
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ने 7 अक्टूबर को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी का ऐलान किया. रेपो रेट वह दर है जिस पर RBI कमर्शियल बैंकों को कर्ज देता है. इस घोषणा के साथ दिए गए RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा के संबोधन से दो अहम बातें सामने आईं.
पहली बात यह है कि ब्याज दरों में कटौती का दौर अब समाप्त हो गया है. अब दरें या तो मौजूदा स्तर पर बनी रहेंगी या फिर इनमें बढ़ोतरी होगी क्योंकि RBI ने अपनी नीतिगत रुख ‘न्यूट्रल (तटस्थ)’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग (संतुलित सख्ती)’ कर दिया है.
दूसरी बात यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले वित्त वर्ष की 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर को बरकरार नहीं रख पाएगी और FY27 में यह घटकर 7 फीसदी से थोड़ी ऊपर रह जाएगी. नई संशोधित रेपो दर अब 5.5 प्रतिशत हो गई है.
महंगाई बढ़ने और पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण पहले से ही यह उम्मीद थी कि RBI ब्याज दरें बढ़ा सकता है. अगस्त में खुदरा महंगाई 4.82 फीसदी दर्ज की गई जो जुलाई में 4.44 फीसदी थी. इसकी वजह खाने-पीने की चीजों और ईंधन की कीमतों में हुई बढ़ोतरी रही.
सितंबर के महंगाई के आंकड़े जल्द जारी होने की उम्मीद है. न्यूज रिपोर्ट्स के मुताबिक इसके करीब 5.5 फीसदी रहने की संभावना है. RBI ने वित्त वर्ष 2027 यानी FY27 के लिए अपने महंगाई के अनुमान को बढ़ाकर 5.2 फीसदी कर दिया है. RBI ने कहा कि FY27 की तीसरी तिमाही में महंगाई 6 फीसदी तक पहुंच सकती है. इसके बाद FY27 की चौथी तिमाही और FY28 की पहली तिमाही में इसमें कमी आने की उम्मीद है.

महंगाई बढ़ाने वाले दो अहम कारण हैं. पहला कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, जो करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं और दूसरा मानसून की अनिश्चितता. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून 13 फीसदी बारिश की कमी के साथ समाप्त हुआ. इससे देश के कुछ हिस्सों में पानी की कमी हुई और फसलों को नुकसान पहुंचा.
इसी समय प्रशांत महासागर के ऊपर अल नीनो तेजी से प्रभावी हुआ है और जिसके सर्दियों के दौरान भी मौसम को प्रभावित करते रहने की संभावना है. रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने कहा है कि इस साल के अंत तक यह घटना 'अत्यंत तीव्र' श्रेणी में पहुंच सकती है.
दूसरा कारण भू-राजनीतिक अनिश्चितता है. ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत एक बार फिर 100 डॉलर के पार पहुंच गई है. लेकिन इससे भी बड़ी चिंता लॉजिस्टिक्स की लागत को लेकर है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान से बने लगातार खतरे के बावजूद खाड़ी के कई तेल उत्पादकों ने होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते जहाजों की आवाजाही फिर से शुरू कर दी है. एनालिटिक्स कंपनी केप्लर के मुताबिक 26 सितंबर को इस संकटग्रस्त जलमार्ग से कच्चे तेल की आवाजाही सात दिनों के औसत के हिसाब से 1.42 करोड़ बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गई जो युद्ध से पहले के स्तर का लगभग 80 प्रतिशत है.
इसके बावजूद कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ उछाल देखा जा रहा है. इसकी वजह यह है कि दुनिया भर में भारी मात्रा में कच्चे तेल और ईंधन को लंबी दूरी तक सबसे कम लागत में पहुंचाने के लिए बनी पूरी प्रणाली अब ध्वस्त हो गई है. टैंकरों का किराया रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. बीमा की लागत बढ़ गई है और रिफाइनिंग क्षमता की भारी कमी ने ऊर्जा सप्लाई चेन में कई जगह रुकावट पैदा कर दी है. रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक ये समस्याएं कई महीनों या शायद कई सालों तक बनी रह सकती हैं.
बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री जाह्नवी प्रभाकर कहती हैं, “महंगाई वृद्धि का जोखिम अभी भी बना हुआ है क्योंकि मानसून सामान्य से कम रहा और खरीफ की बुआई भी पिछले साल की तुलना में कम रही है. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण भू-राजनीतिक अनिश्चितता बनी हुई है. जिससे वैश्विक तेल और दूसरी कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहेगा. इन कारणों को देखते हुए हमें उम्मीद है कि केंद्रीय बैंक FY27 में ब्याज दरों में दो और बढ़ोतरी करेगा.”
कुछ दूसरे लोगों का मानना है कि एक और बढ़ोतरी हो सकती है. HSBC की एक रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया, “फिलहाल हम अपनी इस राय पर कायम हैं कि यह 50 बेसिस पॉइंट की दर बढ़ोतरी का दौर होगा. इसमें से 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी आज हो चुकी है. हां, एक और बढ़ोतरी का जोखिम है. खासकर अगर अल नीनो के मजबूत होने के बावजूद वृद्धि मजबूत बनी रहती है. लेकिन फिलहाल हमें नहीं लगता कि यह ब्याज दरों में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी वाला दौर होगा.”

