
यूपी विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही प्रदेश के रुहेलखंड में सियासी बिसात बिछने लगी है. समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने BJP के लिए इस सियासी मजबूत क्षेत्र में चुनौती बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है.
27 अक्टूबर को बरेली की बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट से कीर्ति कश्यप को प्रत्याशी घोषित करने और उनके पिता तथा आंवला के पूर्व BJP सांसद धर्मेंद्र कश्यप को पार्टी में शामिल करने के कदम को इसी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है.
BJP से दूरी बनाने वाले नेताओं को अपने पाले में लाकर अखिलेश जहां पार्टी के सामाजिक आधार का विस्तार करना चाहते हैं वहीं गैर-यादव पिछड़ी जातियों और मुस्लिम मतदाताओं को जोड़कर BJP के मजबूत चुनावी समीकरण में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं.
रुहेलखंड के मुख्य हिस्से में बरेली, बदायूं, पीलीभीत और शाहजहांपुर जिले शामिल हैं. इन चार जिलों की 25 विधानसभा सीटों में फिलहाल BJP के 20 और सपा के पांच विधायक हैं. यानी विधानसभा की मौजूदा तस्वीर BJP के पक्ष में है. इसके बावजूद पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के नतीजों ने सपा को इस क्षेत्र में संभावनाएं दिखाई हैं.
2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने बदायूं की तीन और बरेली की दो सीटों पर जीत दर्ज की थी. 2024 के लोकसभा चुनाव में बदायूं और आंवला जैसे क्षेत्रों में पार्टी के प्रदर्शन ने भी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया. अब अखिलेश की कोशिश इस सीमित चुनावी सफलता को व्यापक राजनीतिक चुनौती में बदलने की है.
गैर-यादव ओबीसी पर नजर
आंवला से सांसद रह चुके धर्मेंद्र कश्यप का बदायूं जिले की दातागंज और शेखूपुर विधानसभा सीटों के क्षेत्रों में भी राजनीतिक संपर्क रहा है. उनकी बेटी को बिथरी चैनपुर से प्रत्याशी घोषित करके सपा ने कश्यप समुदाय के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने का संकेत दिया है.

यह कदम इसलिए भी अहम है क्योंकि BJP के साथ लंबे समय से जुड़े रहे नेताओं को अपने पाले में लाकर सपा यह संदेश देना चाहती है कि उसका राजनीतिक आधार केवल यादव और मुस्लिम मतदाताओं तक सीमित नहीं है.
रुहेलखंड में शाक्य, कश्यप, मौर्य, कुर्मी और लोध जैसी पिछड़ी जातियों का चुनावी महत्व है. इन समुदायों के मतदाताओं का समर्थन विधानसभा क्षेत्रों के समीकरण प्रभावित कर सकता है. अखिलेश यादव अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण को इसी आधार पर मजबूत करना चाहते हैं.
हालांकि इन जातियों के मतदाताओं का रुझान एक जैसा नहीं है और स्थानीय उम्मीदवार, संगठन तथा सरकार के प्रति नजरिया भी चुनावी फैसले को प्रभावित करेगा. बदायूं की बिसौली सीट पर भी सपा के सामने राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं.
सपा ने यहां पूर्व विधायक कुशाग्र सागर को अपने साथ लिया है. उनके पिता योगेंद्र सागर इस क्षेत्र की राजनीति में प्रभावशाली रहे हैं. दूसरी ओर, आशुतोष मौर्य BJP में शामिल हो चुके हैं. पिछले चुनाव में कुशाग्र सागर को आशुतोष मौर्य के मुकाबले बेहद कम अंतर से हार का सामना करना पड़ा था. दोनों परिवारों के बीच लंबे समय से राजनीतिक प्रतिस्पर्धा रही है. अब पार्टी बदलने के बाद इनके बीच मुकाबले की संभावना बदायूं की राजनीति को और दिलचस्प बना सकती है.
दातागंज के पूर्व विधायक सिनोद शाक्य भी सपा की रणनीति में अहम कड़ी हैं. वे दो बार विधायक रह चुके हैं और पिछले विधानसभा चुनाव में भी सपा के साथ थे लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला था. पार्टी ने उन्हें विधान परिषद चुनाव में उम्मीदवार बनाया, हालांकि उन्होंने अंतिम समय में नामांकन वापस ले लिया था. अब उनके सामने टिकट की दावेदारी के साथ स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को साधने की चुनौती है.
कैप्टन अर्जुन, कीर्ति कश्यप और पूर्व विधायक प्रेमपाल सिंह यादव के बेटे जैसे दूसरे नामों की मौजूदगी से सपा के भीतर टिकट की प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है. ऐसे में पार्टी को सामाजिक समीकरण बनाने के साथ संभावित असंतोष पर भी नजर रखनी होगी.
मुस्लिम वोटों पर दांव
रुहेलखंड में सपा की मजबूती का पारंपरिक आधार यादव-मुस्लिम गठजोड़ रहा है. पीडीए की व्यापक रणनीति के बावजूद मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन पार्टी के लिए निर्णायक बना हुआ है. इस वर्ग में अपने राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए अखिलेश यादव ने पूर्व मंत्री अनीस अहमद खां उर्फ फूलबाबू को पार्टी में शामिल किया है.

फूलबाबू ने 16 फरवरी को नसीमुद्दीन सिद्दीकी के साथ सपा की सदस्यता ग्रहण की थी. दोनों नेताओं की BSP में लंबी राजनीतिक पारी रही है. ऐसे में सपा को उम्मीद है कि इनके जरिए BSP के पारंपरिक समर्थकों के एक हिस्से को अपने साथ जोड़ा जा सकेगा. पीलीभीत के बीसलपुर निवासी फूलबाबू की राजनीति की शुरुआत यूथ कांग्रेस से हुई थी.
उनके पिता शफी अहमद खां कांग्रेस से जुड़े थे. बाद में फूलबाबू BSP में शामिल हुए और 1996, 2002 तथा 2007 में बीसलपुर से विधायक निर्वाचित हुए. वे दो बार मंत्री भी रहे और यूपी एग्रो के चेयरमैन की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने BSP के टिकट पर पीलीभीत सीट से चुनाव लड़ा था.
पीलीभीत के अलावा बरेली, बदायूं और शाहजहांपुर के कुछ इलाकों में भी उनका राजनीतिक संपर्क रहा है. सपा में उनकी मौजूदगी से पार्टी को मुस्लिम मतदाताओं के बीच एक ऐसे चेहरे का सहारा मिल सकता है, जिसकी पहचान केवल एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रही है. बरेली में सपा के पास भोजीपुरा से शहजिल इस्लाम और बहेड़ी से अताउर रहमान जैसे मुस्लिम विधायक हैं. अताउर रहमान संगठन में भी जिम्मेदारी निभा रहे हैं.
बदायूं में पूर्व विधायक आबिद रजा पार्टी का प्रमुख मुस्लिम चेहरा हैं. उनकी सपा में वापसी हो चुकी है लेकिन अतीत में पार्टी से निष्कासन और राजनीतिक मतभेदों के कारण स्थानीय समीकरणों को संभालना महत्वपूर्ण रहेगा. पीलीभीत में पूर्व विधायक अरशद अली खां और शाहजहांपुर में जिलाध्यक्ष तनवीर खान की स्थानीय भूमिका है.
फूलबाबू के जुड़ने से सपा को इन नेताओं के साथ मिलकर मंडल स्तर पर मुस्लिम राजनीति को अधिक व्यापक बनाने का अवसर मिला है. राजनीतिक विश्लेषक और बरेली के समाजसेवी अनिल अग्रवाल कहते हैं, “हालांकि मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन को अपने पक्ष में बनाए रखना सपा के लिए अपने आप में चुनौती है. BJP के खिलाफ मतों का ध्रुवीकरण, स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता और विपक्षी दलों की रणनीति इस वर्ग के मतदान को प्रभावित कर सकती है. सपा को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नए नेताओं को महत्व देने की प्रक्रिया में पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा न हो”
सपा के सामने टिकट की चुनौती
इस क्षेत्र के चार जिलों की 25 विधानसभा सीटों में BJP के 20 विधायक हैं. बरेली की नौ सीटों में सात BJP और दो सपा के पास हैं. बदायूं की छह सीटों में दोनों दलों के तीन-तीन विधायक हैं जबकि पीलीभीत की चारों और शाहजहांपुर की छहों सीटों पर BJP का कब्जा है. यह अंतर बताता है कि सपा की राजनीतिक गतिविधियां बढ़ने के बावजूद BJP की संगठनात्मक और चुनावी स्थिति को कमजोर मानना जल्दबाजी होगी. BJP भी पिछड़ी जातियों के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रही है.
कुर्मी और लोध मतदाताओं का समर्थन पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है. झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की बेटी श्रुति गंगवार और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह जैसे नेताओं के जरिए क्षेत्रीय समीकरणों में पार्टी की मौजूदगी बनी हुई है.
BJP ब्रज प्रांत के अध्यक्ष पूरनलाल लोधी ने दूसरे दलों से नेताओं के आने-जाने को सामान्य चुनावी प्रक्रिया बताते हुए कहा है कि इससे BJP पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. उनके मुताबिक BJP के संपर्क में भी दूसरे दलों के कई नेता हैं और उचित समय पर उनके बारे में जानकारी दी जाएगी.
सपा की चुनौती केवल BJP से मुकाबला करने की नहीं, बल्कि अपने भीतर विभिन्न सामाजिक समूहों और नेताओं के बीच संतुलन बनाने की भी है. कीर्ति कश्यप को बिथरी चैनपुर से प्रत्याशी घोषित करने के बाद अन्य दावेदारों की प्रतिक्रिया पर नजर रहेगी. बदायूं में सिनोद शाक्य समेत कई नेताओं की मौजूदगी टिकट वितरण को पेचीदा बना सकती है.
मुस्लिम नेताओं को साथ लाने के साथ पार्टी को अपने मौजूदा विधायकों और स्थानीय संगठन की भूमिका भी स्पष्ट करनी होगी. रुहेलखंड में अखिलेश यादव की रणनीति के तीन प्रमुख आधार दिखाई देते हैं. पहला, BJP से असंतुष्ट नेताओं को जोड़कर गैर-यादव पिछड़ी जातियों में पहुंच बढ़ाना. दूसरा, फूलबाबू और नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेताओं के जरिए मुस्लिम मतदाताओं और बीएसपी के पुराने समर्थकों को आकर्षित करना. तीसरा, बदायूं और बरेली में मिली पिछली चुनावी सफलताओं को पीलीभीत और शाहजहांपुर तक विस्तार देना.
इन कोशिशों से BJP के सामने मुकाबला कठिन हो सकता है लेकिन इसका वास्तविक असर उम्मीदवारों के चयन, जातीय समीकरणों, संगठन की सक्रियता और मतदाताओं के रुझान पर निर्भर करेगा. फिलहाल इतना साफ है कि अखिलेश यादव रुहेलखंड को केवल अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन के रूप में नहीं, बल्कि BJP को चुनौती देने वाले एक अहम चुनावी क्षेत्र के रूप में देख रहे हैं.

