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वे गलतियां जो विदेश में पढ़ाई का प्लान कर सकती हैं चौपट

यूनिवर्सिटी की शिक्षा जिंदगी के सबसे बड़े इन्वेस्टमेंट में से एक है, इसलिए यह समझना जरूरी है कि आगे चलकर इससे कितना और कैसा रिटर्न मिलेगा

भारत उन देशों में शामिल हैं जहां से पढ़ने के लिए सबसे ज्यादा छात्र बाहर जाते हैं
अपडेटेड 22 जुलाई , 2026

ज्यादातर भारतीय छात्रों के लिए विदेश में पढ़ाई करना आज भी जिंदगी बदल देने का ख्वाब है. भारत दुनिया के उन देशों में हैं जहां से सबसे ज्यादा छात्र पढ़ने के लिए विदेश जाते हैं. इस समय करीब 18 लाख भारतीय विदेशों में शिक्षा हासिल कर रहे हैं. लेकिन सफलता सिर्फ शीर्ष विदेशी यूनिवर्सिटी में दाखिला मिलने पर निर्भर नहीं करती. यह इस बात पर भी निर्भर करती है कि छात्र अपनी शिक्षा को अपने भविष्य के करियर से कितनी अच्छी तरह जोड़ पाते हैं. इसलिए यूनिवर्सिटी का चुनाव एक निवेश के तौर पर देखा जाना चाहिए. इसमें रोजगार पाने की संभावना और निवेश पर रिटर्न जैसे पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है.

विदेशों में पढ़ाई के लिए मौके उपलब्ध कराने वाली एजेंसी MSM Unify के संस्थापक और निदेशक संजय लाल कहते हैं कि आज के छात्र पहले से कहीं ज्यादा नतीजों पर ध्यान दे रहे हैं. उन्हें तीन बुनियादी सवालों से शुरुआत करनी चाहिए. पहला, मैं किस करियर नतीजे की दिशा में काम कर रहा हूं? दूसरा, क्या मैं रहने के खर्च और अचानक आने वाले खर्चों समेत पूरी पढ़ाई का खर्च वास्तव में उठा सकता हूं? और तीसरा, क्या चुना गया देश ग्रेजुएशन के बाद इंटर्नशिप, रोजगार और कौशल विकास के मजबूत अवसर देता है?

रैंकिंग से आगे देखें

रैंकिंग एक उपयोगी पैमाना हो सकती है लेकिन यह फैसला लेने की पूरी प्रक्रिया का सिर्फ एक हिस्सा है. ज्यादातर वैश्विक रैंकिंग प्रणालियां रिसर्च प्रोडक्टिविटी (शोध की उत्पादकता), संस्थान की प्रतिष्ठा और शिक्षकों रिसर्च साइटेशन जैसे मानकों पर आधारित होती हैं. ये कारक महत्वपूर्ण हैं लेकिन इनसे हमेशा रोजगार पाने की संभावना, इंटर्नशिप और सफलतापूर्वक पढ़ाई पूरी करने की दर का पता नहीं चलता.

संजय लाल कहते हैं, “स्कूल चुनते समय यह देखना चाहिए कि यूनिवर्सिटी अपने छात्रों को इंडस्ट्री से कितनी अच्छी तरह जोड़ती है, वहां पढ़ाए जाने वाले कोर्स मौजूदा बाजार की मांगों को कितना पूरा करते हैं और ग्रेजुएशन के बाद कितने पूर्व छात्र नौकरी हासिल कर पाते हैं.”

बड़े व्यापारिक केंद्रों, तकनीकी विकास, चिकित्सा सेवाओं या इनोवेशन के केंद्रों के पास स्थित स्कूल नेटवर्किंग और व्यावहारिक रूप से सीखने के बेहतर अवसर देते हैं. छात्रों की सबसे बड़ी गलतियों में से एक यह हो सकती है कि वे केवल किसी खास समय की अनुकूल वीजा नीति के आधार पर किसी देश का चुनाव कर लें. इमिग्रेशन और पढ़ाई के बाद काम करने के विकल्पों से जुड़े नियम बहुत तेजी से बदल सकते हैं. इसके मुकाबले कुशल कर्मचारियों की मांग अधिक स्थिर रहेगी.

इसलिए छात्रों को ऐसे देशों का चुनाव करना चाहिए, जहां अर्थव्यवस्था अच्छी हो, रणनीतिक उद्योगों में कर्मचारियों की कमी हो और वैश्विक प्रतिभाओं को आकर्षित करने की परंपरा हो. अध्ययनों में पाया गया है कि पढ़ाई के बाद काम करने के सुनिश्चित विकल्पों से छात्रों का आत्मविश्वास बढ़ा है.

एक व्यवहारिक फायनेंशियल प्लान बनाएं

कुछ मामलों में चुने गए देश के आधार पर रहने का खर्च कुल बजट का 30 से 50 फीसदी तक हो सकता है. संभावित छात्रों के लिए आवास, परिवहन, स्वास्थ्य बीमा, वीजा फीस, किताबों, यात्रा और आपातकालीन खर्चों का बजट बनाना जरूरी है. लाल के मुताबिक, “विदेशी मुद्रा की दरों में होने वाले उतार-चढ़ाव पर भी ध्यान देना चाहिए. मुद्रा दरों में छोटे बदलाव भी दो साल के स्टडी प्रोग्राम के दौरान बहुत अधिक खर्च में बदल सकते हैं.

छात्रों और उनके माता-पिता को स्कॉलरशिप प्रोग्राम, असिस्टेंटशिप (सहायक के तौर पर मिलने वाली आर्थिक मदद), ग्रांट और पार्ट-टाइम काम के विकल्पों की जांच करनी चाहिए. इससे उनका वित्तीय बोझ कम हो सकता है.” छात्रों के लिए अपने अनुमानित बजट से 10 से 15 फीसदी अधिक रकम की व्यवस्था रखना बेहतर है.

नौकरियां, कौशल और बहुत कुछ

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सस्टेनेबिलिटी (पर्यावरणीय और आर्थिक स्थिरता), हेल्थकेयर और डिजिटल टेक्नोलॉजीज जॉब मार्केट को बदल रही हैं. छात्रों को अब सिर्फ यह पूछने से आगे बढ़ना चाहिए कि “आज किन नौकरियों की मांग है?” इसके बजाय उन्हें पूछना चाहिए, “अगले दशक में कौन से स्किल अहम बने रहेंगे?”

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2025 के अनुसार, 2030 तक दुनियाभर में 9.2 करोड़ नौकरियां खत्म होने की आशंका है. वहीं, 17 करोड़ नई नौकरियां पैदा होने का अनुमान है. इस तरह कुल मिलाकर 7.8 करोड़ नौकरियों की बढ़ोतरी होगी. आखिरकार सब कुछ स्किल के लिए तैयार रहने पर निर्भर करता है.

संजय लाल कहते हैं, “किसी प्रोग्राम का आकलन करते समय छात्रों को देखना चाहिए कि उसका सिलेबस कितनी बार अपडेट होता है, उसमें AI, डेटा लिटरेसी (डेटा को समझने और उसका इस्तेमाल करने की क्षमता), सस्टेनेबिलिटी और डिजिटल इनोवेशन को शामिल किया गया है या नहीं और यह इंडस्ट्री की जरूरतों से कितना मेल खाता है.”

तकनीकी क्षमताओं के अलावा, आजकल कई कंपनियां ऐसे उम्मीदवारों की तलाश करती हैं जिनमें मजबूत विश्लेषणात्मक क्षमता, रचनात्मकता, लचीलापन और समस्याओं को हल करने की क्षमता हो. रिसर्च से यह भी साबित होता है कि इंटर्नशिप या किसी भी तरह का काम का अनुभव रखने वाले छात्रों के नौकरी पाने की संभावना काफी अधिक होती है.

मुख्य बात 2030 में सबसे प्रसिद्ध प्रोग्राम ढूंढना नहीं है. जरूरी यह है कि छात्र जीवनभर सीखते रहने और अपने पूरे करियर के दौरान टेक्नोलॉजी के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार रहें. AI के दौर में सफलता उन्हीं को मिलेगी जो टेक्नोलॉजी और मानवीय समझ को वैश्विक नजरिए के साथ जोड़ना जानते हैं.

इन गलतियों से बचें

छात्रों की सबसे बड़ी गलतियों में से एक है पहले देश चुनना और बाद में कोर्स. जगह को लेकर पसंद होना स्वाभाविक है. लेकिन लंबे समय में सफलता देश के बजाय कोर्स की गुणवत्ता, उसकी प्रासंगिकता और नौकरी व इंटर्नशिप की संभावनाओं पर ज्यादा निर्भर करती है. संजय लाल कहते हैं, “अक्सर छात्र कोर्स की संरचना और प्लेसमेंट जैसे पहलुओं को नजरअंदाज करते हुए यूनिवर्सिटी की रैंकिंग पर अटक जाते हैं.”

एक और आम गलती है किसी देश को सिर्फ इसलिए चुनना क्योंकि वह उस समय ट्रेंड में है. इस दौरान वहां उपलब्ध कोर्स की प्रासंगिकता पर ध्यान नहीं दिया जाता. कुछ छात्र शिक्षा की कुल लागत या ग्रेजुएशन के बाद नौकरी की वास्तविक संभावनाओं का आकलन करने में भी नाकाम रहते हैं.

सबसे पहले करियर का लक्ष्य तय करना जरूरी है. इसके बाद उस लक्ष्य के आधार पर कोर्स, यूनिवर्सिटी और जगह का आकलन करना चाहिए. ये कारक बेहद महत्वपूर्ण हैं और अक्सर छात्र की कुल सफलता की दिशा तय करते हैं.

विदेश में पढ़ाई का मतलब पूरी तरह अलग संस्कृति, शिक्षा व्यवस्था और माहौल के साथ खुद को ढालना भी है. मजबूत सपोर्ट सिस्टम (सहायता व्यवस्था) इस बदलाव को आसान बनाते हैं.

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