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तेंदुओं के शिकार पर मध्य प्रदेश वन विभाग और एक NGO में क्यों ठनी?

प्रोजेक्ट चीता वाले इलाके में 10 तेंदुओं के शिकार की घटना के बाद मध्य प्रदेश का वन विभाग और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रही एनजीओ आमने-सामने हैं

तेंदुओं की खाल (फाइल फोटो)
अपडेटेड 28 अगस्त , 2026

मध्य प्रदेश वन विभाग और वन्यजीवों के लिए काम करने वाला एक चर्चित NGO इन दिनों एक-दूसरे के दावों के आमने-सामने हैं. इस टकराव ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में कई सवाल खड़े कर दिए हैं. 

वन विभाग ने NGO के शीर्ष पदाधिकारी पर गंभीर वन्यजीव अपराधों में शामिल होने का आरोप लगाया है. जिस NGO पर आरोप लगे हैं, उसकी वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में मजबूत साख रही है. इससे यह मामला और रहस्यमय हो गया है.

वन विभाग के सूत्रों के मुताबिक 23 जुलाई को आगरा पुलिस और वन विभाग की संयुक्त टीम ने 10 तेंदुओं की खाल के साथ चार लोगों को पकड़ा था. बाद में दो और संदिग्धों वसीम और भगवान सिंह को गिरफ्तार किया गया.

इस एनजीओ का नाम है– वाइल्डलाइफ एसओएस (Wildlife SOS). वन विभाग का दावा है कि गिरफ्तार किए गए दोनों लोगों की मिलीभगत एनजीओ से है. पूछताछ में इन लोगों ने बताया है कि तेंदुओं का शिकार मध्य प्रदेश में कुनो नेशनल पार्क के पास किया गया था. यही इलाका प्रोजेक्ट चीता का केंद्र है.

वन विभाग ने 30 जुलाई को मामला दर्ज किया था. उसका दावा है कि उसके पास डिजिटल सबूत हैं, जिनसे पता चलता है कि वसीम और सिंह वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक और सीईओ कार्तिक सत्यनारायण के संपर्क में थे.

सत्यनारायण ने आरोपों को सिरे से खारिज किया है. उन्हें शिवपुरी में जांच अधिकारी के सामने दो बार पेश होने के लिए बुलाया गया था. सबसे हाल में 24 अगस्त को उन्हें तलब किया गया, लेकिन वे पेश नहीं हुए. 

मध्य प्रदेश की मुख्य वन्यजीव संरक्षक समिता राजोरा ने कहा, "अब हम कार्तिक सत्यनारायण के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी करेंगे. हम उनसे जांच अधिकारी के सामने पेश होने के लिए कह रहे हैं."

कुनो नेशनल पार्ट में प्रोजेक्ट चीता चल रहा है
कुनो नेशनल पार्क में प्रोजेक्ट चीता चल रहा है

वन विभाग का दावा है कि वसीम और सिंह ने शिकारियों को मेटल के फंदे दिए थे. इन फंदों का इस्तेमाल तेंदुओं को मारने और फिर उनकी खाल निकालने के लिए किया गया.

वाइल्डलाइफ एसओएस ने इसके जवाब में कहा कि वह शिकार रोकने के लिए स्थानीय समुदायों के साथ काम करता है और लगाए गए आरोप बेबुनियाद हैं. एनजीओ ने यह भी कहा कि अगर वन विभाग उसके सदस्यों को निशाना बनाता है तो शिकार के खिलाफ जानकारी जुटाने के उसके वैध काम को नुकसान पहुंचेगा, 

इस एनजीओ ने एक लिखित बयान में कहा है, "वाइल्डलाइफ SOS चेतावनी देता है कि वैध तरीके से शिकार के खिलाफ जानकारी जुटाने के काम को वन्यजीव अपराध मानने से भविष्य में वन्यजीव अपराधों पर कार्रवाई करने के प्रयासों पर बुरा असर पड़ सकता है. यह मामला एक गंभीर और बेहद चिंताजनक सवाल उठाता है. अगर मुखबिर, व्हिसलब्लोअर, वन्य जीवों की चिंता करने वाले और शिकार विरोधी अभियान से जुड़े लोग सामने आकर जानकारी साझा करते हैं और जांच एजेंसियों की मदद करते हैं, लेकिन बाद में उनके प्रयासों को उन्हीं अपराधों में भागीदारी के तौर पर गलत समझा जाता है तो उनका क्या होगा? जबकि उन्होंने उन्हीं अपराधों को उजागर करने में मदद की थी."

दूसरी ओर वन विभाग ने कहा कि यह समझ से परे है कि इन मुखबिरों ने तेंदुओं के मारे जाने की सूचना अधिकारियों को क्यों नहीं दी. 

विभाग का दावा है कि जांच के दौरान पता चला कि मुरैना जिले में दो, शिवपुरी में छह और श्योपुर में दो तेंदुओं का शिकार किया गया था. इन जानवरों की हड्डियां और दूसरे अवशेष बरामद की गई खालों से मेल खाते पाए गए.

इन खालों की बरामदगी से मध्य प्रदेश के अधिकारियों की नींद इसलिए भी उड़ गई है क्योंकि तेंदुओं का शिकार कड़ी सुरक्षा वाले चीता क्षेत्र में किया गया था. अगर तेंदुओं के शिकार के लिए फंदों का इस्तेमाल किया जा सकता है तो चीते भी उनमें फंस सकते थे. 

2022 से भारत में अफ्रीकी चीतों को लाने की परियोजना पर प्रधानमंत्री कार्यालय की सीधे नजर है. ऐसे में अगर किसी चीते की मौत होती, तो इसके मध्य प्रदेश के वन विभाग के लिए गंभीर नतीजे हो सकते थे.

सत्यनारायण जांच अधिकारी के सामने पेश नहीं हुए हैं लेकिन उन्होंने कड़े शब्दों में बयान जारी किया है. बयान में कहा गया, "यह चौंकाने वाला है और हम इससे बेहद चिंतित हैं. भारत में नाचने वाले भालुओं को बचाने और अंततः उनके इस्तेमाल पर रोक लगवाने के वर्षों के हमारे बेहद चर्चित प्रयास उन कई कहानियों में से एक हैं, जिन पर हमें गर्व है. भारत के वन्यजीवों और वन संसाधनों के संरक्षण के अगुआ के तौर पर हम उन बेजुबान जीवों की रक्षा करते हैं, उनका संरक्षण करते हैं और उनके स्वास्थ्य एवं कल्याण के लिए योजनाएं बनाते हैं."

वन्यजीवों के लिए काम करने वाले NGO और वन विभाग के अधिकारियों के बीच आम तौर पर वर्षों से सौहार्दपूर्ण संबंध रहे हैं. कई सेवानिवृत्त वन अधिकारी मानद या वेतन के आधार पर NGO से जुड़े हुए हैं. 

NGO के पदाधिकारी राज्य और केंद्र के वन्यजीव सलाहकार बोर्डों में भी शामिल हैं. इससे दोनों के बीच सहयोग का एक रिश्ता दिखाई देता है. लेकिन अब इस रिश्ते पर अविश्वास की छाया मंडरा रही है. मध्य प्रदेश के वन अधिकारी और भारत के प्रमुख वन्यजीव NGO में से एक लगातार आमने-सामने हैं.

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