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छात्र सभा के ड्रेस कोड से PDA की नई जमीन तलाश रहे अख‍िलेश

अखिलेश यादव ने छात्र सभा के लिए नीली टी-शर्ट और जींस वाला नया ड्रेस कोड लॉन्च किया है. 2027 से पहले इसे दलित युवाओं और PDA तक पहुंच बढ़ाने की रणनीति माना जा रहा है

Akhilesh Yadav, Chhatra Sabha New dress code
छात्र सभा के लिए नए ड्रेस कोड लॉन्च के मौके पर अखिलेश यादव (फोटो : facebook.com/yadavakhilesh)
अपडेटेड 9 सितंबर , 2026

समाजवादी पार्टी (सपा) ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपनी छात्र राजनीति को नया रंग देने की कोशिश की है. पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 8 सितंबर को समाजवादी छात्र सभा के लिए नीली टी-शर्ट, जींस और लाल टोपी वाला नया ड्रेस कोड लॉन्च किया. 

देखने में यह बदलाव भले ही छात्र संगठन की पोशाक तक सीमित लगे, लेकिन इसके पीछे समाजवादी पार्टी की वैचारिक पहचान, युवाओं से जुड़ने की कोशिश और PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण को और मजबूत करने की रणनीति एक साथ दिखाई देती है. 

अखिलेश ने खुद नीले रंग को लोकतंत्र, संविधान, बहुजन आंदोलन और अन्याय के खिलाफ बगावत का प्रतीक बताया. यानी छात्र सभा की ड्रेस के बहाने SP ने एक साथ कई राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है.

युवा राजनीति का नया लुक

लखनऊ स्थित SP मुख्यालय में नई ड्रेस लॉन्च करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि यूनिफॉर्म से एकरूपता आती है. उनके मुताबिक, नीली जींस कभी अन्याय के खिलाफ बगावत का प्रतीक थी क्योंकि इसे फैक्ट्री और खदानों में काम करने वाले मजदूर पहनते थे. 

सपा नेता के मुताबिक आज वही जींस फैशन का हिस्सा है और नई पीढ़ी में शायद ही कोई ऐसा युवा हो जो इसे न पहनता हो. इसी वजह से पार्टी ने छात्र सभा के लिए पारंपरिक राजनीतिक परिधान के बजाय जींस और टी-शर्ट को चुना. 

SP की छात्र राजनीति की पुरानी तस्वीर में सफेद कुर्ता-पायजामा और लाल टोपी जैसी राजनीतिक पहचान ज्यादा स्पष्ट रही है. इसके मुकाबले नीली टी-शर्ट और डेनिम जींस छात्र संगठन को ज्यादा अनौपचारिक और युवा चेहरा देती है. 

जींस और टी-शर्ट छात्र सभा को अनौपचारिक लुक देते हैं
जींस-टीशर्ट छात्र सभा को अनौपचारिक और युवा लुक देते हैं (फोटो : facebook.com/yadavakhilesh)

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक यह बदलाव केवल ड्रेस कोड बदलने की कवायद नहीं है बल्कि SP की विजुअल पॉलिटिक्स को बदलने की कोशिश है. पारंपरिक राजनीतिक पहनावे से अलग जींस-टीशर्ट उस पीढ़ी को संबोधित करती है, जिसके लिए कैजुअल कपड़े रोजमर्रा की पहचान का हिस्सा हैं. यही वह जगह है जहां Gen Z और Gen Alpha को SP की नई रणनीति में केंद्र में रखा गया है. 

अखिलेश ने इसी के साथ शिक्षण संस्थानों में दो सप्ताह के 'छात्र जागरूकता सप्ताह' की घोषणा की. पार्टी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रों के बीच जाएगी. लेकिन इस बार लक्ष्य केवल सदस्य बनाना नहीं है. अखिलेश ने साफ कहा कि पार्टी छात्रों तक अपनी विचारधारा पहुंचाना और उन्हें उससे जोड़ना चाहती है. 

यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि छात्र राजनीति किसी भी राजनीतिक दल के लिए केवल संगठन विस्तार का माध्यम नहीं होती. विश्वविद्यालय और कॉलेज लंबे समय से राजनीतिक विचारों, नेतृत्व और आंदोलन की प्रयोगशाला रहे हैं. 

ऐसे में 2027 के चुनाव से पहले SP का छात्र सभा पर नए सिरे से जोर देना आने वाली पीढ़ी के बीच अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. अखिलेश ने नई पीढ़ी की सोच को नई ड्रेस से जोड़ते हुए कहा कि जब लोग एक यूनिफॉर्म में साथ आते हैं तो सामाजिक असमानताएं पीछे छूट जाती हैं और सामने सिर्फ यूनिफॉर्म दिखाई देती है. यानी ड्रेस कोड को उन्होंने केवल संगठनात्मक अनुशासन नहीं बल्कि बराबरी के प्रतीक के रूप में पेश किया.

नीला रंग ही क्यों

नीले रंग का चुनाव इस पूरी रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. अखिलेश ने इसे लोकतंत्र और संविधान से जोड़ने के साथ बहुजन समाज और डॉ. बीआर आंबेडकर से भी जोड़ा. उन्होंने कहा कि उन्हें खुशी है कि पार्टी ने नीले रंग को विचारधारा, लोकतंत्र और संविधान से जोड़ा है. 

उनके मुताबिक नीला रंग बहुजन समाज और आंबेडकर से भी जुड़ा रहा है और युवाओं को भी यह रंग नई ऊर्जा और नई सोच का एहसास देता है. नीले रंग की यह राजनीतिक यात्रा नई नहीं है. आंबेडकरवादी राजनीति में नीले रंग की अपनी विशिष्ट पहचान रही है. 

डॉ. बीआर आंबेडकर ने 1942 में स्थापित ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन के झंडे के लिए नीले रंग का इस्तेमाल किया था. बाद में 1956 में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया से जुड़े राजनीतिक प्रतीकों में भी नीला रंग प्रमुख रहा.

आंबेडकरवादी राजनीति को भी रिझाने की कोशिश है नया ड्रेस कोड
आंबेडकरवादी राजनीति को भी रिझाने की कोशिश है नया ड्रेस कोड (फोटो : facebook.com/yadavakhilesh)

आंबेडकर की सार्वजनिक छवियों में नीला सूट और हाथ में संविधान की प्रति के रूप में दिखाई जाने वाली किताब ने भी इस रंग को दलित और संविधानवादी राजनीति से मजबूत तरीके से जोड़ दिया. 

बहुजन राजनीति में नीले रंग का सबसे बड़ा राजनीतिक इस्तेमाल बहुजन समाज पार्टी ने किया. उत्तर प्रदेश में BSP ने दशकों तक नीले रंग को अपनी राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनाए रखा. ऐसे में SP का छात्र सभा के लिए नीला रंग चुनना अपने आप में महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश है. 

यह उस सामाजिक वर्ग की ओर संकेत करता है जिसे अखिलेश यादव 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले PDA के जरिए अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर चुके हैं. SP के लिए यह प्रयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी का पारंपरिक सामाजिक आधार पिछड़े वर्गों और मुसलमानों के इर्द-गिर्द रहा है, जबकि दलित राजनीति पर लंबे समय तक BSP का प्रभाव रहा. 

2024 के लोकसभा चुनाव में SP ने PDA को अपने प्रमुख सामाजिक-राजनीतिक फॉर्मूले के रूप में सामने रखा. चुनाव में पार्टी ने 37 सीटें जीतीं, जो उसके किसी भी लोकसभा चुनाव में अब तक का सर्वाधिक आंकड़ा रहा. यही सफलता अब 2027 की रणनीति का आधार बन रही है. 

राजनीतिक विश्लेषक और मेरठ के एक कालेज में शिक्षक संदीप कुमार वर्मा कहते हैं, “SP अगर छात्र सभा के जरिए नीले रंग को लगातार प्रचारित करती है तो यह उसके लिए दलित युवाओं तक पहुंचने का नया दृश्य माध्यम बन सकता है. लाल टोपी SP की पुरानी पहचान है, जबकि उसके साथ नीली टी-शर्ट जोड़कर पार्टी दो अलग राजनीतिक प्रतीकों को एक साथ सामने ला रही है. लाल टोपी समाजवादी पहचान का संकेत देती है और नीला रंग संविधान, अंबेडकर तथा बहुजन राजनीति की ओर इशारा करता है. यह संयोजन दरअसल SP के पुराने सामाजिक आधार और उसके नए PDA विस्तार के बीच पुल बनाने की कोशिश जैसा दिखता है.”

संदीप कुमार वर्मा के मुताबिक, रंगों की राजनीति आज भी चुनावी संचार का प्रभावी माध्यम है. किसी पार्टी की रैली, सोशल मीडिया तस्वीरों, छात्र संगठनों और जमीनी कार्यक्रमों में एक खास रंग बार-बार दिखाई दे तो वह धीरे-धीरे राजनीतिक पहचान का हिस्सा बन जाता है. SP के लिए नीला रंग इसी तरह की नई विजुअल पहचान तैयार कर सकता है.

लेकिन केवल रंग के सहारे सामाजिक समीकरण बदलना आसान नहीं होगा. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रतीकों का अपना महत्व है लेकिन चुनावी रणनीति में प्रतीक के साथ संगठन, स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवारों की सामाजिक स्वीकार्यता और लगातार जमीनी संपर्क भी जरूरी है. 

SP को यदि दलित और युवा मतदाताओं में अपनी पकड़ मजबूत करनी है तो नीली टी-शर्ट से आगे जाकर उन्हें राजनीतिक और संगठनात्मक भूमिका भी देनी होगी. अब असली परीक्षा यह होगी कि नीली टी-शर्ट पहनने वाले छात्र केवल तस्वीरों और कार्यक्रमों तक सीमित रहते हैं या SP के लिए कॉलेज परिसरों से लेकर 2027 के चुनावी मैदान तक एक सक्रिय नया युवा नेटवर्क तैयार कर पाते हैं.

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