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रोजगार के बावजूद महिलाओं की आर्थिक स्थिति क्यों नहीं बदल रही?

ग्रामीण महिलाओं की श्रम भागीदारी तेजी से बढ़ी है लेकिन शहरी क्षेत्रों में उनकी हिस्सेदारी लगभग स्थिर है. वहीं बेहतर वेतन और सुरक्षित रोजगार तक पहुंच अब भी सीमित बनी हुई है

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सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 13 जुलाई , 2026

पिछले कुछ वर्षों में भारत में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर (लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट-यानी LFPR) लगातार बढ़ी है और इसे अक्सर अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेतक माना जाता है. लेकिन आंकड़ों को करीब से देखने पर तस्वीर कहीं अधिक जटिल नजर आती है.

इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह ग्रामीण महिलाओं का कम उत्पादकता और कम वेतन वाले कामों में शामिल होना है. दूसरी ओर शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी, जहां ज्यादातर नई नौकरियां, वेतन वृद्धि और आर्थिक अवसर पैदा हुए हैं, लगभग स्थिर बनी हुई है.

महिलाओं की LFPR 2022 में 33.9 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 40 प्रतिशत हो गई. इसकी एक वजह कोविड महामारी के दौरान और उसके बाद मनरेगा (MGNREGA) जैसी सरकारी योजनाओं के तहत रोजगार में बढ़ोतरी भी रही.

हालांकि यह बढ़ोतरी सभी क्षेत्रों में समान नहीं रही. 2022 से 2025 के बीच ग्रामीण महिलाओं की LFPR 37.5 प्रतिशत से बढ़कर 45.9 प्रतिशत हो गई. इसके उलट शहरी महिलाओं की भागीदारी 25 से 28 प्रतिशत के बीच लगभग स्थिर रही.

महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए काम करने वाले संगठन उदैती फाउंडेशन की संस्थापक सीईओ पूजा शर्मा गोयल कहती हैं, "यह बेहद चौंकाने वाली बात है क्योंकि आर्थिक विकास, वेतन वृद्धि और रोजगार के ज्यादातर अवसर शहरी भारत में पैदा हुए हैं. इसके बावजूद महिलाएं न तो इस विकास में योगदान दे पा रही हैं और न ही इसका लाभ उठा रही हैं."

महिलाओं को मिलने वाले काम की गुणवत्ता भी चिंता का विषय है. कामकाजी महिलाओं का बड़ा हिस्सा कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों, खासकर कृषि में, स्वरोजगार (सेल्फ-एम्प्लॉयड) से जुड़ा है. भारत में 11.37 करोड़ स्वरोजगार करने वाली महिलाओं में सिर्फ 1 प्रतिशत ही नियोक्ता (एम्प्लॉयर) हैं, जबकि 44 प्रतिशत महिलाएं बिना वेतन के पारिवारिक कामगार के रूप में काम करती हैं. उन्हें न अपनी कोई आय मिलती है और न ही सामाजिक सुरक्षा.

यही वजह है कि भले ही अधिक महिलाएं कार्यबल में शामिल हो रही हैं लेकिन उनमें से बड़ी संख्या कम वेतन वाली, असंगठित नौकरियों में फंसी हुई है जहां आगे बढ़ने के अवसर बहुत सीमित हैं. इसका मतलब यह भी है कि उनके भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए बीमा, पेंशन या भविष्य निधि (प्रोविडेंट फंड) जैसी कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं होती.

ग्रामीण क्षेत्रों में यह स्थिति और भी स्पष्ट है. वहां 70 प्रतिशत महिलाएं स्वरोजगार में हैं और कृषि या कम उत्पादकता वाले काम करती हैं. इनमें से 33 प्रतिशत को कोई भुगतान नहीं मिलता. इससे संकेत मिलता है कि परिवार के पुरुष सदस्य बेहतर आर्थिक अवसरों की तलाश में बाहर चले जाते हैं और महिलाएं परिवार के खेतों में काम करती रहती हैं. वहीं 20 प्रतिशत महिलाएं दिहाड़ी मजदूर हैं और सिर्फ 9.3 प्रतिशत के पास वेतनभोगी नौकरी है.

महिलाओं की कमाई में भी नौकरियों की खराब गुणवत्ता साफ दिखाई देती है. वेतनभोगी रोजगार में महिलाओं की औसत मासिक आय 18,353 रुपए है, जो पुरुषों की तुलना में 24 प्रतिशत कम है. स्वरोजगार में यह अंतर और भी बड़ा है. वहां महिलाओं की औसत आय सिर्फ 6,374 रुपए है, जबकि पुरुषों की औसत आय 17,914 रुपए है. यानी 64 प्रतिशत का अंतर.

एक और महत्वपूर्ण रुझान यह है कि महिलाएं आमतौर पर 30 वर्ष की उम्र के बाद ही कार्यबल में शामिल होती हैं. इसकी बड़ी वजह यह है कि तब तक शादी और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारियां कुछ कम हो जाती हैं. इसका नतीजा यह होता है कि ग्रेजुएशन के तुरंत बाद के अपने सबसे उत्पादक कमाई वाले वर्षों का बड़ा हिस्सा वे गंवा देती हैं.

गोयल के मुताबिक, महिलाओं के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना बेहद जरूरी है. युवा महिलाओं को काम के लिए ग्रामीण इलाकों से अर्ध-शहरी और शहरी क्षेत्रों में जाने के लिए अधिक सहयोग मिलना चाहिए. साथ ही राज्यों को स्थानीय आर्थिक अवसरों की पहचान कर महिलाओं के घरों के पास बेहतर गुणवत्ता वाली नौकरियां पैदा करनी चाहिए और उन्हें सक्रिय रूप से कार्यबल से जोड़ना चाहिए.

कृषि क्षेत्र में किसान उत्पादक संगठन (FPO) और सहकारी ढांचे के जरिए उत्पादकता बढ़ाने से महिलाएं वैल्यू चेन में ऊपर बढ़ सकती हैं और बेहतर आय अर्जित कर सकती हैं.

उत्तर प्रदेश में एक पायलट परियोजना के दौरान उदैती फाउंडेशन ने पाया कि लॉजिस्टिक्स, रिटेल और फ्लेक्सी-स्टाफिंग क्षेत्रों में महिलाओं के लिए लगभग 10,000 नौकरियां उपलब्ध थीं. लेकिन कई महिलाओं को इन अवसरों की जानकारी ही नहीं थी. फ्लेक्सी-स्टाफिंग (Flexi Staffing) ऐसी रोजगार व्यवस्था है जिसमें कर्मचारी किसी कंपनी के लिए काम तो करता है, लेकिन उसका नियोक्ता कोई दूसरी स्टाफिंग एजेंसी होती है. यानी कर्मचारी को काम एक कंपनी में मिलता है, जबकि उसकी भर्ती, वेतन, ईपीएफ, ईएसआई जैसी औपचारिक जिम्मेदारियां स्टाफिंग एजेंसी संभालती है

जिला स्तर के रोजगार कार्यालय महिलाओं तक पहुंचने में काफी हद तक विफल रहे और उनकी पहुंच मुख्य रूप से पुरुषों तक ही सीमित रही. महिलाओं के सामने प्रेरणा देने वाले उदाहरण (रोल मॉडल) भी कम थे. इसलिए वे इन नौकरियों की आकांक्षा भी नहीं कर सकीं क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था कि ऐसे अवसर मौजूद हैं.

केवल अधिक महिलाओं को कार्यबल में शामिल करना पर्याप्त नहीं है. असली चुनौती बेहतर गुणवत्ता वाली नौकरियां पैदा करना, शहरी रोजगार तक महिलाओं की पहुंच बढ़ाना, बच्चों की देखभाल और आवागमन (मोबिलिटी) से जुड़ा बुनियादी ढांचा मजबूत करना और यह सुनिश्चित करना है कि महिलाएं अधिक उत्पादक कामों तक पहुंच सकें. तभी श्रम बल में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी अधिक आय और समावेशी आर्थिक विकास में बदल सकेगी.

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