
बांग्लादेश में हिंसक जनविद्रोह के बीच सत्ता छोड़कर देश से भागने के ठीक दो साल बाद, पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 5 अगस्त को घोषणा की है कि वे इस साल के अंत से पहले बांग्लादेश लौटना चाहती हैं. हालांकि वहां उन्हें मौत की सजा सुनाई जा चुकी है और उनके खिलाफ कई आपराधिक मामले भी चल रहे हैं.
5 अगस्त 2024 को ढाका छोड़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया के साथ अपनी पहली वर्चुअल बातचीत में हसीना के साथ उनके बेटे सजीब वाजेद जॉय और अवामी लीग के कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे.
इनमें पूर्व शिक्षा मंत्री मोहिबुल हसन चौधरी नोफेल भी शामिल थे. इस कार्यक्रम का आयोजन नई दिल्ली में फॉरेन करेस्पॉन्डेंट्स क्लब ऑफ साउथ एशिया ने किया था.
78 वर्षीय हसीना ने कहा कि डर उन्हें बांग्लादेश लौटने से नहीं रोक सकता. उन्होंने कहा, "मुझे जेल भेजा जा सकता है या मेरी हत्या की जा सकती है लेकिन डर यह तय नहीं कर सकता कि लोगों के प्रति मेरा कर्तव्य क्या है. मेरी वापसी सत्ता के लिए नहीं है, बल्कि बांग्लादेश को फिर सही रास्ते पर लाने के लिए है."
हसीना ने कहा कि वे दिसंबर में लौटना चाहती हैं और समय आने पर तारीख की घोषणा करेंगी. उन्होंने कहा, "मैं लौटना चाहती हूं क्योंकि बांग्लादेश के लोग सुरक्षा, विकास, समृद्धि और शांति के हकदार हैं. वे ऐसे देश के हकदार हैं, जिसका उन्होंने सपना देखा था और ऐसी अर्थव्यवस्था के भी, जो उन्हें अवसर दे. मैं लोगों के साथ खड़े होने और उनका जीवन बेहतर बनाने के लिए लौटना चाहती हूं. जनता ही सारी शक्ति का स्रोत है."
पूर्व प्रधानमंत्री ढाका छोड़ने के बाद से भारत में रह रही हैं. उस समय छात्रों के नेतृत्व में शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन देशव्यापी आंदोलन में बदल गया था, जिसने उनकी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया. इसके बाद बांग्लादेश के एक ट्रिब्यूनल ने उनकी गैरमौजूदगी में उन्हें मानवता के खिलाफ अपराध का दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई. हसीना ने इस फैसले को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया है.

हसीना ने 2024 के आंदोलन को लेकर प्रचलित धारणा को चुनौती दी. उन्होंने कहा कि यह न तो स्वतःस्फूर्त था और न ही शांतिपूर्ण. उनके अनुसार, संगठित राजनीतिक समूहों ने छात्रों की वास्तविक शिकायतों का इस्तेमाल सत्ता परिवर्तन कराने के लिए किया.
उन्होंने आरोप लगाया, "मेरी सरकार ने बातचीत, कानूनी प्रक्रिया और धैर्य के जरिए इस मुद्दे को शांतिपूर्वक सुलझाने की कोशिश की. लेकिन सुधार की भाषा के पीछे संगठित समूह छात्रों की मांगों को हिंसक राजनीतिक हथियार में बदलने में लगे हुए थे."
हसीना ने अपने दावे के समर्थन में बांग्लादेश की तत्कालीन अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस के एक बयान का भी हवाला दिया. उन्होंने कहा, "मोहम्मद यूनुस ने खुद कहा था कि यह बेहद सुनियोजित आंदोलन था, जिसका एक मास्टरमाइंड था. उनके शब्द सच्चाई उजागर करते हैं. यह केवल स्वतःस्फूर्त छात्र आंदोलन नहीं था. इसका कोई जिम्मेदार और सामने दिखने वाला नेतृत्व नहीं था. निर्देश पर्दे के पीछे से दिए जा रहे थे. यह संगठित और निर्देशित आंदोलन था, जिसका इस्तेमाल मतपेटी के बाहर सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बनाने के लिए किया गया."
अशांति से निपटने में अपनी सरकार की भूमिका का बचाव करते हुए उन्होंने कहा, "जब पुलिस थानों और सरकारी इमारतों को जलाया और लूटा जाता है, तब क्या सरकार का जीवन और संपत्ति की रक्षा करना कोई कर्तव्य नहीं है?"
पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ने 18 जुलाई 2024 को अशांति के दौरान हुई हर मौत की जांच के लिए एक न्यायिक जांच आयोग बनाया था. लेकिन बाद में आई सरकार ने इस प्रक्रिया को छोड़ दिया.
निर्वासन के अपने दौर को याद करते हुए हसीना भावुक नजर आईं. उन्होंने 1975 में अपने परिवार के सदस्यों की हत्या का जिक्र किया और अपनी मौजूदा स्थिति से उसकी तुलना की. उन्होंने कहा, "मैं उस व्यक्ति के रूप में बोल रही हूं जिसने अपना पूरा जीवन बांग्लादेश के लोगों के साथ बिताया और जिसे अपने देश से दूर रहने के लिए मजबूर किया गया. लेकिन मैं कभी भी अपने लोगों से अलग नहीं हुई."
उन्होंने कहा, "पिछले दो वर्षों से मैं अपने प्रिय बांग्लादेश को पीड़ित होते देख रही हूं. यह वह बांग्लादेश नहीं है, जिसे हमने बनाया था. यह वह बांग्लादेश भी नहीं है, जिसके लिए 1971 में 30 लाख लोगों ने अपनी जान कुर्बान की थी."
हसीना ने भारत को बांग्लादेश का स्थाई मित्र बताया और उन्हें शरण देने के लिए नई दिल्ली का धन्यवाद किया. वहीं उनके बेटे सजीब वाजेद जॉय ने कहा कि भारत में उनके साथ ‘राष्ट्राध्यक्ष’ जैसा व्यवहार किया गया है.

सजीब ने कहा, "भारत उनके साथ राष्ट्राध्यक्ष जैसा व्यवहार कर रहा है और उनका बहुत अच्छे से ख्याल रख रहा है. वह यहां पूरी सुरक्षा के साथ रह रही हैं. प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने उन्हें पूरा सम्मान दिया है."
क्या भारत सरकार को शेख हसीना की वापसी की योजना की जानकारी थी, इस सवाल पर सजीब ने कहा कि उनकी मंशा पहले ही ‘अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां’ बन चुकी है. उनका इशारा था कि भारतीय अधिकारियों को इसकी जानकारी स्वाभाविक रूप से होगी.
सजीब ने अवामी लीग के कामकाज का जोरदार बचाव किया और बांग्लादेश के मौजूदा नेतृत्व पर तीखा हमला बोला. उन्होंने आरोप लगाया कि अवामी लीग के हजारों नेताओं और कार्यकर्ताओं को बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में लिया गया है.
उनका यह भी दावा था कि बांग्लादेश "भारत की पूर्वी सीमा पर दूसरा पाकिस्तान" बन गया है. उन्होंने चेतावनी दी कि इस्लामी चरमपंथी आतंकियों की रिहाई क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है.
इससे पहले मोहिबुल हसन चौधरी नोफेल ने कहा कि हसीना का उद्देश्य बदला लेना नहीं, बल्कि न्याय हासिल करना है. उन्होंने कहा, "वे बांग्लादेश लौटना चाहती हैं. वे बदला नहीं, बल्कि निष्पक्ष न्याय चाहती हैं."
यह कार्यक्रम पहले ही एक कूटनीतिक विवाद का कारण बन चुका था. 4 अगस्त को बांग्लादेश की ओर से हसीना के प्रस्तावित संबोधन पर चिंता जताए जाने के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने खुद को इस कार्यक्रम से अलग कर लिया था.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, "यह कार्यक्रम एक निजी मीडिया संस्था आयोजित कर रही है. सरकार की इसमें किसी भी तरह की कोई भूमिका नहीं है और न ही इस मंच पर व्यक्त किए जाने वाले किसी भी विचार का वह समर्थन करती है."
इसके बावजूद बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने नई दिल्ली में हसीना के मीडिया से संवाद की अनुमति देने के लिए भारत की आलोचना की. मंत्रालय ने कहा कि इस कार्यक्रम ने दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचाया है और बांग्लादेश के लोगों की भावनाओं को आहत किया है.
जुलाई क्रांति की दूसरी वर्षगांठ पर जारी एक कड़े बयान में मंत्रालय ने कहा कि ढाका इस बात से ‘आक्रोशित’ है कि "फरार और नरसंहार के दोषी करार दी गई शेख हसीना को नई दिल्ली में मीडिया से लाइव बातचीत की अनुमति दी गई, जहां उन्होंने और उनके सहयोगियों ने बांग्लादेश और उसके लोगों के खिलाफ जहरीली बयानबाजी की."
मंत्रालय ने कहा कि उसने इस कार्यक्रम को लेकर पहले ही भारत सरकार के सामने अपनी चिंता जाहिर कर दी थी. इसके बावजूद, "हमारे द्विपक्षीय संबंधों को फिर से पटरी पर लाने के प्रयासों पर इस कार्यक्रम के संभावित प्रभाव को लेकर पहले से चिंता जताए जाने के बावजूद इसे आयोजित करने की अनुमति दी गई."
बयान में हसीना की मौजूदगी को "बांग्लादेश की संप्रभुता का अपमान और जुलाई क्रांति के शहीदों का गंभीर अपमान" बताया गया. साथ ही उन पर जुलाई-अगस्त 2024 की हिंसा को लेकर संयुक्त राष्ट्र के निष्कर्षों को नकारने की कोशिश करने का आरोप लगाया गया.
मंत्रालय ने उनके बयान को "इतिहास की धारा को पलटने की एक निष्फल कोशिश" बताया. साथ ही कहा कि "बांग्लादेश के लोग अतीत में भी ऐसी घृणित कोशिशों को खारिज कर चुके हैं और आज भी कर रहे हैं."
मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि "हमारे लोगों ने दृढ़ संकल्प लिया है कि हमारा देश कभी भी फासीवाद के अंधकारमय दौर में वापस नहीं जाएगा और बांग्लादेश कभी किसी का आश्रित राष्ट्र नहीं बनेगा." बयान में यह भी कहा गया कि "सामूहिक हत्याओं की दोषी हसीना और उनका माफिया तंत्र बांग्लादेश की राजनीति में कभी जगह नहीं पाएगा."
भारत के साथ "संप्रभु समानता, पारस्परिक सम्मान, एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने और राष्ट्रीय गरिमा" के आधार पर रचनात्मक, पारस्परिक रूप से लाभकारी और भविष्य की ओर देखने वाले संबंधों की इच्छा दोहराते हुए मंत्रालय ने निराशा जताई कि 2013 की बांग्लादेश-भारत प्रत्यर्पण संधि के तहत हसीना के प्रत्यर्पण के उसके अनुरोध पर "अब तक कोई जवाब नहीं मिला है."
बयान के अंत में कहा गया कि किसी भी बहाने से हसीना को मीडिया से खुलकर बातचीत करने का अवसर देना "हमारे लोगों की भावनाओं को गहराई से आहत करता है और बांग्लादेश तथा भारत के बीच सौहार्दपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों के विकास के लिए नुकसानदेह है."
इससे पहले बांग्लादेश ने भारत से आग्रह किया था कि वह हसीना और प्रतिबंधित अवामी लीग के नेताओं को भारतीय भूमि का इस्तेमाल राजनीतिक गतिविधियों के लिए न करने दे. उसका कहना था कि इससे बांग्लादेश में अस्थिरता पैदा हो सकती है.
बांग्लादेश ने घरेलू मीडिया संगठनों को भी हसीना का भाषण प्रसारित या प्रकाशित करने से रोक दिया. अवामी लीग ने इस फैसले की निंदा करते हुए सरकार पर मीडिया को डराने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन करने का आरोप लगाया.
यह कूटनीतिक घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत और बांग्लादेश संबंधों को फिर से बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं. बांग्लादेश लगातार हसीना के प्रत्यर्पण की मांग करता रहा है जबकि भारत का कहना है कि इस अनुरोध की कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच की जा रही है.
इस साल ढाका में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की सरकार बनने के बाद दोनों देशों ने रिश्ते सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं. भारत ने सितंबर में नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के लिए बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को आमंत्रित किया है.
ऐसे माहौल में हसीना की वापसी की घोषणा बांग्लादेश की पहले से ध्रुवीकृत राजनीति में नई अनिश्चितता पैदा कर सकती है. हालांकि वे अपने इरादे में सफल होंगी या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है.
बांग्लादेश में उनके खिलाफ चल रहे कानूनी मामले अब भी प्रभावी हैं. लेकिन हसीना ने अपने इरादे को लेकर कोई संदेह नहीं छोड़ा. उन्होंने कहा, "मुझे गिरफ्तार किया जा सकता है, जेल भेजा जा सकता है. मेरी हत्या भी की जा सकती है. फिर भी मैं अपने लोगों के पास लौटूंगी."

