हाल के वर्षों में भारत के सबसे बड़े छात्र आंदोलनों में से एक का समापन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ जंतर-मंतर पर हुआ. राजनीतिक रूप से यह मामला सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है. इसका असर उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
दिल्ली में हुए प्रदर्शन, विपक्ष के लगातार हमले और प्रवेश परीक्षाओं में हुई गड़बड़ियों को लेकर मोदी सरकार की आलोचना के बावजूद भारतीय जनता पार्टी कई दिनों तक धर्मेंद्र प्रधान के बचाव में खड़ी रही लेकिन जब आंदोलन ने थमने का नाम नहीं लिया और बड़ा राजनीतिक रूप लेना शुरू कर दिया तब BJP ने अपना रुख बदल दिया.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी के इस फैसले के पीछे उत्तर प्रदेश को लेकर चुनावी रणनीति भी एक बड़ी वजह हो सकती है. अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं. पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश में सरकारी भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक और नौकरियों में देरी को लेकर लगातार विवाद होते रहे हैं.
साल 2024 में योगी आदित्यनाथ सरकार को पेपर लीक के आरोपों के बाद पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी. इससे करीब 67 हजार पदों के लिए आवेदन करने वाले लगभग 48 लाख अभ्यर्थियों का भविष्य अधर में लटक गया था. इसके बाद राज्य के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे.
जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन के समर्थन में भी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में युवाओं ने प्रदर्शन किए. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि युवाओं के भीतर पहले से मौजूद इस नाराजगी ने दिल्ली के आंदोलन को उत्तर प्रदेश में भी बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया.
बीजेपी की चिंता तब और बढ़ गई जब विपक्ष, खासकर समाजवादी पार्टी, खुलकर प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ खड़ी दिखाई दी. आंदोलन की शुरुआत से ही सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने छात्रों का समर्थन किया. सांसद डिंपल यादव समेत पार्टी के कई नेता दिल्ली के प्रदर्शन में शामिल हुए.
इसी दौरान प्रधानमंत्री आवास के पास प्रदर्शन कर रहे अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया और उसकी तस्वीरें चारों तरफ फैल गईं जिसने यह धारणा और मजबूत कर दी कि विपक्ष इस मुद्दे पर एकजुट होकर अभियान चला रहा है.
समाजवादी पार्टी के लिए यह आंदोलन ऐसा मुद्दा बनकर उभरा जिसने जाति और धर्म की सीमाओं को मानने से इंकार कर दिया. भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों का असर लगभग हर सामाजिक वर्ग के छात्रों पर पड़ता है. यही वजह है कि बेरोजगारी और सरकारी भर्तियों का मुद्दा पहले से ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण रहा है और इस आंदोलन ने उसे और अधिक राजनीतिक महत्व दे दिया.
आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कॉकरोच जनता पार्टी ने ऐलान किया है कि यदि पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियां जारी रहीं तो उसका अगला बड़ा अभियान उत्तर प्रदेश में होगा. ऐसे में बीजेपी के लिए यह और बड़ी चिंता का सबब है.
इसकी टाइमिंग भी राजनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही है क्योंकि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव जैसा प्रदर्शन दोहराने की कोशिश करेंगी. उस चुनाव में दोनों दलों के गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी को उसके बड़ा चुनावी झटका दिया था. साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर सपा ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीती थीं. इससे राज्य में बीजेपी का संसदीय दबदबा काफी कम हुआ था. यह भी माना गया कि इस गठबंधन ने उन भाजपा विरोधी मतदाताओं को एक मंच पर ला दिया जो पहले अलग-अलग बंटे हुए थे.
हालांकि उत्तर प्रदेश में बीजेपी की चुनौती सिर्फ यही नहीं है. अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी विवाद भी विपक्ष को सरकार पर हमला करने का बड़ा मौका दे चुका है. यह मुद्दा अब धीरे-धीरे पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े सवालों का रूप लेता जा रहा है जबकि राम मंदिर बीजेपी की सबसे अहम वैचारिक और राजनीतिक परियोजनाओं में से एक रहा है.
इन्हीं सब कारणों की वजह से धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सिर्फ एक केंद्रीय मंत्री के पद छोड़ने तक सीमित नहीं माना जा रहा. कई राजनीतिक जानकारों के अनुसार यह उस मुद्दे पर बीजेपी के पीछे हटने का संकेत है जिसने छात्रों और पहली बार मतदान करने वाले युवाओं के बीच तेजी से राजनीतिक समर्थन हासिल किया.
विपक्ष के लिए धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस विश्वास को और मजबूत करता है कि यदि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस मिलकर लगातार जन आंदोलन चलाएं तो बीजेपी को बैकफुट पर लाया जा सकता है. उत्तर प्रदेश अब विधानसभा चुनावों की ओर बढ़ रहा है. ऐसे में मुकाबला किसी एक मुद्दे तक सीमित नहीं रहेगा. भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियां, पेपर लीक, छात्रों की नाराजगी, राम मंदिर चंदा विवाद और सुशासन जैसे मुद्दे मिलकर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ एक बड़े राजनीतिक हथियार का रूप ले सकते हैं.

