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चुनाव के दौरान कितना ताकतवर हो जाता है चुनाव आयोग?

लोकसभा चुनावों में आदर्श आचार संहिता 1962 के लोकसभा चुनावों में लागू की गई थी, मगर तब से अब तक चुनाव आयोग के अधिकारों का दायरा काफी बढ़ा है

मुख्य चुनाव आयुक्त, राजीव कुमार
मुख्य चुनाव आयुक्त, राजीव कुमार
अपडेटेड 20 मार्च , 2024

बीते हफ्ते 16 मार्च को चुनाव आयोग ने 2024 के लोकसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान किया और इसके ठीक दो दिन बाद ही, 18 मार्च को खबर आई कि आयोग ने 6 राज्यों के गृह सचिवों को हटाने के साथ ही कई बड़े अफसरों की पोस्टिंग में फेरबदल किया.

इनमें गुजरात, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, और हिमाचल प्रदेश के गृह सचिव शामिल थे. इसके साथ ही मिजोरम और हिमाचल के मुख्यमंत्रियों से करीब रहे अफसरों पर भी चुनाव आयोग की गाज गिरी. महाराष्ट्र में मुंबई के नगर निगम बीएमसी के अलावा और भी दूसरे शहरों के नगर निगम के अफसर बदले गए.  

चुनाव आयोग की घोषणा के मुताबिक 19 अप्रैल से 1 जून तक 7 चरणों में लोकसभा चुनाव कराए जाएंगे और 4 जून को वोटों की गिनती होगी. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि किस कानून के तहत चुनाव आयोग ने गृह सचिवों और दूसरे बड़े अफसरों से जुड़े फैसले किए? इसके साथ ही यह भी समझते हैं कि चुनाव के दौरान चुनाव आयोग की वो कौन सी शक्तियां हैं जिसका इस्तेमाल कर किसी अफसर या कर्मचारी को वे बर्खास्त या निलंबित कर सकता है?

इस हवाले से संविधान के एक आर्टिकल-324 का जिक्र बार-बार आता है. इसके तहत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग को कई अधिकार हासिल हैं. आर्टिकल-324 का क्लॉज़ 5 कहता है, "मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर ही हटाया जाएगा, जिस रीति से और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है अन्यथा नहीं और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सेवा की शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा."

यह तो थी सरकारी भाषा, लेकिन अगर सीधे शब्दों में समझें तो संविधान कहता है कि अपने पद से हटाए जाने के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियां सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर हैं. जाहिर है दोनों को ही हटाना आसान नहीं है. इसके अलावा दूसरे चुनाव आयुक्तों और क्षेत्रीय आयुक्तों को हटाने के लिए सरकार को मुख्य चुनाव आयुक्त के सिफारिश की जरूरत पड़ेगी. इसी के जरिए संविधान ने एक अनकही 'इम्युनिटी' चुनाव आयोग और खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त को सौंप दी. मतलब अब उन्हें अपने पद जाने की चिंता नहीं है और वे बिना की दबाव के निष्पक्ष रूप से काम करने के लिए आजाद हैं.  

चुनाव आयोग की शक्तियों का इतिहास जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा. राजनीतिक पार्टियों और चुनावों के नियम तय करने के लिए संसद ने रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट, 1951 बनाया. जब 1960 में केरल के विधानसभा चुनाव हुए तब पहली बार चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों के लिए एक आचार-संहिता जारी की थी. फिर 1962 के लोकसभा चुनावों में आदर्श आचार संहिता या मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (एमसीसी) लागू की गई और यही आज भी चल रहा है. मगर 1962 और 2024 के एमसीसी में बहुत फर्क है क्योंकि 1962 के बाद चुनावों में एमसीसी का दायरा और चुनाव आयोग के अधिकार बढ़ते जा रहे हैं.

एमसीसी के बारे में बात करें तो इसके तहत पार्टियों को घोषणा-पत्र, चुनाव प्रचार, मीटिंग और जुलूस आदि के बारे में दिशा-निर्देश दिए जाते हैं. मीडिया में विज्ञापन, चुनाव-प्रचार, ओपीनियन और एक्जिट पोल के बारे में भी एमसीसी में तसल्ली से लिखा होता है. चुनावों की अधिसूचना जारी होने के बाद सरकारी कामकाज में भी एमसीसी लागू हो जाती है और इन प्रतिबंधों के तहत सरकार बड़े नीतिगत निर्णय और नई योजनाएं लागू नहीं कर सकती.

अब आते हैं सबसे अहम सवाल पर जो अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग से जुड़ा है. एमसीसी लागू होने के बाद चुनावी राज्यों में अधिकारियों की नियुक्ति, ट्रांसफर और पोस्टिंग के बारे में भी चुनाव आयोग की मुहर के बिना कोई निर्णय नहीं हो सकता. अक्सर आपने देखा होगा कि डीएम-एसपी चुनाव के दौरान कुछ ज्यादा ही एक्टिव हो जाते हैं. एमसीसी के तहत इसी अधिकार की वजह से चुनाव आयोग सरकारी अधिकारियों की पर्यवेक्षकों के तौर पर भी नियुक्ति करता है. तो क्या चुनाव आयोग को ट्रांसफर-पोस्टिंग के कानूनन अधिकार हैं? इसका जवाब जानने के लिए हमने सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता से बात की.

उन्होंने कहा, "स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए एमसीसी के तहत चुनाव आयोग अधिकारियों के ट्रांसफर के साथ उनका निलम्बन भी कर सकता है. एमसीसी के बारे में अभी तक स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं हैं लेकिन परंपरा के अनुसार इसके तहत चुनाव आयोग को असाधारण अधिकार हासिल रहते हैं. आयोग के निर्देशों का पालन नहीं करने पर आईपीसी के तहत आपराधिक मामला भी दर्ज हो सकता है. चुनाव सुधारों के बारे में आयोग की अनुशंसा के अनुसार अनेक महत्वपूर्ण मामलों पर संसद से कानून बनाने की जरुरत है लेकिन परंपरा के अनुसार एमसीसी को आयोग प्रभावी तौर पर लागू कर सकता है."

विराग ने 2013 में संसद की सिलेक्ट कमेटी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि एमसीसी को कानूनी तौर पर बाध्यकारी बनाने के लिए संसद से कानून बनाने की जरूरत है. चुनाव आयोग के हिसाब से चुनाव की प्रक्रिया 45 दिनों में पूरी हो जाती है. इस दौरान कानून का पालन नहीं करने पर अदालतों से विवाद का निपटारा होने में लंबा समय लग सकता है. सीधा-सीधा यह समझें कि अब जो होगा चुनाव के बाद ही होगा. इसी के साथ अगर इस दौरान सरकार चुनाव आयोग का आदेश नहीं माने तो ऐसे मामलों में आयोग चुनावों को स्थगित करने का भी आदेश पारित कर सकता है और यही सबसे बड़ी वजह है कि चुनावी राज्यों में अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग के बारे में चुनाव आयोग के निर्देशों का तुरंत और सख्ती से पालन होता है.

पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा की आशंका को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग ने वहां के डीजीपी राजीव कुमार का तबादला कर विवेक सहाय को नया डीजीपी नियुक्त किया. चुनाव आयोग के इस फैसले से राज्य की सत्ताधारी पार्टी टीएमसी खासी नाराज़ नजर आ रही है. इसके पहले भी चुनावों के दौरान बड़े अधिकारियों के ट्रांसफर्स को लेकर ममता बनर्जी ने सवाल उठाते हुए कहा था कि इससे काम पर खासा असर पड़ता है. टीएमसी के वरिष्ठ नेता कुणाल घोष ने इसी को लेकर भाजपा पर चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर कब्ज़ा करने का आरोप भी लगाया. 

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