की पकड़ मतदान केंद्र पर है. दूसरे की पकड़ पार्टी के माइक पर. जेडीयू ने आगामी चुनाव के लिए दूसरे को चुना है जबकि पहले को खुला छोड़ दिया है.

यह विवाद नया नहीं है. 2015 में यह टकराव खुलकर सामने आया था. उस समय नीतीश और RJD प्रमुख लालू प्रसाद यादव गठबंधन में थे. जेडीयू ने मौजूदा मोकामा विधायक को विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं दिया और नीरज को उम्मीदवार बनाया. 

अनंत निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़े और 54,000 से ज्यादा वोट हासिल किए. पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज को 35,657 वोट मिले और वे काफी पीछे दूसरे स्थान पर रहे.

इससे एक बात साफ हुई थी. मोकामा में पार्टी का टिकट मिलना और जनता की मंजूरी मिलना एक ही बात नहीं है. अनंत तब से बार-बार यही साबित करते रहे हैं. कभी RJD के जरिए, कभी जेल में रहते हुए, कभी उपचुनाव में अपनी पत्नी को जिताकर और फिर जेडीयू में लौटकर. पार्टी ने उन्हें अपने साथ इसलिए जोड़ा क्योंकि वह उन्हें खत्म नहीं कर सकती थी.

इसलिए विधान परिषद का यह चुनाव कोई नया विवाद नहीं है. यह पुराने विवाद का ही विस्तार है. स्नातक सीट के मतदाता मोकामा के बूथों जैसे नहीं हैं. फिर भी यह इस बात की परीक्षा है कि क्या पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार ऐसे साथी नेता के सामने टिक सकता है जो पहले एक बार पार्टी के चुनाव चिह्न को हरा चुका है.

85 विधायकों वाली पार्टी को एक संस्था की तरह दिखना चाहिए. लेकिन विडंबना यह है कि जेडीयू कई बार कुछ और ही नजर आती है. नीतीश अध्यक्ष हैं लेकिन अब रोजमर्रा के कामकाज में उनका वैसा डर नहीं दिखता. 

निशांत को अभी उस अर्थ में उत्तराधिकारी नहीं माना जा सकता जो बिहार में सबसे ज्यादा मायने रखता है- लोग बिना कहे भी आपकी बात मानें. पार्टी की दूसरी पंक्ति के पास संगठनात्मक अधिकार तो है लेकिन वह सार्वजनिक स्वीकार्यता नहीं है जो अधिकार को शक्ति में बदल देती है. 

यही वजह है कि अनंत कैमरों के सामने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार को बुरा-भला कह सकते हैं और फिर भी विधानमंडल दल का हिस्सा बने हुए हैं. वहीं BJP के मुख्यमंत्री की नजर में नीरज ‘डॉक्टर’ हैं लेकिन उन्हें यह मान्यता भी बाहर से मिल रही है.

अगर जेडीयू का कोई मौजूदा विधायक पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार कर सकता है और उसे कोई नतीजा नहीं भुगतना पड़ता, तो जनता दल (यूनाइटेड) में ‘यूनाइटेड’ अब सिर्फ एक नारा बनकर रह गया है.

स्नातक सीट का नतीजा तय करेगा कि नीरज विधान परिषद की सीट बचा पाते हैं या नहीं. लेकिन यह तय नहीं करेगा कि जेडीयू के पास अब भी कोई केंद्रीय नेतृत्व है या नहीं. यह सवाल पहले ही सामने आ चुका है और पार्टी के किसी पदाधिकारी ने अब तक इसका जवाब नहीं दिया है.

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