‘इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ’ में युवा नेताओं ने दावा किया कि भारत में छात्र राजनीति आज भी लोकतंत्र, संघवाद और शिक्षा के भविष्य पर बहस का एक अहम मंच बनी हुई है. कोच्चि में हुए आयोजित कॉन्क्लेव के सत्र ‘फ्रॉम प्रोटेस्ट टू पावर: द पॉलिटिक्स ऑफ यंग इंडिया’ में चर्चा का बड़ा हिस्सा शिक्षा में केंद्र सरकार की बढ़ती भूमिका और नीतियों को चुनौती देने के लिए छात्रों को उपलब्ध जगह पर केंद्रित रहा.
इस बहस की एक अहम संवैधानिक पृष्ठभूमि भी है. शिक्षा समवर्ती सूची में है, यानी संसद और राज्य विधानसभाओं दोनों की इसमें भूमिका है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में भी इसे स्वीकार किया गया है.
इसमें स्थानीय संदर्भ का सम्मान करने और शिक्षा को समवर्ती विषय मानने की बात कही गई है. इसमें राज्यों की सरकारों से सलाह लेकर नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क की रूपरेखा तैयार करने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) को देने की भी बात है.
तमिलनाडु में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) की अध्यक्ष एस. मृदुला ने कहा कि इसके बावजूद महत्वपूर्ण फैसलों में राज्यों की भूमिका लगातार कम की जा रही है. उन्होंने लंबे समय से राष्ट्रीय चिकित्सा प्रवेश परीक्षा (NEET) का विरोध कर रहे तमिलनाडु का उदाहरण दिया.
2021 में तमिलनाडु विधानसभा ने NEET के आधार पर स्नातक चिकित्सा पाठ्यक्रमों में दाखिले से छूट की मांग वाला एक विधेयक पारित किया था. राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक समिति ने इसके गरीब, ग्रामीण और सरकारी स्कूलों के छात्रों पर असर को लेकर चिंता जताई थी. बाद में राज्यपाल ने विधेयक को यह कहते हुए वापस कर दिया कि इससे वंचित छात्रों पर पड़ने वाले असर को लेकर उनका नजरिया अलग है.
कॉक्रोच जनता पार्टी (CJP) के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी और दक्षिण भारत के प्रभारी विजय रेड्डी मल्लांगी ने भी कहा कि शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में ज्यादा विकेंद्रीकरण की जरूरत है.
वहीं ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (AIDSO) के कर्नाटक राज्य सचिव अजय कामथ ने कहा कि संस्थान छात्रों को प्रभावित करने वाली नीतियां लागू कर रहे हैं लेकिन संगठित विरोध के प्रति उनकी स्वीकार्यता कम होती जा रही है.
केरल स्टूडेंट्स यूनियन के राज्य अध्यक्ष डॉ. एलोशियस जेवियर ने कहा कि विरोध-प्रदर्शन का अधिकार भी कुछ सीमाओं के साथ आता है. उन्होंने कहा कि जब प्रदर्शन हिंसक हो जाएं या लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ जाने लगें तो सरकारों को कार्रवाई करनी चाहिए.
छात्र राजनीति की प्रासंगिकता भी चर्चा का एक अहम मुद्दा रही. दिल्ली विश्वविद्यालय पर 2026 में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि छात्र राजनीति में भागीदारी से राजनीतिक जागरूकता बढ़ सकती है. हालांकिसंस्थागत बाधाएं और राजनीतिक हिंसा सार्थक लोकतांत्रिक भागीदारी को सीमित कर सकती हैं.
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के राष्ट्रीय सचिव श्रवण बी. राज के मुताबिक डिजिटल बदलाव ने कैंपस की राजनीति को अप्रासंगिक नहीं बनाया है. उनका तर्क था कि सोशल मीडिया लोगों को जोड़ सकता है, लेकिन आमने-सामने के व्यक्तिगत संपर्क की पूरी तरह जगह नहीं ले सकता.
यह बात व्यापक शोध से भी सामने आती है. 2026 के एक मेटा-विश्लेषण में सोशल मीडिया के इस्तेमाल और युवाओं की राजनीतिक भागीदारी के बीच महत्वपूर्ण संबंध पाया गया. हालांकि इसमें यह भी कहा गया कि ऑफलाइन माहौल अब भी लोगों की राजनीतिक भागीदारी को प्रभावित करने वाला अहम कारक है.
सत्र की खास बातें
डॉ. एलोशियस जेवियर :
"अगर विरोध-प्रदर्शन, अनुमति मिलने के बावजूद, हिंसा का कारण बनते हैं या लोकतंत्र के खिलाफ जाते हैं तो सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए."
एस. मृदुला:
"केंद्र को राज्यों की बात सुननी चाहिए और बिना सलाह-मशविरा किए फैसले नहीं लेने चाहिए. वे राज्यों को अपनी बात रखने का मौका नहीं दे रहे हैं. तमिलनाडु एक दशक से ज्यादा समय से NEET के खिलाफ लड़ रहा है, लेकिन हमारी बात नहीं सुनी गई."
विजय रेड्डी मल्लांगी:
"शैक्षणिक पाठ्यक्रमों के केंद्रीकरण का विरोध किया जाना चाहिए. इसे विकेंद्रीकृत करने की जरूरत है. NEP राज्यों के अधिकार छीनती है."
अजय कामथ:
"आज संस्थान नहीं चाहते कि छात्रों की अपनी आवाज हो. वे छात्र विरोधी नीतियां लागू करते हैं लेकिन नहीं चाहते कि छात्र उनके खिलाफ संगठित हों."
श्रवण बी. राज:
"सोशल मीडिया के बढ़ने के बाद कैंपस की राजनीति काफी बदल गई है, लेकिन छात्र संगठन अब भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि सोशल मीडिया लोगों को जोड़ता है. सार्थक व्यक्तिगत संपर्क सिर्फ आमने-सामने ही हो सकता है."

