scorecardresearch
डार्क मोड

इतिहासकार सुमित सरकार ने कैसे सुलझाई थी हिंदुत्व की गुत्थी?

पिछले दिनों इतिहासकार सुमित सरकार का देहावसान हो गया. सुमित सरकार के लिए इतिहास हिंदुत्व का महज वैचारिक सहचर नहीं बल्कि उसका एक जरूरी राजनीतिक औजार है

इतिहासकार सुमित सरकार (फोटो: इंडिया टुडे समूह)
अपडेटेड 18 अगस्त , 2026

शान कश्यप

इस लेख में इतिहासकार सुमित सरकार (1939-2026) की सहायता से हिंदुत्व और इतिहासलेखन में उस वैचारिक ढर्रे की गंभीर रुचि पर विचार किया गया है. केवल एक विषयवस्तु पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह यह है कि इतिहासकारों पर लिखते हुए ऐसी चर्चा और ऐसे तथ्य दोहराने का कोई लाभ नहीं जिसे आम पाठक अब “गूगल” कर सकता है. डिजिटल और पोस्ट-लिटरेट युग में विशेषज्ञता के महत्व को बचाए रखने का पहला कदम यही है कि इतिहासकार हर बार इस दावे को झुठला दें कि इतिहास केवल मोबाइल या कंप्यूटर स्क्रीन पर पढ़ और समझ लिया जा सकता है. जैसा कि स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक सैम वाइनबर्ग ने अपनी किताब में पूछा है- वाई लर्न हिस्ट्री? (वेन इट्स आलरेडी ऑन योर फोन).

सुमित सरकार के लिए इतिहास हिंदुत्व का महज वैचारिक सहचर नहीं बल्कि उसका एक जरूरी राजनीतिक औजार है. खाकी शॉर्ट्स एंड सैफरन फ्लैग्स (1993), इंडियन नेशनलिज्म एंड पॉलिटिक्स ऑफ हिंदुत्व (1996), द बीजेपी बॉम्ब एंड एस्पेक्ट्स ऑफ नेशनलिज्म (1998), इंटीमेशंस ऑफ हिंदुत्व (1999), हिंदुत्व एंड हिस्ट्री (2002), जैसे कई हस्तक्षेपों में और टुवर्ड्स फ्रीडम के संपादकीय बचाव को एक साथ पढ़ें तो उनकी केंद्रीय थीसिस साफ उभरती है. सरकार का मत था कि हिंदुत्व को एक ऐसे कामचलाऊ अतीत की आवश्यकता है, जिसके सहारे हिंदू एकता गढ़ी जा सके, मुसलमानों को स्थायी राष्ट्रीय खतरे के रूप में पेश किया जा सके और स्वतंत्रता आंदोलन से अपने सौतेले रिश्ते पर पर्दा डाला जा सके.

सरकार के लिए पहला सवाल ही यह है कि हिंदू एकता कोई सामाजिक तथ्य नहीं है. भारत के हिंदू जाति, क्षेत्र, भाषा, संप्रदाय, वर्ग और स्थानीय रीति-रिवाजों के आधार पर विभाजित रहे हैं. दूसरी ओर हिंदू और मुसलमान गांव, पेशे, भाषाएं और क्षेत्रीय संस्कृतियां साझा करते आए हैं. इसलिए हिंदू और मुसलमान का बैर रोजमर्रा में स्वतः नहीं बनता, बल्कि उसे लगातार वैचारिक परिश्रम से पैदा करना पड़ता है. इस काम के लिए इतिहास सबसे असरदार माध्यम है.

भीतरी और बाहरी का भेद

इंडियन नेशनलिज्म एंड पॉलिटिक्स ऑफ हिंदुत्व में सरकार दो बड़े राजनीतिक संक्रमणों की पहचान करते हैं. पहला उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में आया, जब औपनिवेशिक जनगणना, आधुनिक संचार, प्रशासन और प्रिंट संस्कृति ने हिंदू धर्म को एक सीमाबद्ध, एकीकृत समुदाय की तरह देखने में मदद की. दूसरा 1920 के दशक के मध्य में, जब हिंदू पहचान को एक आक्रामक राजनीतिक कार्यक्रम में बदला गया—इस धारणा के साथ कि सामने एक उतना ही एकजुट और शत्रुतापूर्ण ‘मुस्लिम अन्य’ मौजूद है.

यह बदलाव जाति की राजनीति में उभरती नई हलचलों से भी जुड़ा था. औपनिवेशिक काल में आए इस बदलाव की व्यापकता का एक मोटा अंदाजा इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी की मुद्रित बंगाली पुस्तिकाओं की वर्गीकृत सूची से लगाया जा सकता है. 1905 से पहले कास्ट्स एंड ट्राइब्स शीर्षक के अंतर्गत केवल 24 प्रविष्टियां थीं; इसके विपरीत, 1905–20 के बीच ऐसे 140 शीर्षक दर्ज हुए. निचली जातियों के संगठन और आंदोलन सार्वजनिक जीवन में अधिक मुखर हो रहे थे. उसी नागपुर ने जहां 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना हुई थी, मई 1920 में ऑल-इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज कांफ्रेंस की मेजबानी की थी. यह डॉ भीमराव आंबेडकर के दलित नेता के रूप में उभार का एक अहम पड़ाव था. आरएसएस ने भी “ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण संघर्ष” को हिंदू समाज के सामने मौजूद खतरों में गिन लिया.

यहीं सुमित सरकार का तर्क और दिलचस्प हो जाता है. हिंदुत्व केवल कथित मुस्लिम खतरे के जवाब के रूप में सामने नहीं आया. वह एक ऐसे पदानुक्रमित हिंदू समाज को एकजुट रखने का प्रयास करता रहा जिसमें निचली जातियां अपने हक और हिस्सेदारी का दावा कर रही थीं. तरकीब सीधी थी और है—हिंदू समाज के अंदर की गैर-बराबरी से ध्यान हटाकर बाहर के दुश्मन पर ध्यान लगाओ.

विनायक दामोदर सावरकर (1883-1966) की एसेंशियल्स ऑफ हिंदुत्व (1923) ने इसका सूत्र दिया. उन्होंने पितृभूमि को पुण्यभूमि से जोड़ दिया. भारत हिंदुओं के लिए दोनों था. मुसलमानों और ईसाइयों के लिए नहीं. इस तर्क की भाषा तो सांस्कृतिक थी, लेकिन नतीजा स्पष्ट रूप से राजनीतिक-- हिंदू पहचान पूर्ण राष्ट्रीय संबद्धता की कसौटी बन गई. सुमित सरकार के अनुसार इसका असली निशाना ब्रिटिश नहीं, भारतीय मुसलमान और ईसाई थे. सावरकर ने राष्ट्रवाद को औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष से अपने आंदोलन और वैचारिकी को हटाकर हिंदू सभ्यतागत स्वामित्व के सिद्धांत में बदल दिया!

विनायक दामोदर सावरकर

माधव सदाशिवराव गोलवलकर (1906-1973) ने वी, ऑर, आवर नेशनहुड डिफाइंड (1939) ने इसी तर्क को और स्पष्ट, बल्कि अधिनायकवादी रूप दिया. क्षेत्रीय राष्ट्रवाद और साझा खतरे को राष्ट्र की बुनियाद मानने से इनकार करते हुए उन्होंने राष्ट्र को हिंदू जाति, धर्म, संस्कृति और भाषा पर आधारित माना. मुसलमान और ईसाई इस राष्ट्र में तभी रह सकते थे, जब वे हिंदू प्रभुत्व स्वीकार करें. सरकार गोलवलकर द्वारा नाजी जर्मनी की यहूदियों के प्रति नस्ली नीति की प्रशंसा को भी इसी तर्क से जोड़ते हैं: सवाल केवल एक आपत्तिजनक उद्धरण का नहीं, बल्कि शुद्धीकृत ऐतिहासिक समुदाय और अधीनस्थ अल्पसंख्यकों वाले राज्य के रिश्ते का है.

आरएसएस और आगे की बात

आरएसएस का शुरुआती इतिहास भी इस राजनीति की पुष्टि करता है. 1925 में नागपुर में विजयादशमी के दिन संगठन बना; 1926 में रामनवमी पर उसका नाम और राम से जुड़ा भगवा ध्वज अपनाया गया. शाखाओं में किशोरों को व्यायाम, खेल, प्रार्थना, लाठी, तलवार और कटार का प्रशिक्षण मिलता और शिवाजी तथा राणा प्रताप की मुसलमानों से लड़ाइयों की कथाएं सुनाई जातीं. यानी शुरुआत से ही अनुष्ठान, सैन्य अनुशासन और ऐतिहासिक स्मृति को जोड़ा गया.

1940 के दशक में आरएसएस सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो आंदोलन, आजाद हिंद फौज के अभियान, आईएनए मुकदमों के विरोध और रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह से दूर रहा, फिर भी उसका संगठन बढ़ता गया. खाकी शॉर्ट्स एंड सैफरन फ्लैग्स (1993) के अनुसार 1940–42 के बीच शाखाओं की संख्या कथित तौर पर दोगुनी हुई और 1945 तक लगभग 10,000 स्वयंसेवक ऑफिसर्स ट्रेनिंग कैंप (ओटीसी) में प्रशिक्षण ले चुके थे.

सितंबर 1942 में सावरकर ने सरकारी सेवाओं, परिषदों, स्थानीय निकायों और सशस्त्र बलों में मौजूद हिंदू महासभा सदस्यों को अपने पदों पर बने रहने को कहा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उस समय बंगाल सरकार में मंत्री थे जब तामलुक में राज्य हिंसक दमन कर रहा था. बाद में मुखर्जी ने मंत्रिपद से इस्तीफा जरूर दिया लेकिन उनके “प्रांत का प्रशासन इस तरह चलाया जाना चाहिए कि कांग्रेस की तमाम कोशिशों के बावजूद, उसका आंदोलन प्रांत में जड़ न जमा सके.” जैसे अनेक कथनों को कैसे समझा जाए?

सुमित सरकार का निष्कर्ष है कि हिंदू दक्षिणपंथ, मुस्लिम लीग की ही तरह, ब्रिटिश दमन का कभी बड़ा निशाना नहीं बना. आज इस निष्कर्ष को और खुलकर सामने रखने की आवश्यकता है जबकि मुखर्जी का पश्चिम बंगाल में राजनीतिक पुनर्वास करने की राजकीय योजना को कई बौद्धिकों का खुला समर्थन मिल रहा है.

1947 के बाद स्वतंत्रता आंदोलन के कई महत्वपूर्ण पड़ावों पर हिंदू दक्षिणपंथ की अनुपस्थिति असुविधाजनक बन गई. स्वतंत्रता आंदोलन ने आधुनिक भारत की राजनीतिक भाषा का गढ़ा था. लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, सामाजिक न्याय, श्रमिक अधिकार, किसान लामबंदी और संवैधानिक नागरिकता जैसे शब्द ही राजनीतिक समझ की मियाद तय करने वाले थे. कांग्रेसियों, गांधीवादियों, समाजवादियों, कम्युनिस्टों और आंबेडकरवादियों में गहरे मतभेद तो जरूर थे, मगर सबने गरीबी और गैर-बराबरी से मुठभेड़ की. इसके बरक्स सुमित सरकार सावरकर और गोलवलकर के यहां इन कई सवालों पर चुप्पी को रेखांकित करते हैं. हिंदुत्व को इसलिए एक दूसरी राष्ट्रीय कथा चाहिए थी—लोकतांत्रिक भारत के निर्माण की नहीं, बल्कि मुस्लिम आघात से प्राचीन हिंदू राष्ट्र की पुनर्प्राप्ति की.

यह कथा हिंदू प्राचीनता, मुस्लिम मध्यकाल और ब्रिटिश आधुनिकता के त्रिखंडीय विभाजन पर टिकी थी. सरकार इसकी जड़ें जेम्स मिल की इतिहास-विभाजन योजना में देखते हैं. हिंदुत्व ने इसे गढ़ा नहीं, लेकिन जन-राजनीति का हथियार जरूर बना दिया. मध्यकालीन भारत फिर इस्लामिक विजय, जबरन धर्मांतरण, मंदिर-विध्वंस और हिंदू प्रतिरोध के एकरंगी युग में बदल गया.

पेशेवर इतिहासकारों से बैर

आधुनिक इतिहासलेखन ने इस तस्वीर को चुनौती दी. मुस्लिम किसान और कारीगर किसी एक ‘मुस्लिम शासक वर्ग’ का हिस्सा नहीं थे. राजपूतों सहित अनेक हिंदू अभिजात मुगल प्रशासन में ऊंचे पदों पर थे और औरंगजेब के समय मनसबदारी में हिंदुओं का अनुपात बढ़ा. रोमिला थापर ने सोमनाथ की कथा के बार-बार दोहराए और बदले गए रूपों को दिखाया. ब्रजदुलाल चट्टोपाध्याय ने बताया कि संस्कृत स्रोतों में राजनीतिक शत्रुओं को अक्सर धार्मिक नहीं, बल्कि जातीय, वंशीय या राजवंशीय शब्दों में देखा गया. इसी तर्ज पर सुमित सरकार मंदिर-विध्वंस या उत्पीड़न से इनकार नहीं करते; उनका आग्रह इतना है कि चुनी हुई घटनाएं पूरे मध्यकाल की मुकम्मल व्याख्या नहीं बन सकतीं. बड़े पैमाने के सांप्रदायिक दंगे उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से पहले दुर्लभ थे; 1890 के दशक से बढ़े और 1920 के दशक के बाद तेज हुए.

इसीलिए पेशेवर इतिहासकार असुविधाजनक हो जाता है. अपने लेख हिंदुत्व एंड हिस्ट्री  में सुमित सरकार 1977–78 में एनसीईआरटी की किताबों पर हमलों, बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि से जुड़े अप्रमाणित दावों, भाजपा-शासित राज्यों में पाठ्यपुस्तकों के सांप्रदायिकीकरण, 1998 के बाद भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद के पुनर्गठन और टुवर्ड्स फ्रीडम पर पूर्व-सेंसरशिप की कोशिशों का उल्लेख करते हैं.

टुवर्ड्स फ्रीडम विवाद ने बात और साफ कर दी. 1946 के खंड में ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन, राजनीतिक संगठन, मजदूर-किसान संघर्ष, सांप्रदायिक हिंसा, सांप्रदायिकता-विरोधी पहल और रियासतों के संघर्ष दर्ज थे. बड़े औपनिवेशिक-विरोधी संघर्षों में आरएसएस की अनुपस्थिति कोई संपादकीय षड्यंत्र नहीं, रिकॉर्ड का हिस्सा थी. अभिलेख ने वही दिखाया जिसे हिंदुत्व की पसंदीदा कथा छिपाना चाहती थी.

आखिरकार, सरकार के लिए हिंदुत्व की राजनीति में इतिहास के तीन काम हैं: भीतर से विभाजित हिंदुओं को एक राजनीतिक ब्लॉक में बदलना; मुसलमानों को एक विरासत में मिले स्थायी दुश्मन के रूप में पेश करना; और राष्ट्रवाद को स्वतंत्रता आंदोलन से हटाकर एक काल्पनिक, सदियों पुराने हिंदू-मुस्लिम संघर्ष में स्थापित करना. इसीलिए पाठ्यपुस्तकों, अभिलेखागारों, स्मारकों और ऐतिहासिक संस्थानों पर जंग छिड़ती है. हिंदू पीड़ा और मुस्लिम आक्रामकता के इर्द-गिर्द संगठित अतीत के बिना हिंदुत्व अपनी राजनीतिक राष्ट्र-कल्पना की ऐतिहासिक बुनियाद खो देता है.

पिछले दिनों सुमित सरकार के देहावसान के बाद “हिस्ट्री फ्रॉम बिलो” की युक्ति को बहुत याद किया गया. लेकिन अब शायद यह अधिक ध्यान देना होगा कि जैसे “…सर्वहारा के बिना बुर्जुआ वर्ग का कोई अस्तित्व ही नहीं होता.” ठीक उसी तरह नए भारत की समझ में हिन्दुत्व को केवल अलगाव में देखने से उसकी प्रभावशीलता का विश्लेषण नहीं किया जा सकता. यह समझना और समझाना भी उतना ही जरूरी है कि हिंदुत्व की वैचारिकी स्वतंत्रता आंदोलन से इतना दूर रहते हुए भी आज सत्ता पर कैसे काबिज हो गई. इन सवालों पर सोचने के लिए सुमित सरकार के यहां कई संकेत हैं, बस अगर उन पर पुनर्विचार हो.

(शान कश्यप इतिहासकार और हू ओन्स द पास्ट? हाउ हिस्टोरियंस (री)रोट इंडियाज पास्ट एंड प्रेजेंट, 1870-2020 के लेखक हैं)

ADVERTISEMENT
Advertisement