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क्या राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह का न्योता ठुकराकर कांग्रेस संघ के जाल में फंस गई है?

ऐसा कहा जा रहा है कि राममंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह के निमंत्रण को स्वीकारने और नकारने को लेकर कांग्रेस के भीतर आमराय नहीं थी

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ सोनिया गांधी
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ सोनिया गांधी
अपडेटेड 14 जनवरी , 2024

अयोध्या में नवनिर्मित राम मंदिर में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के निमंत्रण को 'सम्मानपूर्वक अस्वीकार' करने का कांग्रेस का निर्णय एक बार फिर अत्यधिक भावनात्मक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दे पर पार्टी की स्पष्ट राय न लेने की अक्षमता को उजागर कर रहा है. असल में इस संवेदनशील मसले पर कांग्रेस के भीतर भी आमराय नहीं थी. 

जानकारी के मुताबिक मुख्य रूप से उत्तरी और पश्चिमी राज्यों से कई कांग्रेस नेता ऐसे थे, जो 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होने के पार्टी के पूर्व के निर्णय के पक्ष में थे. हालांकि दक्षिणी राज्यों के कुछ नेताओं ने पार्टी को पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया, जिससे कांग्रेस को निमंत्रण को 'सम्मानपूर्वक अस्वीकार' करना पड़ा. केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, रमेश चेन्निथला और अन्य पार्टी नेताओं ने तर्क दिया कि राम मंदिर कार्यक्रम में कांग्रेस की उपस्थिति से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को बढ़ावा मिलेगा, जो वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को एक ऐतिहासिक और शक्त‍िशाली चुनावी मुद्दे के रूप में पेश कर रही है. 

मजबूर होकर और थोड़ा अनिच्छा से कांग्रेस ने अयोध्या पर राजनीतिक दांव खेला और 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर के अभिषेक समारोह में शामिल होने के लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा अपने नेताओं सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और अधीर रंजन चौधरी को दिए गए निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया. बुधवार, 10 जनवरी को पार्टी की घोषणा कि वह उस कार्यक्रम से दूर रहेगी जो लंबे राम मंदिर आंदोलन की परिणति को चिह्नित करेगा. यह घोषणा विवाद के साथ कांग्रेस के जटिल इतिहास में एक और मील का पत्थर है.

लखनऊ में बाबा साहेब आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्रोफेसर सुशील पांडेय बताते हैं, “कांग्रेस ऐतिहासिक और राजनीतिक दोनों कारणों से राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह में भाग लेने से सावधान है. आख़िरकार, मंदिर हमेशा से संघ परिवार का प्रोजेक्ट रहा है, हालांकि कांग्रेस ने पिछले लगभग चार दशकों में अलग-अलग बिंदुओं पर, जाने-अनजाने, इसमें दखल देने की कोशिश की है. संघ परिवार के हिंदू कार्ड को हथियाने की पार्टी ने भी कई बार अपने हाथ जला लिए हैं. इसलिए पार्टी इस मुद्दे से दूरी बना रही है.” 

जब रामजन्मभूमि विवाद की बात आती है, तो कांग्रेस अपने इतिहास के बोझ तले दब जाती है, एक ऐसा अतीत जो उतार-चढ़ाव और विरोधाभासों से भरा हुआ है. अयोध्या में विवादित राम जन्मभूमि के ताले 1986 में खोले गए थे जब राजीव गांधी प्रधान मंत्री थे. कांग्रेस के पुराने नेता बताते हैं कि राजीव गांधी को ताला खोले जाने की जानकारी ही नहीं थी. लेकिन तीन साल बाद, भाजपा के मंदिर आंदोलन को रोकने के लिए, उन्होंने ही विश्व हिंदू परिषद को विवादित स्थल पर शिलान्यास करने की अनुमति दी. वर्ष 1991 में, एक बार फिर भाजपा को ध्यान में रखते हुए, लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस के घोषणापत्र में मंदिर का उल्लेख किया गया और कहा गया कि पार्टी बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किए बिना मंदिर के निर्माण के पक्ष में है. एक साल बाद, केंद्र में कांग्रेस सरकार की मौजूदगी में मस्जिद ढह गई. एक साल बाद, उस वक्त प्रधानमंत्री रहे पी. वी. नरसिम्हा राव ने सार्वजनिक रूप से मस्जिद के निर्माण के लिए प्रतिबद्धता जताई थी. 

फिर, केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के और भी बड़े बहुमत के साथ वापस आने के बाद, नवंबर 2019 में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मालिकाना हक मामले में हिंदू पक्ष के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया. अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस ने आदेश का स्वागत किया और घोषणा की कि वह राम मंदिर निर्माण के पक्ष में है. 

अब अयोध्या में राम मंदिर में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह से दूरी बनाने का कांग्रेस का निर्णय 
इस तथ्य से भी जुड़ा हुआ है कि राम मंदिर का उद्घाटन संघ और भाजपा का कार्यक्रम है जो स्पष्ट रूप से लोकसभा की तैयारियों के समय को ध्यान में रखते हुए किया गया है. इसके पीछे कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि अयोध्या में 22 जनवरी को नवनिर्मित राम मंदिर के गर्भगृह में जिन पांच लोगों को प्रवेश की अनुमति दी गई है, उनमें से पुजारी के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, संघ प्रमुख मोहन भागवत, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राज्यपाल आनंदीबेन पटेल होंगी. इसी से स्पष्ट है कि यह संघ और भाजपा द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम है. 

अवध क्षेत्र में कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, “प्राण प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण और इसका पूरा प्रबंधन विश्व हिंदू परिषद और संघ द्वारा ही किया जा रहा है और कांग्रेस संघ परिवार के ‘राजनीतिक आयोजन’ को वैधता नहीं दे सकती. इसलिए पार्टी ने इस पूरे आयोजन से खुद को दूर रखने का निर्णय लिया है.” 

कुछ कांग्रेस नेता यह मानते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा के लिए कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को निमंत्रण भेजना पार्टी को एक रुख अपनाने के लिए मजबूर करने की एक चाल है और इस बात की संभावना है कि भाजपा दूर रहने के कांग्रेस के फैसले को "हिंदू विरोधी" करार देगी, जो चुनाव से पहले महंगा साबित हो सकता है. कुछ साल पहले खुद कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने स्वीकार किया था कि भाजपा लोगों को यह समझाने में कामयाब रही कि कांग्रेस पार्टी एक मुस्लिम पार्टी है. 

प्राण प्रतिष्ठा के निमंत्रण को अस्वीकार करने वाले कांग्रेस के बयान में उल्लेख किया गया है कि मंदिर अभी भी "अधूरा" है, और ऐसा प्रतीत होता है कि उद्घाटन को भाजपा और संघ ने "स्पष्ट रूप से चुनावी लाभ के लिए" आगे बढ़ाया है. हालांकि राजनीतिक विश्लेषक इस पूरे मुद्दे पर कांग्रेस के रुख को भाजपा के दांव में फंसने वाला बता रहे हैं. सुशील पांडेय बताते हैं, “पहले राम मंदिर निर्माण पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देने वाली कांग्रेस का अचानक प्राण प्रतिष्ठा समारोह से दूर रहने का फैसला निश्च‍ित रूप से भाजपा को मदद करेगा. भाजपा अब आक्रामक रूप से कांग्रेस को राम और हिंदू विरोधी साबित करेगी.” हालांकि कांग्रेस इस भ्रम में नहीं है कि 22 जनवरी से होने प्राण प्रतिष्ठा समारोह का लाभ लगभग पूरी तरह से भाजपा को मिलने वाला है. 

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