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चीनी के बाद प्याज की कीमतों ने निकाले आंसू, क्या है वजह?

जब प्याज की पैदावार में कोई बड़ी कमी नहीं हुई तो पूरे देश में इसके औसत खुदरा दाम करीब 60 फीसदी क्यों बढ़ गए और सरकार इस संकट से कैसे निपट रही है

govt sold onion at Rs. 35/kg at NAFED, NCCF and Kendriye Bhandar stores.
प्याज के दाम 60-70 रुपए किलो तक पहुंच गए हैं
अपडेटेड 1 सितंबर , 2026

प्याज को भारत की ‘सबसे राजनीतिक’ सब्जी कहना गलत नहीं होगा. एक बार फिर से प्याज ने घर का बजट बिगाड़ दिया है और सरकार की चिंता भी बढ़ा दी है. गुजरात में प्याज के दाम सिर्फ 15 दिनों में 35-40 रुपए किलो से बढ़कर 60-70 रुपए किलो हो गए हैं. पूरे देश में भी प्याज के दाम तेजी से बढ़े हैं. 24 अगस्त तक प्याज का औसत खुदरा भाव साल भर पहले के मुकाबले 59 फीसदी बढ़कर 43.53 रुपए किलो हो गया था. थोक दाम में भी 68 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

यह प्याज की पैदावार में भारी कमी की वजह से नहीं हुआ है. 2025-26 में भारत में प्याज की पैदावार 3.073 करोड़ टन रहने का अनुमान है. पिछले साल यह 3.076 करोड़ टन थी यानी इस साल भी फसल लगभग उतनी ही हुई है. असली परेशानी सरकार के पास रखे प्याज के भंडार में है. इस आपात भंडार का इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर प्याज के दाम कम करने के लिए किया जाता है.

केंद्र ने प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड के लिए रबी प्याज की 2 लाख टन खरीद का लक्ष्य रखा था. इस फंड का इस्तेमाल जरूरी कृषि सामानों की कीमतों में ज्यादा उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए किया जाता है. इसके तहत सही समय पर सामान खरीदा जाता है और जरूरत पड़ने पर उसका स्टॉक बाजार में भेजा जाता है.

लेकिन नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (NAFED) और नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (NCCF) मिलकर सिर्फ 1.2 लाख टन प्याज ही खरीद सके. यानी तय लक्ष्य से 40 फीसदी कम प्याज खरीदा गया. इतना ही नहीं, खरीदे गए प्याज में से करीब 30 फीसदी भंडारण के दौरान ही सड़ गया या उसमें अंकुर निकल आए. आम तौर पर करीब 20 फीसदी प्याज ही इस तरह खराब होता है.

इस साल फसल कटाई के समय बारिश की वजह से प्याज की गुणवत्ता भी खराब हुई थी (सांकेतिक फोटो)
इस साल फसल कटाई के समय बारिश की वजह से प्याज की गुणवत्ता भी खराब हुई थी (सांकेतिक फोटो)

इस नुकसान की एक वजह इस साल फसल की कटाई और बुआई के समय हुई बेमौसम बारिश भी है. कटाई के दौरान ज्यादा नमी से प्याज की गुणवत्ता और उसे लंबे समय तक रखने की क्षमता दोनों प्रभावित हुईं. इससे गोदामों में प्याज जल्दी सड़ने लगा. इसके अलावा खरीफ की बुआई के समय बारिश देर से हुई और कम हुई. इससे अगली फसल का चक्र भी पीछे चला गया यानी जिस नई फसल से प्याज की कमी दूर होनी चाहिए थी, वह अभी तैयार नहीं है.

किसानों को प्याज खराब होने का डर था इसलिए उन्होंने सितंबर में बेचने की सामान्य शुरुआत के बजाय जून-जुलाई में ही अपना प्याज बाजार में निकालना शुरू कर दिया. थोक बाजार में ज्यादा दाम मिलने के कारण किसानों ने सरकार को प्याज बेचने के बजाय खुले बाजार में बेचने को प्राथमिकता दी. इससे सरकार का भंडार भी उस समय तक भर नहीं पाया, जब उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी.

गुजरात में व्यापारियों के मुताबिक, खराब गुणवत्ता के कारण किसानों का करीब एक चौथाई प्याज पूरी तरह से खराब हो गया. साथ ही एक और चौथाई प्याज खेत से समय से पहले निकाल लिया गया. इस तरह सिर्फ आधी फसल ही बाजार में बेचने लायक बची.

अगस्त-सितंबर में प्याज के दाम बढ़ना अब लगभग हर साल की बात हो गई है. इसकी एक वजह गर्मियों की पुरानी फसल खत्म होने और खरीफ की नई फसल के बाजार में आने के बीच का अंतर है. साथ ही त्योहारों और शादी के मौसम में मांग भी बढ़ जाती है. इस साल खास बात यह है कि वर्तमान में सरकार का प्याज भंडार जरूरत के मुताबिक तैयार नहीं हो पाया.

केंद्र सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए दो मोर्चों पर काम शुरू किया है. पहला है प्याज की सप्लाई बढ़ाना. इसके लिए नासिक के सरकारी भंडार से 800 टन प्याज पांच बड़े केंद्रों दिल्ली, चेन्नै, मदुरै, एर्नाकुलम और गुवाहाटी तक पहुंचाने के लिए खास ‘कांदा एक्सप्रेस’ मालगाड़ियां चलाई जा रही हैं. NAFED और NCCF भी सड़क के रास्ते कम मात्रा में प्याज भेज रहे हैं.

दूसरा कदम प्याज के दाम कम करना है. दिल्ली में NAFED, NCCF और केंद्रीय भंडार के जरिए 35 रुपए किलो की सब्सिडी वाली दर पर प्याज की बिक्री शुरू हो गई है. इसके बाद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानी एनसीआर में भी यह बिक्री शुरू की जाएगी.

अधिकारियों के मुताबिक, यह व्यवस्था पिछले साल भी अपनाई गई थी. तब 86 मालगाड़ियों के जरिए 16 शहरों में 88,000 टन प्याज भेजा गया था. इससे एक साल पहले सिर्फ 14 मालगाड़ियों के जरिए 12,000 टन प्याज भेजा गया था. यानी पिछले साल सरकार ने बड़े स्तर पर कदम उठाया था लेकिन यह पहले से तैयारी करने के बजाय समस्या आने के बाद उठाया गया कदम था.

खास बात यह है कि केंद्र की पांच शहरों की प्राथमिकता वाली सूची में गुजरात शामिल नहीं है, जबकि वहां प्याज की कीमतें दिल्ली के बराबर या उससे भी ज्यादा हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अहमदाबाद, सूरत या राजकोट में भी प्याज का सरकारी स्टॉक भेजकर लोगों को राहत दी जाएगी?

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