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डार्क मोड

दूध और यज्ञ-हवन का सामान नदियों को प्रदूषित करता है?

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने भारत की नदियों में दूध और अन्य धार्मिक सामग्री बहाने से होने वाले प्रदूषण और पर्यावरणीय असर पर नई बहस छेड़ दी है

नदियों में पूजा-पाठ से होने वाले प्रदूषण को लेकर उठ रहे सवाल
नदियों में पूजा-पाठ से होने वाले प्रदूषण को लेकर उठ रहे सवाल
अपडेटेड 13 जुलाई , 2026

सदियों से भारत की नदियां सिर्फ जल स्रोत नहीं रही हैं बल्कि इन्हें मां, देवी और जीवनदायिनी भी माना जाता है. श्रद्धालु आस्था के प्रतीक के तौर पर नदियों में पूजा-अर्चना करते हैं और फूल, भोजन, दूध, यहां तक कि मृतकों की अस्थियां भी प्रवाहित करते हैं.

हालांकि नदियों में पूजा-सामग्री और अन्य धार्मिक चढ़ावे प्रवाहित करने के मुद्दे पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के हालिया आदेश ने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है. अब चर्चा इस बात पर शुरू हो गई है कि धार्मिक आस्था कहां खत्म होती है और पर्यावरण प्रदूषण कहां से शुरू होता है.

यह बहस NGT की भोपाल स्थित केंद्रीय पीठ के सामने आए एक अनोखे मामले से शुरू हुई. याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के सतदेव गांव में एक धार्मिक आयोजन के दौरान आयोजकों ने नर्मदा नदी में करीब 11,000 लीटर दूध प्रवाहित किया. इतना ही नहीं धार्मिक अनुष्ठान के तहत 210 साड़ियां भी नदी में प्रवाहित की गईं.

याचिकाकर्ता सिद्धार्थ सिंह राजपूत का कहना था कि ऐसे कामों से पानी दूषित हो सकता है. इतना ही नहीं, इससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों को नुकसान पहुंच सकता है और नदी के नीचे के हिस्सों में पीने के पानी तथा सिंचाई की व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है. हालांकि, न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह और कार्यकारी सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने एक अहम बात कही. उनके सामने ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण पेश नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि नदी में दूध डालने से वास्तव में प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है.

इसी वजह से यह मामला सामान्य पर्यावरणीय शिकायत से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण बन गया. इस प्रथा की तुरंत आलोचना करने के बजाय NGT ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से यह जांचने को कहा कि क्या इस तरह की धार्मिक सामग्री चढ़ाना मौजूदा नियमों के दायरे में आता है? साथ ही NGT ने CPCB से यह भी पूछा है कि क्या इससे प्रदूषण होता है और क्या इसके लिए अलग दिशा-निर्देश बनाने की जरूरत है.

NGT के आदेश ने कानून से जुड़ा एक धुंधला क्षेत्र भी सामने रखा है. भारत के पर्यावरण कानून जल स्रोतों में प्रदूषक छोड़ने पर रोक लगाते हैं लेकिन कई धार्मिक चढ़ावे जैविक या प्राकृतिक रूप से गलने-सड़ने वाली सामग्री से जुड़े होते हैं. उदाहरण के लिए दूध कोई जहरीला औद्योगिक कचरा नहीं है.

असली सवाल यह है कि अगर बड़ी मात्रा में जैविक पदार्थ नदी में डाले जाएं तो क्या इससे पानी की गुणवत्ता बदल सकती है. यानी जलीय जीवन प्रभावित हो सकता है?

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि मात्रा सबसे महत्वपूर्ण है. प्रतीकात्मक रूप से कुछ लीटर दूध डालने से शायद कोई खास असर न पड़े लेकिन एक ही जगह हजारों लीटर दूध बहाने से स्थानीय जल गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है. इसी तरह मूर्ति विसर्जन, प्लास्टिक में लिपटे फूल, कपड़े और खाद्य सामग्री नदी में डालने को लेकर भी पहले चिंता जताई जाती रही है.

दूसरी ओर, पानी से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान भारतीय समाज में गहराई से जुड़े हुए हैं. देशभर के तीर्थस्थलों पर श्रद्धालु पुण्य कमाने के उद्देश्य से मछलियों को खाना खिलाते हैं. कई जगह लोग आटे की गोलियां, ब्रेड, मुरमुरे, अनाज और दूसरी खाद्य सामग्री नदियों और तालाबों में डालते हैं क्योंकि उनका मानना है कि जलीय जीवों को भोजन कराने से पुण्य मिलता है.

आलोचकों का कहना है कि जरूरत से ज्यादा भोजन डालने से जल पारिस्थितिकी तंत्र बदल सकता है. बाहरी प्रजातियों को बढ़ावा मिल सकता है और जैविक कचरा भी बढ़ सकता है. वहीं समर्थकों का तर्क है कि सदियों से मछलियों को भोजन कराया जाता रहा है. इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है. उनके अनुसार यह जीवों के प्रति करुणा का प्रतीक है.

यह विवाद तब और जटिल हो जाता है जब हिंदू अंतिम संस्कार की परंपराओं को देखा जाए. दाह संस्कार के बाद अस्थियों का नदी में विसर्जन हिंदू धर्म के सबसे पवित्र संस्कारों में से एक है. अगर पर्यावरणीय नियम धार्मिक चढ़ावों की जांच करने लगें तो यह सवाल अहम हो जाता है कि आखिर आस्था और पर्यावरणीय नुकसान के बीच सीमा कहां तय की जाएगी?

शायद यही वजह है कि NGT ने कोई समाधान सुझाने से पहले वैज्ञानिक प्रमाण मांगे हैं. भारत में पहले भी ऐसे विवाद सामने आ चुके हैं. अदालतों और पर्यावरण एजेंसियों ने प्लास्टर ऑफ पेरिस, सिंथेटिक रंगों और जहरीले रसायनों से बनी मूर्तियों के विसर्जन को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए हैं. कई शहर अब पर्यावरण के अनुकूल मूर्तियों और अलग विसर्जन तालाबों को बढ़ावा देते हैं. ये कदम ऐसे प्रदूषकों पर केंद्रित हैं जिनका असर साबित हो चुका है.

दूध और दूसरी जैविक सामग्री अलग श्रेणी में आती हैं. ये प्राकृतिक रूप से गल जाती हैं लेकिन अगर इनकी मात्रा बहुत ज्यादा हो तो यह जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकती है. हालांकि धार्मिक आयोजनों में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली मात्रा से वास्तव में कितना असर पड़ता है, इस पर अब तक पर्याप्त अध्ययन नहीं हुआ है.

इसलिए NGT का यह आदेश सिर्फ मध्य प्रदेश के एक गांव तक सीमित नहीं रह सकता. इससे यह व्यापक वैज्ञानिक जांच शुरू हो सकती है कि धार्मिक चढ़ावा नदियों को किस तरह प्रभावित करते हैं और क्या प्रतीकात्मक धार्मिक अनुष्ठानों और बड़ी मात्रा में सामग्री प्रवाहित करने के बीच अंतर किया जाना चाहिए.

भविष्य में अगर कोई दिशा-निर्देश बनते हैं तो उन्हें बहुत संतुलन के साथ तैयार करना होगा. बहुत सख्त नियम लोगों में यह भावना पैदा कर सकते हैं कि उनकी आस्था को निशाना बनाया जा रहा है. दूसरी ओर, अगर धार्मिक गतिविधियों को पूरी तरह पर्यावरणीय जांच से बाहर रखा गया तो नदियों के संरक्षण के प्रयास कमजोर पड़ सकते हैं, जबकि भारत की कई नदियां पहले ही सीवेज, औद्योगिक कचरे और कृषि से होने वाले प्रदूषण के गंभीर दबाव में हैं.

NGT का रुख बीच का रास्ता अपनाने जैसा है. उसने पहले से कोई निष्कर्ष मानने के बजाय प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों को इस मुद्दे का अध्ययन करने को कहा है. इससे एक स्थानीय विवाद राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है. इस अध्ययन के नतीजे शायद उस सवाल का जवाब दे सकें, जिससे भारत लंबे समय से बचता रहा है.

यह गंभीर सवाल यह है कि क्या पर्यावरण संकट के दौर में सदियों पुराने धार्मिक अनुष्ठान पहले की तरह जारी रह सकते हैं, या फिर जब उनका असर नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है तो उनकी भी वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए? NGT का संकेत यही है कि इस सवाल का जवाब भावनाओं या विचारधारा से नहीं बल्कि वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर तय होना चाहिए.

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