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पाकिस्तान को चीन से मिल सकते हैं स्टील्थ जेट, भारत कितना तैयार?

पाकिस्तान चीन के J-35 के जरिए स्टील्थ क्षमता हासिल करने की तैयारी कर रहा है जबकि भारत का AMCA अभी विकास के चरण में है

China unveils J-35AE stealth fighter as Pakistan emerges likely first buyer
चीन का स्टील्थ जेट J 35 (फाइल फोटो)
अपडेटेड 8 अक्टूबर , 2026

दक्षिण एशिया के आसमान में अगली बड़ी होड़ अब सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि किसके पास ज्यादा लड़ाकू विमान हैं. असली सवाल यह हो सकता है कि असली स्टील्थ क्षमता पहले कौन हासिल करता है और उसका फायदा उठाने के लिए जरूरी व्यापक तंत्र कौन पहले तैयार करता है. स्टील्थ का मतलब है ऐसी तकनीक या क्षमता जिससे कोई लड़ाकू विमान रडार और दूसरे सेंसरों पर आसानी से दिखाई न दे.

चीन के J-35 पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमान में पाकिस्तान की कथित दिलचस्पी ने इस सवाल को और अहम बना दिया है. हालांकि किसी भी संभावित सौदे की सही स्थिति, आकार और समयसीमा अभी स्पष्ट नहीं है लेकिन पाकिस्तान का इस विमान को हासिल करने का प्रयास रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है. खबरों के मुताबिक पाकिस्तानी पायलट पहले से ही चीन में स्टील्थ ऑपरेशन की ट्रेनिंग ले रहे हैं. 

पहली बार ऐसा हो सकता है कि पाकिस्तान रडार पर मुश्किल से पकड़ में आने वाले लड़ाकू विमान को अपनी वायुसेना में शामिल कर ले जबकि भारत का एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) अभी काफी हद तक कागजों पर ही है. इससे दोनों देशों की क्षमताओं में ऐसा अंतर पैदा हो सकता है जिसमें संख्या जितनी अहम होगी, समय भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा.

भारतीय वायुसेना (IAF) के प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने हाल ही में माना कि पाकिस्तान के J-35 हासिल करने और पायलटों को चीन में ट्रेनिंग देने की खबरों पर करीबी नजर रखने की जरूरत है. 

भारत के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) का प्रारूप (फाइल फोटो)
भारत के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) का प्रारूप (फाइल फोटो)

उन्होंने कहा कि भारत के पड़ोस में पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की मौजूदगी पर बारीकी से नजर रखी जा रही है. साथ ही उन्होंने कहा कि भारत के पास ऐसे खतरों से निपटने की क्षमता पहले से मौजूद है.

स्टील्थ विमानों की जंग में टिके रहने की क्षमता को लेकर दुनिया भर में बहस भी तेज हो गई है. खबरों के मुताबिक एक अमेरिकी F-35 को ईरान के पुराने एयर डिफेंस सिस्टम से नुकसान पहुंचा. इससे यह सवाल उठा है कि अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म भी कितने असुरक्षित हो सकते हैं. 

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि किसी विमान की प्रभावशीलता सिर्फ रडार से बचने वाली उसकी बनावट पर निर्भर नहीं करती. अत्याधुनिक सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, सुरक्षित डेटा लिंक और सटीक हथियार मिलकर इसकी पूरी क्षमता तय करते हैं.

पाकिस्तान ने अपनी आधुनिक हवाई ताकत का बड़ा हिस्सा पहले ही चीनी तकनीक के इर्द-गिर्द तैयार कर लिया है. JF-17 कार्यक्रम, चीन में बने वायु रक्षा तंत्र, हथियारों और सेंसरों ने दोनों देशों के बीच ऐसे रक्षा संबंध तैयार किए हैं जो सामान्य खरीदार-विक्रेता संबंध से कहीं आगे हैं. 

J-35 को शामिल करने से यह साझेदारी एक नए क्षेत्र में पहुंच जाएगी. पाकिस्तान को ऐसा लड़ाकू विमान मिलेगा जिसे रडार पर पकड़ना मुश्किल होगा और यह सेंसर फ्यूजन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और नेटवर्क आधारित ऑपरेशन को ध्यान में रखकर बनाया गया है. 

इसे चीन से मिले मौजूदा रक्षा तंत्र में शामिल करने की भी संभावना होगी. यही कनेक्टिविटी भारतीय सैन्य योजनाकारों के लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात होनी चाहिए.

किसी स्टील्थ लड़ाकू विमान को रणनीतिक समीकरण बदलने के लिए बड़ी संख्या में दुश्मन के विमानों को मार गिराने की जरूरत नहीं होती. उसके कम दिखाई देने की क्षमता से एयरबेस, कमांड सेंटर, रडार साइट और दूसरी अहम जगहों की सुरक्षा मुश्किल हो सकती है. 

रूस ने भारत को SU-57 देने की पेशकश की है (फाइल फोटो)
रूस ने भारत को SU-57 देने की पेशकश की है (फाइल फोटो)

पाकिस्तानी विमानों की संख्या कम होने पर भी भारत को अपने रणनीतिक अड्डों की सुरक्षा के लिए ज्यादा संसाधन लगाने पड़ सकते हैं और कुछ परिस्थितियों में ज्यादा जोखिम उठाना पड़ सकता है. 

हालांकि इसका अंतिम असर इस बात पर निर्भर करेगा कि पाकिस्तान कितने विमान हासिल करता है, वे कितनी जल्दी ऑपरेशनल होते हैं, उनमें कौन से हथियार लगाए जाते हैं, पायलटों की ट्रेनिंग कैसी है, रखरखाव कैसा है और सहयोगी नेटवर्क कितना सक्षम है.

यहीं भारत के AMCA कार्यक्रम का महत्व बढ़ जाता है. नई दिल्ली ने तुरंत किसी विदेशी विमान को हासिल करने के बजाय अपना पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान विकसित करने का फैसला किया है. सरकार ने सितंबर 2028 तक पहली उड़ान का लक्ष्य रखा है. लेकिन अभी कई अहम पड़ाव बाकी हैं. 

निजी क्षेत्र की कंपनी का चयन नहीं हुआ है और डिजाइन भी अंतिम रूप नहीं ले सका है. ऐसे में स्थिति मुश्किल है. पाकिस्तान जहां चीनी पांचवीं पीढ़ी के विमान को शामिल करने की तैयारी कर सकता है, वहीं भारत अभी अपने विमान को अंतिम रूप देने और उसके औद्योगिक उत्पादन की क्षमता तैयार करने के चरण में है.

वायुसेना दिवस (8 अक्टूबर) से पहले IAF प्रमुख ने कहा कि अगर AMCA कार्यक्रम में देरी होती है तो "हमें दूसरे विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है." उन्होंने पुष्टि की कि रूस ने Su-57 की पेशकश की है. हालांकि उन्होंने साफ किया कि अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है.

रक्षा मंत्रालय स्वदेशी रास्ते पर आगे बढ़ने पर जोर देता रहा है. रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहा है कि भारत ने किसी वैश्विक पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम को आगे बढ़ाने का फैसला नहीं किया है. 

फोकस AMCA पर ही है. दोनों रुख अलग-अलग समयसीमा को दिखाते हैं. एक की जरूरत ऑपरेशनल है, जबकि दूसरा विकास की प्रक्रिया से जुड़ा है. इसलिए इनमें कोई विरोधाभास नहीं है.

IAF लंबे समय से विमानों की संख्या की समस्या से जूझ रही है. उसके पास फिलहाल करीब 29 लड़ाकू स्क्वाड्रन हैं जबकि अधिकृत संख्या 42.5 है. और गिरावट को रोकने के लिए हर साल करीब 36-40 लड़ाकू विमानों को शामिल करने की जरूरत है.

दूसरी ओर 2040 के दशक की हवाई जंग 1990 के दशक या यहां तक कि 2020 के दशक की जंग से बहुत अलग होगी. स्टील्थ, लंबी दूरी के हथियार, स्वायत्त प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, सेंसर फ्यूजन और मानवरहित लड़ाकू विमान हवाई ताकत को लेकर सोच बदल रहे हैं.

अच्छी तरह अपग्रेड किया गया चौथी पीढ़ी का लड़ाकू विमान आज भी बेहद सक्षम हो सकता है. लेकिन अब किसी वायुसेना की पूरी प्रभावशीलता सिर्फ विमान पर निर्भर नहीं करती. अहम यह है कि अत्याधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों और कम रडार पहचान वाले दुश्मन विमानों से भरे हवाई क्षेत्र में वह कैसा प्रदर्शन करता है.

अगर भारत के AMCA से पहले पाकिस्तान को पांचवीं पीढ़ी की सीमित क्षमता भी हासिल हो जाती है तो IAF को स्टील्थ विमानों का मुकाबला करने की क्षमताओं पर ज्यादा ध्यान देना होगा. 

इसमें लंबी दूरी के सेंसर, नेटवर्क से जुड़े रडार, अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, हवाई निगरानी और चेतावनी वाले विमान और ऐसे मिसाइल सिस्टम शामिल होंगे जो बेहद कम समय के लिए मिलने वाले लक्ष्य का फायदा उठा सकें. इससे भारत की बढ़त अचानक खत्म नहीं होगी लेकिन उसे बनाए रखना ज्यादा जटिल और महंगा हो जाएगा.

भारत के भविष्य के लड़ाकू विमानों के बेड़े को सिर्फ तेजस Mk1A, तेजस Mk2, राफेल और AMCA तक सीमित नहीं रखा जा सकता. ये विमान अहम बने रहेंगे. लेकिन इनके साथ कम लागत वाले ऐसे ड्रोन और डिकॉय से लेकर अत्याधुनिक मानवरहित लड़ाकू विमानों तक मानवरहित प्रणालियों का एक बड़ा परिवार भी काम करेगा, जिन्हें जरूरत पड़ने पर बड़ी संख्या में इस्तेमाल किया जा सकता है.

एक लॉयल विंगमैन अतिरिक्त हथियार ले जा सकता है, सेंसर की पहुंच बढ़ा सकता है, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध कर सकता है या डिकॉय के तौर पर काम कर सकता है. इसमें दूसरे पायलट की जान जोखिम में नहीं पड़ती. ऐसी प्रणालियां हवाई ताकत की अर्थव्यवस्था बदल देती हैं.

कोई भी देश सैकड़ों बेहद अत्याधुनिक मानवयुक्त लड़ाकू विमान रखने का खर्च नहीं उठा सकता. लेकिन वह इससे कहीं ज्यादा संख्या में मानवरहित प्लेटफॉर्म तैनात कर सकता है. इसलिए भविष्य की वायुसेना का आकलन सिर्फ इस आधार पर नहीं होगा कि उसके पास कितने लड़ाकू विमान हैं. यह भी देखा जाएगा कि वह कितनी बड़ी संख्या में और कितने प्रभावी ढंग से आपस में जुड़े लड़ाकू संसाधनों का इस्तेमाल कर सकती है.

भारत का स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान विकसित करने का फैसला देश के भीतर अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों को डिजाइन, बनाने, अपग्रेड करने और लंबे समय तक बनाए रखने की औद्योगिक और तकनीकी क्षमता तैयार करने से जुड़ा है. यह रणनीतिक आत्मनिर्भरता अहम है. लेकिन इसकी कीमत समय है. 

पाकिस्तान की J-35 से जुड़ी कथित योजनाएं इस समय को भारत के लिए और दबाव वाला बना सकती हैं. भारत की दीर्घकालिक रणनीति सही हो सकती है, लेकिन उसकी तत्काल समयसीमा असहज होती जा रही है.

विदेशी पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान यह अंतर जल्दी कम कर सकता है. लेकिन इससे लागत, तकनीक तक पहुंच, हथियारों के एकीकरण और लंबे समय की निर्भरता से जुड़े सवाल उठेंगे. IAF प्रमुख का ‘दूसरे विकल्पों’ का जिक्र यह संकेत नहीं है कि भारत ने Su-57 खरीदने या AMCA को छोड़ने का फैसला कर लिया है. इसका सीधा मतलब इतना है कि ऑपरेशनल जरूरतों को अनिश्चित समय तक टाला नहीं जा सकता.

अगर J-35 बड़ी संख्या में पाकिस्तान की वायुसेना में शामिल होता है तो अकेले यह विमान भारत की हवाई ताकत की बढ़त को खत्म नहीं कर देगा. भारत के पास अब भी कई अहम क्षमताएं हैं. 

इनमें राफेल लड़ाकू विमान, अपग्रेड किए गए Su-30MKI, स्वदेशी मिसाइलें, हवाई निगरानी और चेतावनी की क्षमताएं, तेजी से बढ़ती इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां और व्यापक एयरोस्पेस एवं रक्षा औद्योगिक आधार शामिल हैं. फिर भी J-35 जोखिम का समीकरण बदल सकता है. 

इससे भारत को अहम ठिकानों की सुरक्षा में ज्यादा निवेश करना पड़ सकता है, स्टील्थ का मुकाबला करने वाली तकनीकों को तेजी से विकसित करना पड़ सकता है और मानवयुक्त लड़ाकू विमानों, मानवरहित प्रणालियों, सेंसर और लंबी दूरी के हथियारों के एकीकरण पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है.

अगले दशक में हवाई वर्चस्व का फैसला इस आधार पर नहीं होगा कि कागज पर किसके पास सबसे प्रभावशाली लड़ाकू विमान है. फैसला इस बात से होगा कि पहले कौन देख सकता है, पहले कौन जुड़ सकता है, पहले कौन हमला कर सकता है और सबसे लंबे समय तक लड़ाई जारी रखने की क्षमता किसके पास है. 

पाकिस्तान चीन के जरिए पांचवीं पीढ़ी की क्षमता हासिल करने का शॉर्टकट अपना रहा है. भारत अपनी क्षमता खुद तैयार करने की कोशिश कर रहा है. रणनीतिक सवाल यह है कि क्या स्वदेशी रास्ता AMCA को क्षेत्रीय संतुलन बदलने से पहले ऑपरेशनल बनाने के लिए पर्याप्त तेजी से आगे बढ़ सकता है. नई दिल्ली के लिए यह अब सिर्फ स्टील्थ लड़ाकू विमान बनाने की होड़ नहीं है. यह समय के खिलाफ दौड़ है.

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