
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (बैंक)-FCNR (B) स्वैप विंडो को तय समय से एक महीने पहले बंद करने के फैसले पर काफी बहस हो रही है.
गवर्नर संजय मल्होत्रा का कहना है कि यह फैसला सोच-समझकर और परिस्थितियों के हिसाब से लिया गया है. यह विदेशी मुद्रा बाजार के हालात और आंकड़ों के आधार पर लिया गया संतुलित फैसला है.
तो FCNR (B) क्या है और इसे लेकर इतनी चर्चा क्यों हो रही है? FCNR (B) जमा के तहत अनिवासी भारतीय (NRI) बैंक में विदेशी मुद्रा में अपना पैसा जमा कर सकते हैं. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस पर मिलने वाला ब्याज टैक्स फ्री होता है और विनिमय दर में उतार-चढ़ाव का कोई जोखिम नहीं रहता.
जून में RBI ने बैंकों के लिए इन विदेशी मुद्रा जमाओं को स्वैप करने की एक अस्थाई सुविधा शुरू की थी. RBI ने कहा था कि वह इन पर मुद्रा संबंधी पूरा जोखिम उठाएगा. इसका मकसद विदेशी पूंजी आकर्षित करना, आयात की बढ़ती लागत के दबाव के बीच रुपए को स्थिर करना और देश के डॉलर भंडार को मजबूत करना था.
उस वक्त कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से महंगाई बढ़ रही थी और रुपए पर दबाव पड़ रहा था. 20 मई को रुपया गिरकर डॉलर के मुकाबले 96.9 के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया था.
लेकिन अब केंद्रीय बैंक ने इस योजना को पहले तय सितंबर की समय सीमा के बजाय अगस्त में ही बंद करने का फैसला किया है. RBI ने इसके पीछे इस योजना को मिली उत्साहजनक प्रतिक्रिया को वजह बताया है.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, RBI के आंकड़ों से पता चलता है कि 14 अगस्त तक FCNR (B) जमाओं के जरिए कम से कम 52 अरब डॉलर की रकम आई थी. हालांकि बहस की वजह यह है कि यह फैसला मल्होत्रा के उस बयान के महज दो हफ्ते बाद आया, जिसमें उन्होंने मीडिया से कहा था कि FCNR (B) सुविधा को समय से पहले बंद करने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है.
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर सौम्य कांति घोष ने एक रिसर्च नोट में कहते हैं, "FCNR (B) योजना को समय से पहले बंद करने के कुछ जायज कारण हो सकते हैं, लेकिन इसकी सबसे संभावित वजह यह हो सकती है कि FCNR (B) के जरिए रकम जुटाने का लक्ष्य पहले ही हासिल हो चुका है. इसमें 57 अरब डॉलर का निवेश आ चुका है. अगस्त के बाकी दिनों में 25-30 अरब डॉलर और आसानी से आ सकते हैं जिससे कुल रकम करीब 85 अरब डॉलर हो सकती है."
उन्होंने कहा, "भुगतान संतुलन करीब 50 अरब डॉलर के सरप्लस में रहेगा और चालू खाते का घाटा (CAD) GDP का 1 फीसदी रहेगा."
मल्होत्रा ने अपने स्तर पर कहा है कि केंद्रीय बैंक ने इस फैसले पर अपना रुख नहीं बदला है. उनके मुताबिक, "यह यू-टर्न नहीं, बल्कि परिस्थितियों के हिसाब से किया गया बदलाव है."
जून में तीन से पांच साल की नई FCNR (B) जमाओं पर हेजिंग की लागत उठाने पर सहमति देने के अलावा RBI ने सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को बाहरी वाणिज्यिक कर्ज (ECBs) जुटाने के लिए समयबद्ध प्रोत्साहन भी दिए थे.
ECBs यानी बाहरी वाणिज्यिक कर्ज ऐसे कारोबारी ऋण होते हैं, जिन्हें पात्र भारतीय संस्थाएं मान्यता प्राप्त गैर-निवासी ऋणदाताओं से लेती हैं. इनका इस्तेमाल भारतीय कंपनियां और सरकारी क्षेत्र के उपक्रम विदेशी पूंजी जुटाने के लिए करते हैं.
RBI को उम्मीद है कि FCNR (B), ECBs और विदेशों से विदेशी मुद्रा में लिए जाने वाले कर्ज, इन तीनों पहलों के जरिए कुल 80 अरब डॉलर की रकम आकर्षित होगी.
इस बीच, केंद्र सरकार ने भी RBI के कदमों का साथ देते हुए देश में निवेश को आसान बनाने और रुपए को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए. पूंजी बाजार को और मजबूत करने के लिए सरकार ने सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए कई सुधार किए.
इनमें ब्याज आय, लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ और छोटी अवधि के पूंजीगत लाभ पर टैक्स में छूट, पूरी तरह खुले रास्तों के तहत आने वाली निर्धारित प्रतिभूतियों का दायरा बढ़ाना और निवेश नियमों को आसान बनाना शामिल था.
SBI के घोष का कहना है कि RBI के FCNR (B) कदम का असर स्पष्ट रूप से उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा है. हालांकि, आगे चलकर 31 अगस्त तक रुपया डॉलर के मुकाबले 95-95.5 के दायरे में मजबूत हो सकता है.
लेकिन कुछ ऐसे कारक भी हैं, जिन पर नजर रखनी होगी और जो रुपए पर दबाव डाल सकते हैं. इनमें से एक अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड का बढ़कर करीब 5.3 फीसदी होना है, जो 2007 के बाद सबसे ज्यादा है.
घोष के मुताबिक दूसरा जोखिम कच्चे तेल की कीमतों के फिर 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने का है. भू-राजनीतिक तनाव अभी भी काफी ज्यादा है और होर्मुज स्ट्रेट के आसपास संभावित बाधाएं वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए जोखिम पैदा कर रही हैं.
पिछले चार महीनों में भारत की विदेशी मुद्रा स्थिति पर खासा ध्यान गया है. खास तौर पर मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेशी मुद्रा के मोर्चे पर कुछ चिंताएं जाहिर की थीं. मध्य पूर्व के संकट ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित किया, विदेशों से आने वाले धन को झटका दिया और आम लोगों के लिए वस्तुओं और सेवाओं को महंगा कर दिया.
इससे देश के भुगतान संतुलन यानी देश में आने वाली और बाहर जाने वाली रकम के बीच के अंतर पर भी असर पड़ा. इसके बाद मोदी ने नागरिकों से खर्च में संयम बरतने की अपील की थी. इसमें विदेश यात्रा कम करने और डॉलर के खर्च को घटाने के लिए सोने की खरीद कम करने जैसे कदम शामिल थे.

