
विधानसभा चुनाव से करीब पांच महीने पहले उत्तर प्रदेश कांग्रेस में बड़ा बदलाव हुआ है. कांग्रेस आलाकमान ने अगस्त 2023 से प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे अजय राय को पद से हटाकर रामपुर खास की विधायक आराधना मिश्रा मोना को प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कमान सौंप दी है.
सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है जबकि देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है. पार्टी के भीतर इस बदलाव को सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष बदलने के तौर पर नहीं देखा जा रहा है.
सूत्रों के मुताबिक अजय राय की विदाई के पीछे संगठन के भीतर लंबे समय से चल रही खींचतान, प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के साथ उनके मतभेद और समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की राजनीति को लेकर दोनों पक्षों के अलग-अलग रुख प्रमुख कारण रहे हैं.
इसके साथ ही कांग्रेस ने नई टीम के जरिए 2027 विधानसभा चुनाव के लिए अपने सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण को भी नए सिरे से साधने की कोशिश की है. अजय राय के नेतृत्व में कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में 6 सीटें जीती थीं और राय खुद वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरे थे.

उन्हें हटाने का फैसला इसलिए भी आसान नहीं था क्योंकि पूर्वांचल में उनकी अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक पकड़ मानी जाती है. कांग्रेस के भीतर उनका एक मजबूत समर्थक वर्ग भी है. इसके बावजूद आलाकमान ने चुनाव से ठीक पहले नेतृत्व परिवर्तन का फैसला किया.
प्रभारी से टकराव बना सबसे बड़ा कारण
पार्टी सूत्रों के मुताबिक अजय राय और प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के बीच पिछले कई महीनों से लगातार मतभेद चल रहे थे. यह टकराव सिर्फ व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं रहा बल्कि संगठन की दिशा और 2027 की चुनावी रणनीति को लेकर भी दोनों नेताओं की राय अलग-अलग थी. आखिरकार गौतम ने आलाकमान को प्रदेश नेतृत्व में बदलाव की जरूरत बताई.
गौतम आंबेडकरवादी राजनीति की पृष्ठभूमि से आते हैं और दलित आधार को कांग्रेस से जोड़ने पर जोर देते रहे हैं. सूत्रों के अनुसार उन्होंने राय की राजनीतिक शैली और उनके मंदिर जाने जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए. उनका तर्क था कि कांग्रेस को दलित मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए अलग तरह की राजनीतिक और संगठनात्मक रणनीति अपनानी होगी.
राय के नेतृत्व में पार्टी जिस तरीके से आगे बढ़ रही थी उससे गौतम पूरी तरह सहमत नहीं थे. संगठन को लेकर भी दोनों के बीच मतभेद सामने आए. गौतम खेमे की शिकायत थी कि प्रदेश अध्यक्ष संगठन में दूसरे नेताओं और पदाधिकारियों को पर्याप्त महत्व नहीं देते. जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व, बहुजन राजनीति और समाजवादी पार्टी के साथ सीट बंटवारे जैसे मुद्दों पर भी दोनों की सोच अलग थी.
टकराव धीरे-धीरे सार्वजनिक भी होने लगा. 23 सितंबर को नाराज कार्यकर्ताओं की बैठक में राजेंद्र पाल गौतम अकेले नजर आए जबकि अजय राय वहां नहीं पहुंचे. इससे प्रदेश कांग्रेस में चल रही खींचतान की चर्चा और तेज हो गई.

दिल्ली में भी दोनों नेताओं के अलग-अलग राजनीतिक संपर्कों की चर्चा थी. राय को संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के करीबी नेताओं में माना जाता है जबकि गौतम को राहुल गांधी का भरोसेमंद माना जाता है.
बदलाव की अटकलों के बीच राय ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी समेत शीर्ष नेताओं से मुलाकात की थी. राय की ओर से यह संकेत भी दिया गया कि प्रदेश नेतृत्व में तत्काल कोई बदलाव नहीं होने जा रहा है. लेकिन अंतिम फैसले में गौतम का पक्ष भारी पड़ा.
सपा से रिश्ते और गठबंधन की चुनौती
अजय राय को हटाने के पीछे दूसरा महत्वपूर्ण पहलू समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस के रिश्ते और 2027 में संभावित सीट बंटवारे की राजनीति को माना जा रहा है. पार्टी के अंदर यह धारणा बनी कि प्रदेश अध्यक्ष और सपा नेतृत्व के बीच बेहतर तालमेल गठबंधन की बातचीत को आसान बना सकता है. अजय राय और अखिलेश यादव के बीच कई मौकों पर राजनीतिक बयानबाजी सामने आई है.
इसका उदाहरण अखिलेश यादव की PDA यात्रा है. जब अखिलेश यादव ने राहुल गांधी के रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र से अपनी यात्रा की शुरुआत की थी तब अजय राय ने तंज करते हुए कहा था कि कांग्रेस के नेता भी कन्नौज, इटावा और सैफई जैसे सपा के मजबूत इलाकों का दौरा कर सकते हैं.
कांग्रेस के एक नेता के मुताबिक इस टिप्पणी पर सपा की ओर से भी प्रतिक्रिया आई थी. सपा नेताओं ने कहा था कि कांग्रेस के लोगों का उसके गढ़ों में स्वागत है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वहां कांग्रेस को वोट मिलेंगे.
ऐसे बयानों ने दोनों दलों के बीच पहले से मौजूद राजनीतिक खींचतान को और उजागर किया. कांग्रेस के भीतर एक धड़ा मानता है कि 2027 में BJP को चुनौती देने के लिए सपा के साथ सीट बंटवारे और साझा रणनीति को लेकर प्रदेश नेतृत्व का तालमेल बेहद महत्वपूर्ण होगा.
ऐसे में अजय राय की जगह आराधना मिश्रा मोना को लाने के फैसले को इस संदर्भ में भी देखा जा रहा है. अराधना मिश्रा मोना और उनके पिता, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी के समाजवादी पार्टी नेतृत्व के साथ पुराने और अपेक्षाकृत बेहतर संबंध हैं. कांग्रेस के एक करीबी नेता का कहना है कि अगर सपा के साथ अजय राय के संबंध बेहतर होते तो शायद उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद पर बनाए रखा जाता.
हालांकि पार्टी के भीतर यह भी साफ है कि अजय राय की विदाई को सिर्फ सपा से उनके रिश्तों के आधार पर नहीं समझा जा सकता. संगठनात्मक टकराव और कांग्रेस की चुनावी रणनीति में बदलाव भी इसके बड़े कारण हैं. राय को लेकर कांग्रेस के भीतर मौजूद समर्थन यह बताता है कि पार्टी ने उन्हें कमजोर नेता मानकर नहीं हटाया है बल्कि 2027 के लिए प्रदेश संगठन की प्राथमिकताएं बदलने का फैसला किया है.
पुराने सामाजिक समीकरण की वापसी
आराधना मिश्रा मोना को प्रदेश अध्यक्ष और इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने नई टीम के जरिए सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश की है. मोना पूर्वी उत्तर प्रदेश से आने वाली ब्राह्मण महिला नेता हैं जबकि मसूद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रमुख मुस्लिम चेहरे हैं. देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को उपाध्यक्ष बनाकर पिछड़े और दलित सामाजिक आधार को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है.
कांग्रेस के लिए यह बदलाव सिर्फ चेहरों का परिवर्तन नहीं है. पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव में अपने पुराने सामाजिक आधार को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है. ब्राह्मण, दलित, मुस्लिम और पिछड़े वर्गों को एक साथ जोड़ने की रणनीति कांग्रेस की पुरानी राजनीति का हिस्सा रही है. नई टीम में इन वर्गों और अलग-अलग क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देकर पार्टी ने इसी दिशा में संकेत दिया है.
इसका एक सीधा संबंध समाजवादी पार्टी के साथ सीट बंटवारे की संभावित बातचीत से भी है. कांग्रेस को जहां सपा के साथ गठबंधन बनाए रखना है वहीं वह अपने लिए अलग सामाजिक और राजनीतिक आधार भी तैयार करना चाहती है.
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की वापसी ने उसे यह भरोसा दिया है कि उत्तर प्रदेश में उसका आधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. अब चुनौती इस आधार को विधानसभा चुनाव में वोट में बदलने की है. अजय राय को हटाने के साथ कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल उनके समर्थक वर्ग को साथ रखने का भी है. भूमिहार समाज से आने वाले राय पूर्वांचल में पार्टी के प्रभावशाली चेहरों में हैं.
वाराणसी से प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ चुनाव लड़कर उन्होंने अपनी राजनीतिक पहचान को और मजबूत किया. 2024 में उन्हें मिले वोटों को कांग्रेस के भीतर उनके राजनीतिक प्रभाव का संकेत माना गया. इसी वजह से लंबे समय तक यह विकल्प भी चर्चा में था कि राय को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखते हुए दो या तीन कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किए जाएं ताकि सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन भी बनाया जा सके. लेकिन अंततः आलाकमान ने पूरा नेतृत्व बदलने का फैसला किया.
पार्टी सूत्रों के अनुसार राय को किसी दूसरे राज्य का प्रभारी बनाए जाने की पेशकश भी की गई थी. हालांकि उन्होंने अपने विधानसभा क्षेत्र पिंड्रा को मजबूत करने और 2027 में वहां से विधानसभा चुनाव की तैयारी पर ध्यान देने की इच्छा जताई है. कांग्रेस के रणनीतिकारों का कहना है कि राय ने प्रदेश अध्यक्ष पद छोड़ने के फैसले का विरोध नहीं किया और 2027 की तैयारी के लिए नई टीम को रास्ता देने पर सहमति जताई.
कांग्रेस के भीतर राय के योगदान को लेकर भी कोई विवाद नहीं है. पार्टी के नेताओं का कहना है कि उन्होंने संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कार्यकर्ताओं के साथ उनका व्यक्तिगत जुड़ाव रहा.
उनकी सामाजिक मौजूदगी से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की पहचान को भी मजबूती मिली. यही कारण है कि अजय राय की विदाई को कांग्रेस ने पूरी तरह राजनीतिक किनारे लगाने के रूप में पेश नहीं किया है. सूत्रों के मुताबिक उन्हें केंद्रीय संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने की संभावना है.

