केरल की स्टार्ट-अप कहानी अब सिर्फ सॉफ्टवेयर और सर्विस तक सीमित नहीं है. युवा उद्यमी रोबोट, असिस्टिव तकनीक और सेमीकंडक्टर की बौद्धिक संपदा तैयार कर रहे हैं. ये तकनीकें मैनुअल स्कैवेंजिंग और ऑटिज्म थेरेपी से लेकर सैटेलाइट कम्युनिकेशन तक की समस्याओं को हल करने के लिए विकसित की जा रही हैं.
इस सफर से जुड़े तीन लोगों ने 30 सितंबर को कोच्चि में हुए ‘इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ’ के ‘द सदर्न स्टार्ट-अप मोमेंट: अपॉर्च्युनिटीज एंड चैलेंजेज’ सत्र में अपने अनुभव साझा किए.
जेनरोबोटिक इनोवेशंस के सह-संस्थापक और निदेशक राशिद करीमबनक्कल ने बताया कि उनकी उद्यमिता की शुरुआत कॉलेज से हुई. वहां इंजीनियरिंग के छात्रों का एक समूह राष्ट्रीय सेवा योजना के जरिए एक-दूसरे से जुड़ा था.
कालिकट में मैनहोल की सफाई के दौरान तीन लोगों की मौत की एक घटना के बाद उन्होंने बैंडिकूट नाम का रोबोट विकसित किया. इसका मकसद इंसानों को सीवर की सफाई में उतारे बिना यह काम करना था.
करीमबनक्कल की कंपनी के 400 से ज्यादा रोबोट अब 22 राज्यों में काम कर रहे हैं. कंपनी ने मलेशिया, सिंगापुर और दक्षिण अफ्रीका तक भी विस्तार किया है. वह अब हेल्थकेयर, रक्षा और अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी काम कर रही है. करीमबनक्कल ने बताया कि कंपनी को हाल ही में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) से एक ऑर्डर भी मिला है.
एमब्राइट इंफोटेक के संस्थापक और सीईओ सत्यनारायणन ए.आर. ने ऑटिज्म और व्यवहार संबंधी प्रशिक्षण के लिए तकनीक तैयार करने की चुनौतियों के बारे में बताया. उनकी कंपनी का ऑटिकेयर प्लेटफॉर्म इमर्सिव टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करता है.
इसके जरिए बच्चों का कई मानकों पर आकलन किया जाता है और थेरेपिस्ट उनके लिए इलाज और प्रशिक्षण को जरूरत के मुताबिक तैयार कर सकते हैं. 30 सदस्यों की टीम से शुरू हुई यह कंपनी अब 215 लोगों की हो गई है और उसकी तकनीक 50 से ज्यादा केंद्रों में इस्तेमाल हो रही है.
हालांकि सत्यनारायणन ने कहा कि बड़ी चुनौती संस्थानों को इस तकनीक को अपनाने के लिए तैयार करना है. इसकी वजह यह है कि इस सीमित क्षेत्र में अभी भी पारंपरिक मानव संसाधन उपलब्ध हैं.
सिलिजियम सर्किट्स के सह-संस्थापक और सीईओ रिजिन जॉन स्टार्ट-अप के सेमीकंडक्टर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं. उनकी कंपनी 4G, 5G और 6G जैसी वायरलेस तकनीकों के लिए सेमीकंडक्टर की बौद्धिक संपदा विकसित करती है.
उन्होंने बताया कि कंपनी ने जीपीएस के स्वदेशी विकल्प की रणनीतिक जरूरत को पूरा करने के मकसद से काम शुरू किया था. इसके तहत उन्होंने नैविगेशन विद इंडियन कॉनस्टिलेशन (NavIC) से जुड़ी तकनीक विकसित की. उनके सामने सेमीकंडक्टर डिजाइन के महंगे टूल, कुशल कर्मचारियों की कमी और फंडिंग जैसी चुनौतियां सामने आईं.
तीनों उद्यमियों की बात में एक समान बात यह थी कि सबसे बड़ा मौका उन मुश्किल और खास समस्याओं को हल करने में है जिनका दायरा स्पष्ट रूप से तय हो. सिर्फ बाजार में पहले से मौजूद उत्पादों की नकल करने में नहीं. उन्होंने सरकारी मदद, स्थानीय प्रतिभा और बाजार तक पहुंच के महत्व पर भी जोर दिया.
केरल के स्टार्ट-अप के लिए एक और चुनौती राज्य से बाहर विस्तार करने की है. सत्यनारायणन ने कहा कि जब स्थानीय मांग पर्याप्त नहीं हो तो उद्यमियों को दूसरे राज्यों और ग्लोबल मार्केट की ओर देखना चाहिए.
जॉन ने कहा कि स्टार्ट-अप ग्लोबल कंपनियों से इसलिए मुकाबला कर सकते हैं क्योंकि उनका आकार छोटा होता है वे तेजी से बदलाव के मुताबिक खुद को ढाल सकते हैं और खास तकनीकों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं.
सत्र की खास बातें
राशिद करीमबनक्कल :
- "हम सैनिटेशन वर्कर्स की जिंदगी बदलना चाहते हैं."
- "जहां भी इंसान तकलीफ में हैं, वहां उनकी जिंदगी आसान बनाने के लिए हमें रोबोट का इस्तेमाल करना होगा."
- "अगर सामाजिक सरोकार और जुनून साथ आ जाएं तो यह शानदार होता है. हम कमाल कर सकते हैं."
सत्यनारायणन ए.आर. :
- "हमारे सामने चुनौती यह है कि इस बाजार में प्रवेश करना मुश्किल है क्योंकि यह बहुत सीमित क्षेत्र है."
- "हमने जो उत्पाद बनाया है, उसके लिए बाजार अभी तैयार नहीं है."
- "AI ट्रेनिंग के क्षेत्र में केरल के स्टार्ट-अप के लिए कई मौके हैं."
रिजिन जॉन :
- "आपको एक कदम आगे की सोचनी होगी क्योंकि आपके उत्पाद को इन ग्लोबल कंपनियों से मुकाबला करना है."
- "स्टार्ट-अप होने के नाते आप इन दिग्गज कंपनियों की तुलना में छोटे, आसानी से बदलाव के मुताबिक ढलने वाले और लचीले होते हैं."
- "किसी बेहद खास क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करना हमारे लिए फायदेमंद होगा. इससे बाजार में जगह बनाने में मदद मिलेगी."

