
“उत्तर प्रदेश में सबसे बड़े घुसपैठिया कौन हैं? उत्तराखंड के... घुसपैठिया की परिभाषा तय करनी पड़ेगी.” समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 23 अक्टूबर को लखनऊ में पत्रकारों से बातचीत के दौरान यह टिप्पणी की. उनका यह बयान उत्तर प्रदेश में घुसपैठियों को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के आरोपों के जवाब में आया था. बयान का वीडियो सामने आने के बाद उत्तराखंड की राजनीति में उबाल आ गया.
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 25 अक्टूबर को पिथौरागढ़ जिले में एक कार्यक्रम के दौरान अखिलेश पर तीखा हमला बोलते हुए इसे उत्तराखंड के स्वाभिमान और राज्य के लोगों के योगदान का अपमान बताया. BJP ने अखिलेश से सार्वजनिक माफी की मांग की जबकि सपा ने सफाई दी कि उनकी टिप्पणी का निशाना उत्तराखंड के लोग नहीं बल्कि BJP की राजनीति थी.
इस विवाद ने उत्तराखंड में 'घुसपैठिया' शब्द के राजनीतिक इस्तेमाल, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के बीच ऐतिहासिक-सामाजिक संबंधों तथा देश के भीतर नागरिकों के आवागमन के अधिकार को बहस के केंद्र में ला दिया है. मुख्यमंत्री धामी ने इस मुद्दे पर कांग्रेस को भी घेरा है जो राष्ट्रीय स्तर पर सपा की सहयोगी है. वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अखिलेश की टिप्पणी को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है.
इस तरह एक बयान अब BJP और सपा के बीच राजनीतिक टकराव के साथ-साथ विपक्षी गठबंधन के लिए भी असहज स्थिति पैदा कर रहा है.

उत्तराखंड के स्वाभिमान से जोड़ा मुद्दा
अखिलेश यादव की टिप्पणी पर BJP ने 24 अक्टूबर को हमला बोलना शुरू किया. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उत्तराखंड केवल आस्था की भूमि नहीं, बल्कि वीरता, बलिदान और राष्ट्रसेवा की भी भूमि है. उन्होंने कहा कि यहां के लोगों ने देश की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया है और सशस्त्र बलों में सेवा देने वाले लोगों का योगदान किसी से छिपा नहीं है. ऐसे राज्य के नागरिकों को घुसपैठिया कहना देवभूमि के स्वाभिमान और उसके गौरवशाली इतिहास का अपमान है.
धामी ने अखिलेश यादव से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की. उन्होंने इस विवाद को उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास से भी जोड़ दिया. मुख्यमंत्री ने याद दिलाया कि 1994 में अलग उत्तराखंड राज्य की मांग कर रहे आंदोलनकारियों पर मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा में पुलिस ने गोलीबारी की थी. उस समय उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे.
धामी ने कहा कि उत्तराखंड के लोग उस संघर्ष और बलिदान को नहीं भूले हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि जिस राज्य के आंदोलनकारियों पर मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में गोलियां चली थीं आज उसी राज्य के लोगों को घुसपैठिया कहने की टिप्पणी कैसे स्वीकार की जा सकती है.
धामी की इस प्रतिक्रिया का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि उत्तराखंड में सेना और अर्धसैनिक बलों में सेवा देने वाले लोगों तथा सैनिक परिवारों की सामाजिक पहचान महत्वपूर्ण है. ऐसे में घुसपैठिया शब्द को राज्य के सम्मान और देश के लिए उसके योगदान से जोड़ना BJP के लिए एक प्रभावी राजनीतिक मुद्दा बन सकता है.
25 अक्टूबर को पिथौरागढ़ में एक कार्यक्रम के दौरान धामी ने अखिलेश पर फिर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह है लेकिन किसी राज्य के नागरिकों के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल उचित नहीं है. धामी ने यह भी आरोप लगाया कि अखिलेश राजनीतिक हताशा में ऐसी टिप्पणी कर रहे हैं.
सपा की सफाई
विवाद बढ़ने के बाद सपा ने अखिलेश यादव की टिप्पणी की अलग व्याख्या पेश की. पार्टी के प्रवक्ता और उत्तराखंड प्रभारी राजेंद्र चौधरी ने कहा कि अखिलेश यादव का उत्तराखंड के लोगों से भावनात्मक संबंध है और उनकी टिप्पणी का आशय राज्य के नागरिकों का अपमान करना नहीं था. उनके मुताबिक बयान किसी व्यक्ति के संदर्भ में था, न कि पूरे उत्तराखंड के लोगों के लिए.
सपा का कहना है कि अखिलेश BJP की उस राजनीति पर सवाल उठा रहे थे जिसमें गरीबों और मजदूरों को घुसपैठिया बताकर निशाना बनाया जाता है. सपा की दलील है कि देश के भीतर एक राज्य से दूसरे राज्य में जाकर रहने वाले भारतीय नागरिकों को घुसपैठिया नहीं कहा जा सकता.
पार्टी ने संविधान के अनुच्छेद-19 का हवाला देते हुए कहा कि नागरिकों को देश में स्वतंत्र रूप से आने-जाने और कहीं भी बसने का अधिकार है, हालांकि इस अधिकार पर संविधान के तहत कुछ उचित प्रतिबंध हो सकते हैं. सपा नेताओं का तर्क है कि उत्तराखंड से उत्तर प्रदेश आकर रहने वाले लोगों को बाहरी बताना उचित नहीं होगा.
इस संदर्भ में सपा नेताओं ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी उल्लेख किया. योगी आदित्यनाथ का जन्म पौड़ी गढ़वाल में हुआ था जो अब उत्तराखंड का हिस्सा है. सपा का तर्क है कि अगर दूसरे राज्य से आकर उत्तर प्रदेश में रहने वाले किसी व्यक्ति को घुसपैठिया कहा जाए तो यह सवाल योगी आदित्यनाथ के संदर्भ में भी उठेगा.
पार्टी के मुताबिक अखिलेश की टिप्पणी BJP की घुसपैठिये की परिभाषा पर सवाल थी, न कि उत्तराखंड के लोगों के प्रति उनकी सोच का परिचायक. इस विवाद में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की प्रतिक्रिया भी अहम है. रावत ने अखिलेश की टिप्पणी को दुर्भाग्यपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि संभव है, बयान देते समय अखिलेश के दिमाग में योगी आदित्यनाथ की छवि रही हो.
रावत ने यह भी याद दिलाया कि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश कभी एक ही राज्य का हिस्सा थे. राज्य के बंटवारे के बाद दोनों जगह रह गए नागरिक अपने-अपने क्षेत्रों के सम्मानित निवासी हैं और उन्हें समान अधिकार प्राप्त हैं.
चुनावी मुद्दा
उत्तराखंड में समाजवादी पार्टी (सपा) अब तक मजबूत चुनावी आधार नहीं बना पाई है. वर्ष 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में पार्टी को करीब 0.3 फीसदी वोट मिले थे. 2007 में उसका मत प्रतिशत लगभग 1.9 फीसदी तक पहुंचा लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा को 1.41 फीसदी वोट मिले और वह एक भी सीट नहीं जीत सकी. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को महज 0.29 फीसदी वोट मिले थे.
राज्य गठन के बाद यहां BJP और कांग्रेस मुख्य राजनीतिक प्रतिस्पर्धी बनकर उभरी हैं. सपा राज्य में अब तक ऐसी ताकत नहीं बन सकी है जो विधानसभा चुनावों में इन दोनों दलों को सीधी चुनौती दे सके. इसके बावजूद अखिलेश यादव का बयान राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि BJP इसे उत्तराखंड की अस्मिता और सम्मान से जोड़ रही है.
राजनीतिक विश्लेषक और मेरठ विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर विवेक नौटियाल कहते हैं, “उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले BJP और कांग्रेस के बीच राजनीतिक मुकाबला तेज होने की संभावना है. ऐसे समय में घुसपैठिये का मुद्दा BJP को विपक्षी दलों पर हमला करने का अवसर देता है.”
सपा के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी सफाई के जरिए उत्तराखंड के लोगों के प्रति सम्मान का संदेश स्पष्ट रूप से दे. अब देखना होगा कि अखिलेश यादव इस बयान पर कोई विस्तृत स्पष्टीकरण देते हैं या नहीं और BJP इस मुद्दे को 2027 के चुनावी विमर्श में कितना आगे ले जाती है. इतना तय है कि घुसपैठिये शब्द को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब उत्तराखंड की अस्मिता, विपक्षी गठबंधन की राजनीति और उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड के रिश्तों पर बहस का रूप ले चुका है.

