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पाकिस्तान की बदली सैन्य कमान के भारत के लिए क्या हैं मायने?

पाकिस्तान में एक नए कानून के बाद सेना प्रमुख असीम मुनीर के हाथों में तीनों सेनाओं की कमान आ गई है

आसिम मुनीर सेना प्रमुख के साथ अब चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज भी बन गए हैं
अपडेटेड 24 अगस्त , 2026

पाकिस्तान ने अब औपचारिक रूप से एक बेहद केंद्रीकृत सैन्य कमान व्यवस्था की दिशा में कदम बढ़ाया है. इसमें उसकी आर्मी, नेवी और एयर फोर्स को ऐसी व्यवस्था के तहत रखा गया है, जिस पर फील्ड मार्शल सैयद असीम मुनीर का दबदबा है. मुनीर एक साथ सेना प्रमुख और चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) हैं.

पाकिस्तान की नेशनल असेंबली और सीनेट ने 20 अगस्त को ‘डिफेंस फोर्सेज ऑफ पाकिस्तान एक्ट, 2026’ को मंजूरी दे दी. इसके साथ ही नेशनल कमांड अथॉरिटी एक्ट, 2010 में भी संशोधन किए गए. 

यह कदम 2025 में किए गए संवैधानिक बदलावों के अनुरूप है. इन बदलावों के तहत CDF का पद बनाया गया था और ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के चेयरमैन का पद खत्म कर दिया गया था.

दिसंबर 2025 में पाकिस्तान के पहले CDF नियुक्त किए गए मुनीर अब देश की सैन्य कमान व्यवस्था के केंद्र में हैं. नए कानून ने उन्हें किसी सैन्य सेवा प्रमुख की पारंपरिक भूमिका से कहीं अधिक अधिकार दिए हैं. 

उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा और सशस्त्र बलों से जुड़े मामलों में प्रधानमंत्री का प्रमुख सैन्य सलाहकार बनाया गया है. इसके साथ ही उन्हें सेना की संचालन व्यवस्था और नियंत्रण की जिम्मेदारी भी दी गई है.

आसिम मुनीर को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का सैन्य सलाहकार भी बनाया गया है
आसिम मुनीर को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का सैन्य सलाहकार भी बनाया गया है

डिफेंस फोर्सेज ऑफ पाकिस्तान एक्ट में पाकिस्तान की सेनाओं के लिए डिफेंस फोर्सेज हेडक्वार्टर बनाने का प्रावधान है. इसे सशस्त्र बलों का मुख्य केंद्र बनाया गया है और इसकी कमान व अधिकार CDF के अधीन रखा गया है. 

इससे मुनीर को एक स्थाई संस्थागत तंत्र मिल गया है, जिसके जरिए वे आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के साथ-साथ संयुक्त, रणनीतिक और विभिन्न क्षेत्रों में चलाए जाने वाले सैन्य अभियानों का समन्वय कर सकते हैं.

कानून CDF को तीनों सेनाओं के बीच बेहतर एकीकरण, संचालन में तालमेल और जमीन, हवा, समुद्री, साइबर तथा रणनीतिक क्षेत्रों में समन्वय मजबूत करने की जिम्मेदारी देता है. 

इसका मतलब है कि पाकिस्तान उस व्यवस्था से दूर जाने की कोशिश कर रहा है, जिसमें तीनों सेनाएं काफी हद तक अलग-अलग कमान ढांचे के जरिए काम करती हैं. अब वह सेना प्रमुख के नेतृत्व वाली एकीकृत व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है.

भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू सैन्य अधिकारों का एक ही पद पर केंद्रित होना है. मुनीर राष्ट्रीय सुरक्षा नीति पर अपने प्रधानमंत्री को सलाह दे सकते हैं और साथ ही सशस्त्र बलों में सैन्य फैसलों के क्रियान्वयन की निगरानी भी कर सकते हैं. 

राजनीतिक प्रभाव और संचालन संबंधी कमान का यह मेल CDF को शांति और संकट, दोनों स्थितियों में सलाहकार और कार्यकारी भूमिका देता है.

मुनीर के अधिकार सैन्यकर्मियों तक भी फैले हुए हैं. कानून CDF को सैन्यकर्मियों को सेवानिवृत्त करने, सेवा से मुक्त करने या बर्खास्त करने, इस्तीफे स्वीकार या खारिज करने और कुछ लोगों को सेवा में बनाए रखने की अनुमति देता है. 

मुनीर कानून की सीमाओं के भीतर सेवानिवृत्ति की उम्र या सेवा संबंधी शर्तों में भी छूट दे सकते हैं. इसके अलावा, संघीय सरकार की ओर से दिए गए अतिरिक्त अधिकारों का इस्तेमाल या अतिरिक्त जिम्मेदारियों का निर्वहन भी वह कर सकते हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति से मेलजोल बढ़ने के साथ ही आसिम मुनीर का राजनीतिक-कूटनीतिक रसूख भी बढ़ा है
अमेरिकी राष्ट्रपति से मेलजोल बढ़ने के साथ ही आसिम मुनीर का राजनीतिक-कूटनीतिक रसूख भी बढ़ा है

सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि इन प्रावधानों से सैन्य पदानुक्रम, कमान में नियुक्तियों और उत्तराधिकार की योजना पर CDF का काफी प्रभाव हो जाएगा. हालांकि कानून में संवैधानिक और कानूनी सीमाएं औपचारिक रूप से बरकरार रखी गई हैं लेकिन व्यावहारिक रूप से इसका असर यह है कि पाकिस्तान की सशस्त्र सेनाओं की संरचना और कामकाज पर काफी नियंत्रण मुनीर के हाथों में आ जाएगा.

यह कानून उन मामलों में खुद को सर्वोच्च मानता है, जहां इसका किसी पुराने कानून से टकराव हो. इसके तहत बनाए गए प्रावधानों के साथ-साथ नियम, विनियम, निर्देश, अधिसूचनाएं और आदेश अन्य कानूनों के उन प्रावधानों पर प्रभावी होंगे, जो इनसे मेल नहीं खाते. 

कानून में खास तौर पर कहा गया है कि पाकिस्तान आर्मी एक्ट-1952, पाकिस्तान एयर फोर्स एक्ट- 1953, पाकिस्तान नेवी ऑर्डिनेंस-1961, कैंटोनमेंट्स एक्ट- 1924 और सशस्त्र बलों के कर्मियों से जुड़े अन्य कानूनों की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती, जिससे नई कमान व्यवस्था कमजोर हो.

कानून के मुताबिक, संघीय सरकार को इसे लागू करने के लिए नियम और विनियम बनाने का अधिकार दिया गया है. वहीं CDF इस कानून को लागू करने के लिए निर्देश और आदेश जारी कर सकते हैं. 

राष्ट्रपति भी इसके क्रियान्वयन के दौरान सामने आने वाली प्रशासनिक या कानूनी दिक्कतों को दूर करने के लिए दखल दे सकते हैं. इन प्रावधानों से नई व्यवस्था के कामकाज को तय करने में सरकार और CDF को काफी लचीलापन मिलता है.

यह कानून तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है लेकिन इसे 13 नवंबर 2025 से प्रभावी माना गया है. इसके औपचारिक रूप से लागू होने से पहले जारी किए गए नियम, अधिसूचनाएं, आदेश, निर्देश और किए गए फैसले भी इस कानून के अनुरूप होने पर वैध माने जाएंगे. 

इस पूर्व प्रभावी प्रावधान का मकसद CDF के नेतृत्व वाली व्यवस्था में बदलाव के दौरान लिए गए फैसलों को कानूनी संरक्षण देना है. इससे यह भी संकेत मिलता है कि पाकिस्तान पिछले कई महीनों से नई कमान व्यवस्था को लागू कर रहा था.

भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था में बदलाव तेज हुए
भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था में बदलाव तेज हुए (सांकेतिक फोटो)

इन सुधारों का पाकिस्तान की रणनीतिक और परमाणु कमान व्यवस्था पर भी असर पड़ता है. इस कानून से पहले किए गए संवैधानिक बदलावों के तहत नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांड के कमांडर का पद बनाया गया था और ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के चेयरमैन को कमान व्यवस्था से हटा दिया गया था. 

हालांकि डिफेंस फोर्सेज एक्ट मुख्य रूप से CDF और डिफेंस फोर्सेज हेडक्वार्टर पर केंद्रित है, लेकिन इन बदलावों को एक साथ देखने पर ऐसी व्यवस्था की ओर संकेत मिलता है, जिसमें पाकिस्तान की व्यापक रक्षा और रणनीतिक व्यवस्था में सेना प्रमुख की भूमिका कहीं अधिक केंद्रीय हो गई है.

जानकारों का मानना है कि इसका यह मतलब जरूरी नहीं है कि हर परमाणु फैसला सीधे CDF ही लेंगे क्योंकि पाकिस्तान की औपचारिक राजनीतिक और संस्थागत प्रक्रियाएं अभी भी महत्वपूर्ण हैं. 

हालांकि ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के चेयरमैन का पद खत्म होने और नई रणनीतिक कमान व्यवस्था बनने से पहले की संयुक्त सैन्य व्यवस्था का महत्व कम हो गया है. इससे सेना के नेतृत्व वाली व्यवस्था का प्रभाव अपेक्षाकृत बढ़ गया है.

पाकिस्तान ने इस कानून को हाल के सैन्य टकरावों और विभिन्न क्षेत्रों में चलाए गए अभियानों से मिले सबक के जवाब के तौर पर पेश किया है. इसके उद्देश्यों और जरूरत को बताने वाले हिस्से में तीनों सेनाओं के एकीकृत अभियानों, वास्तविक समय में हालात की जानकारी, नेटवर्क आधारित युद्ध और जमीन, समुद्र तथा साइबर क्षेत्रों के बीच समन्वय का उल्लेख किया गया है.

भारत के लिए इससे भी अहम बात यह है कि पाकिस्तान ने हाल के सैन्य अनुभवों से कुछ सबक सीखे हैं. पाकिस्तान का मानना है कि भविष्य के संघर्षों में सूचनाओं का तेजी से आदान-प्रदान, तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल, अलग-अलग मोर्चों की तुरंत जानकारी और एकीकृत कमान व्यवस्था जरूरी होगी.

इन सुधारों पर मई 2025 में भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान और उसके बाद पाकिस्तान के अनुभव का भी असर दिखाई देता है. इस दौरान पाकिस्तान को सैन्य मोर्चे पर भारी नुकसान उठाना पड़ा था. संघर्ष के बाद मुनीर ने खुद को फील्ड मार्शल के पद पर पदोन्नत किया. 

अब नया कानून इस पद पर रहने वाले अधिकारी को पाकिस्तान के सैन्य तंत्र को पारंपरिक, रणनीतिक और विभिन्न क्षेत्रों में चलाए जाने वाले अभियानों के स्तर पर निर्देशित और समन्वित करने के लिए कानूनी ढांचा देता है.

केंद्रीकृत व्यवस्था से संकट के दौरान पाकिस्तान को तेजी से जवाब देने में मदद मिल सकती है. इससे आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के बीच फैसलों में होने वाली देरी कम हो सकती है. इससे इस्लामाबाद को एक ही सैन्य कमान के जरिए वायु रक्षा, मिसाइल बलों, समुद्री संसाधनों, साइबर अभियानों और जमीनी सैन्य टुकड़ियों के बीच तालमेल बिठाने में मदद मिल सकती है. 

भारत के साथ भविष्य में होने वाले ऐसे किसी संघर्ष में यह खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकता है, जिसमें एक साथ पश्चिमी जमीनी मोर्चे, हवाई क्षेत्र और अरब सागर में गतिविधियां हों.

हालांकि यह कानून पाकिस्तान को नए हथियार, बेहतर खुफिया जानकारी या उन्नत सैन्य तकनीक नहीं देता. केवल कानूनी स्तर पर एकीकरण से वास्तविक सैन्य तालमेल अपने आप पैदा नहीं हो जाता. 

नई व्यवस्था कितनी प्रभावी होगी, यह पाकिस्तान के संचार नेटवर्क, खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था, संयुक्त प्रशिक्षण, रसद और तीनों सेनाओं के सेना प्रमुख के नेतृत्व वाली कमान व्यवस्था के तहत काम करने की इच्छा पर निर्भर करेगा.

सैन्य विश्लेषकों ने कहा कि अधिकारों का यह केंद्रीकरण कुछ कमजोरियां भी पैदा कर सकता है. एक अधिकारी के इर्द-गिर्द बनी व्यवस्था फैसले लेने की प्रक्रिया को तेज कर सकती है लेकिन इससे संस्थागत नियंत्रण कमजोर हो सकता है, आंतरिक बहस सीमित हो सकती है और पूरी कमान व्यवस्था CDF के फैसले पर बहुत अधिक निर्भर हो सकती है. 

इसलिए कानून मुनीर को व्यापक अधिकार तो देता है लेकिन पाकिस्तान की नई सैन्य व्यवस्था की सफलता या विफलता भी काफी हद तक उनके पद के इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाती है.

यह कानून ऐसे समय आया है जब मुनीर का प्रभाव पाकिस्तान के सैन्य तंत्र से आगे भी बढ़ा है. 2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ उनके संबंध असामान्य रूप से करीबी हो गए. इसमें वाइट हाउस में लंच और दोनों नेताओं की ओर से एक-दूसरे की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा भी शामिल है. 

अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान मुनीर ने इस संपर्क का इस्तेमाल किया. उन्होंने दोनों पक्षों से बातचीत की और नाजुक युद्धविराम सुनिश्चित करने की कोशिशों में पाकिस्तान को मध्यस्थ के तौर पर पेश करने में मदद की.

इन घटनाक्रमों से मुनीर की राजनीतिक और कूटनीतिक पहचान बढ़ी है. वहीं नए कानून ने देश के भीतर उनकी सैन्य शक्तियों का भी विस्तार किया है. अब वे पाकिस्तान के सेना प्रमुख, CDF, प्रधानमंत्री के वरिष्ठ सैन्य सलाहकार और देश की रणनीतिक कमान व्यवस्था के केंद्रीय व्यक्ति हैं.

भारत के लिए तत्काल सबक यह है कि पाकिस्तान अब केवल सैन्य एकीकरण की बात नहीं कर रहा है. वह सेना प्रमुख के अधिकार के तहत इसे कानून के जरिए संस्थागत रूप देने की कोशिश कर रहा है. 

भारत के लिए मुख्य सवाल यह होगा कि पाकिस्तान मुनीर की कमान में अपनी जमीनी, हवाई, समुद्री, साइबर और रणनीतिक क्षमताओं को कितनी प्रभावी ढंग से एक साथ ला पाता है. साथ ही यह भी देखना होगा कि क्या यह केंद्रीकृत व्यवस्था भारत की पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान की सैन्य प्रतिक्रिया को ज्यादा तेज, ज्यादा समन्वित और संभावित रूप से ज्यादा अप्रत्याशित बनाती है.

इसका व्यापक असर यह है कि पाकिस्तान के नागरिक संस्थानों की भूमिका मुख्य सुरक्षा संबंधी फैसलों में और भी कम होती जा रही है. इसलिए भारत को मानकर चलना चाहिए कि किसी विवाद के दौरान पाकिस्तान की सेना के फैसलों पर नागरिक सरकार का प्रभावी नियंत्रण पहले से कम हो सकता है.

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पाकिस्तान अपने आप ज्यादा स्थिर हो गया है. एक बेहद केंद्रीकृत व्यवस्था ऊपर से अनुशासित दिखाई दे सकती है लेकिन दबाव की स्थिति में कमजोर भी साबित हो सकती है. खासकर तब, जब संस्थानों के बीच प्रतिस्पर्धा को खत्म करने के बजाय उसे दबा दिया जाए.

नई दिल्ली के सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि पाकिस्तान का डिफेंस फोर्सेज हेडक्वार्टर वास्तव में सैन्य अभियानों का मुख्य केंद्र बनता है या मौजूदा नियंत्रण व्यवस्था का सिर्फ कानूनी रूप से नया नाम बनकर रह जाता है. 

भारत को अधिकारियों के फेरबदल, संयुक्त कमान के सैन्य अभ्यास, परमाणु कमान की प्रक्रियाओं और सीमा पर घटनाओं के बाद पाकिस्तान कितनी तेजी से संकट संबंधी बयान जारी करता है, इस पर भी नजर रखनी चाहिए. 

भारत के लिए सुरक्षा व्यवस्था में सबसे अहम बदलाव यह है कि पाकिस्तान को अधिक केंद्रीकृत और अधिक व्यक्ति-केंद्रित सैन्य राज्य के रूप में देखा जाए. इसका मतलब है कि तेज खुफिया जानकारी जुटाने, तनाव बढ़ने से रोकने, हवाई और समुद्री तैयारियों और कमान के व्यवहार को करीब से समझने पर ज्यादा जोर देना होगा. यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि सामान्य नागरिक नियंत्रण अब भी पहले की तरह प्रभावी है.

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