
नितिन नवीन 20 जनवरी से BJP के अध्यक्ष हैं. उन्हें अपनी टीम 17 अगस्त को मिली. पार्टी अध्यक्ष के पद के लिहाज से यह न तो असामान्य है और न ही बहुत सहज स्थिति.
उनके पूर्ववर्ती जेपी नड्डा ने 2020 में अपनी टीम बनाने में आठ महीने लगाए थे और इसकी वजह कोविड महामारी को बताया था. नवीन के पास इससे बेहतर वजह है. उनके अध्यक्ष बनने के करीब तीन महीने बाद पार्टी पांच राज्यों के चुनाव प्रचार के बीच थी.
जब कार्यकर्ता पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में चुनावी मैदान में उतर चुके हों, तब कोई भी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व नहीं बदलता. फिर भी सात महीने, सात महीने होते हैं. इस पूरे दौर में BJP के इतिहास के सबसे युवा अध्यक्ष नड्डा की टीम के पदाधिकारियों के साथ ही संगठन चला रहे थे.
17 अगस्त को आखिरकार नवीन की टीम की सूची सामने आई. इसमें 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, आठ राष्ट्रीय महासचिव, 16 राष्ट्रीय सचिव, एक कोषाध्यक्ष, सात मोर्चा प्रमुख और मीडिया व सोशल मीडिया की पूरी व्यवस्था को ऊपर से नीचे तक नए सिरे से तैयार किया गया है.
ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषण इसे 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP के प्रदर्शन, उसके सामाजिक गठबंधनों, जातीय समीकरण और लोकसभा में अपने दम पर बहुमत खोने की भरपाई की कवायद के तौर पर देख रहे हैं. लेकिन यह आकलन एक साल पुराना पड़ चुका है.

अध्यक्ष नवीन का पहला चुनावी प्रदर्शन बेहद अच्छा रहा. BJP ने पश्चिम बंगाल में सेंध लगा दी. असम में 126 में से 82 सीटों के साथ वह अपने दम पर सत्ता में लौटी. यह लगातार तीसरी बार है जब पार्टी राज्य में सत्ता में आई है. पुडुचेरी में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सत्ता में बना रहा.
तमिलनाडु और केरल में वैसे भी पार्टी के लिए जीत की संभावना नहीं थी. ऐसे में पश्चिम बंगाल में जीत हासिल करने वाला पहली बार अध्यक्ष बना नेता नुकसान की भरपाई करने वाला व्यक्ति नहीं है. उसके पास अपनी राजनीतिक पूंजी है. यही वजह है कि 17 अगस्त को जारी पदाधिकारियों की सूची में दिख रही सावधानी सबसे दिलचस्प सवाल बन जाती है.
इसका कुछ जवाब नवीन की व्यक्तिगत स्थिति में भी मिल सकता है. मार्च में नवीन राज्यसभा गए और पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट छोड़ दी. वे 2006 से इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. इससे पहले 1995 से उनके पिता BJP के लिए इस सीट से विधायक थे.
उपचुनाव में प्रशांत किशोर ने जीत हासिल की. यह उनकी जन सुराज पार्टी की पहली सीट थी. अगर बंगाल ने नवीन को अधिकार दिया तो बांकीपुर ने उसका एक हिस्सा वापस ले लिया. ऐसे में जिस अध्यक्ष ने अभी-अभी अपनी पुरानी विधानसभा सीट गंवाई हो, वह BJP के संसदीय बोर्ड के सामने अपने लिए पूरी छूट की मांग करते हुए नहीं जा सकता.
‘युवा’ टीम का गणित
BJP ने नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने को पीढ़ीगत बदलाव के तौर पर जोर-शोर से पेश किया था और इसमें कुछ सच्चाई भी है. उनकी उम्र 46 साल है. भारत के 40 फीसदी से अधिक मतदाता 40 साल से कम उम्र के हैं.
जनवरी में BJP नेतृत्व ने इस सोच को पार्टी के नियमों में भी शामिल कर दिया. इसके तहत युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की अधिकतम उम्र 35 साल और उसकी राज्य इकाइयों के अध्यक्ष की अधिकतम उम्र 32 साल तय कर दी गई. ऐसे में यह देखना जरूरी है कि नवीन ने जो टीम बनाई है, उसकी वास्तविक तस्वीर कैसी है.
सत्ता के केंद्र में मौजूद तीन स्तरों को देखें तो कुल 22 लोग हैं: 13 उपाध्यक्ष, आठ महासचिव और बीएल संतोष. इनमें से 17 की जन्मतिथि दर्ज है. नौ की उम्र 60 साल से ज्यादा है.

इनमें वसुंधरा राजे 73 साल, तारिक मंसूर करीब 70 साल, डी. पुरंदेश्वरी 67 साल, मनप्रीत सिंह बादल 64 साल, विनोद तावड़े 63 साल और तीरथ सिंह रावत, बैजयंत पांडा तथा सतीश पूनिया 62-62 साल के हैं. राम माधव इसी हफ्ते 62 साल के हो जाएंगे.
आठ नेता 60 साल से कम उम्र के हैं और इनकी उम्र 50 से 59 साल के बीच है. संतोष 59, संजय भाटिया 58, सुनील बंसल करीब 57, बिप्लब देब 56, हरीश द्विवेदी 52, गजेंद्र पटेल 51 और स्मृति ईरानी 50 साल की हैं.
यानी पूरी शीर्ष संरचना में 50 साल से कम उम्र का केवल एक नेता है. वे हैं 46 वर्षीय भारती प्रवीण पवार. 40 साल से कम उम्र का कोई नेता नहीं है.
इस सूची में एक युवा समूह जरूर है. यह उससे एक स्तर नीचे 16 राष्ट्रीय सचिवों में दिखाई देता है. अनिल एंटनी, संदीप पाठक, रोहन गुप्ता और फांगनॉन कोन्याक सभी 40 की उम्र में हैं. इनमें से कई ऐसे नेता हैं जो पार्टी कैडर से नहीं आए हैं.
कुछ के लिए ओहदे, कुछ के लिए जिम्मेदारियां
कवरेज में एक और महत्वपूर्ण अंतर को नजरअंदाज किया जा रहा है. BJP में इन दोनों स्तरों की भूमिका एक जैसी नहीं है. महासचिव संगठन चलाते हैं. उपाध्यक्ष, कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आम तौर पर सम्मानजनक इंतजारगाह में बैठे रहते हैं.
नामों को इसी नजर से देखें तो तस्वीर बदल जाती है. इस इंतजारगाह में वसुंधरा राजे जाती हैं. उन्हें बरकरार रखा गया है, पदोन्नत नहीं किया गया. वे 2020 से इस पद पर हैं.
इसके साथ ही पांच साल बाद वापसी करने वाले माधव भी हैं. हालांकि उन्हें उपाध्यक्ष बनाया गया है, न कि महासचिव, जिस पद पर वह पहले रह चुके हैं. इसके अलावा रावत, पुरंदेश्वरी और बादल भी इसी श्रेणी में हैं. सभी को सम्मान मिला है और उन्हें एक दायरे में रखा गया है.

लोकसभा के पूर्व सदस्य और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को पद से हटाए जाने के बाद नाराजगी थी. उनका पद बढ़ाने का मतलब यह भी हो सकता है कि अगले साल होने वाले उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में उन्हें चुनाव लड़ने का मौका न मिले.
पुरंदेश्वरी को राज्य की राजनीति से निकालकर राष्ट्रीय स्तर पर लाया गया है, ताकि उनके बहनोई और सहयोगी तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू को संतुष्ट किया जा सके.
बादल के राष्ट्रीय राजनीति में आने का मतलब है कि अब उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल के लिए दावेदार नहीं माना जाएगा.
तावड़े और बंसल दोनों को बरकरार रखा गया है. दोनों अमित शाह के करीबी हैं और पार्टी के लिए वास्तव में राज्यों में जीत हासिल करने वाले नेताओं में शामिल हैं. ईरानी के जिम्मे उत्तर प्रदेश है.
देब और पूनिया के अलावा 50 की शुरुआती उम्र वाले तीन नए महासचिव हैं- द्विवेदी, पटेल और भाटिया. संगठन पर पकड़ और चुनावी अभियान तैयार करने का इन तीनों का लंबा अनुभव रहा है.
संगठन का काम संभालने वाले हिस्से में कोई बदलाव नहीं किया गया है. संतोष अपने पद पर बने हुए हैं. शिव प्रकाश और सौदान सिंह को संयुक्त महासचिव (संगठन) बनाया गया है. पिछले सात उपाध्यक्षों को हटा दिया गया है.
उत्तर प्रदेश को पर्याप्त संगठनात्मक जिम्मेदारी दी गई है. ईरानी को राज्य की संगठनात्मक जिम्मेदारी मिली है. रेखा वर्मा उपाध्यक्ष के पद पर बरकरार हैं. भोला सिंह और संगीता यादव को सचिव बनाया गया है.

ये सभी उस प्रदेश इकाई के ऊपर काम करेंगे, जिसमें दिसंबर 2025 में बदलाव हुआ था. तब पंकज चौधरी ने भूपेंद्र चौधरी की जगह BJP के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष का पद संभाला था. 2027 की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनावों की समयसीमा तेजी से नजदीक आ रही है.
सबसे बड़ी हैरानी की बात रही केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को BJP का नया राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया जाना. पार्टी की एक व्यक्ति-एक पद की परंपरा के तहत वे इस पद पर लंबे समय तक नहीं रह सकते. इसे केंद्रीय मंत्रिमंडल से जुड़ा संकेत मानिए और संसद के मानसून सत्र के बाद क्या होता है, इस पर नजर रखिए.
अमित मालवीय की विदाई एक स्वीकारोक्ति
अमित मालवीय ने 2015 से BJP का डिजिटल ऑपरेशन संभाला है. 2019 के आम चुनाव, कोरोना महामारी, 2024 के लोकसभा चुनाव और आईटी सेल से जुड़े हर विवाद के दौरान वे इस जिम्मेदारी पर बने रहे.
मालवीय का बने रहना पार्टी से ज्यादा खुद उनके बारे में नहीं, बल्कि पार्टी के बारे में एक तथ्य बन गया था. इससे पता चलता था कि वे सीधे किसे रिपोर्ट करते हैं और उन्हें कितनी पूरी सुरक्षा हासिल है. अब वह सुरक्षा खत्म हो गई है. इस मुद्दे पर पार्टी के भीतर बहस हुई और आखिरकार फैसला उनके खिलाफ गया.
एक दशक से BJP का डिजिटल ऑपरेशन एक खास मामले में शानदार रहा है. दिल्ली से देश की राजनीतिक बातचीत की दिशा तय करना. लेकिन 2024 में यह सामने आया कि अब असली लड़ाई यहां नहीं है.
यह अब क्षेत्रीय भाषाओं वाले यूट्यूब चैनलों, पॉडकास्ट और ऐसे इन्फ्लुएंसर नेटवर्क तक पहुंच गई है, जिन्हें दिल्ली नियंत्रित नहीं करती. यह स्थानीय वॉट्सएप ग्रुपों और तेजी से बढ़ रहे AI से तैयार कंटेंट तक भी पहुंच चुकी है, जिसे पार्टी की अपनी ट्रेंड मशीनरी न तो तैयार करने के लिए बनाई गई थी और न ही नियंत्रित करने के लिए.
2024 में विपक्ष का जाति वाला नैरेटिव ट्विटर के जरिए नहीं फैला. यह क्षेत्रीय भाषाओं के उन चैनलों के जरिए फैला, जिन्हें BJP का दिल्ली नेतृत्व न तो पहले भांप पाया और न ही समय पर उसका जवाब दे सका. मालवीय को हटाना पार्टी की ओर से इस बात को स्वीकार करना है. लेकिन उनकी जगह किसे लाया गया है, यह उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है. नए सोशल मीडिया प्रमुख दीपक म्हस्के इस पद पर पहुंचने वाले संगठन से आए पहले नेता हैं.
म्हस्के से पहले इस पद पर रहे दोनों नेता एक खास तरह से पार्टी में बाहर से आए थे. डॉ. अरविंद गुप्ता 2014 के लोकसभा चुनाव के डिजिटल अभियान के रणनीतिकार थे. उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय से एमबीए किया है और भारत तथा सिलिकॉन वैली में कंसल्टिंग, सॉफ्टवेयर, बैंकिंग और स्टार्ट-अप के क्षेत्र में 25 साल का अनुभव है.
मालवीय बैंकिंग क्षेत्र से आए थे. 2009 में फ्रेंड्स ऑफ BJP फोरम के जरिए BJP के करीब आए और छह साल बाद राष्ट्रीय आईटी सेल संभाल रहे थे. दोनों को उनकी क्षमता के लिए लाया गया था. दोनों ने संगठन में एक दिन भी काम नहीं किया था.
म्हस्के ने संगठन के अलावा बहुत कम काम किया है. वे BJP की छत्तीसगढ़ इकाई में प्रवक्ता के तौर पर आगे बढ़े. उन्होंने राज्य के डिजिटल अभियानों और जनसंपर्क का काम संभाला. वे छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन के अध्यक्ष के तौर पर राज्य सरकार में एक पद भी संभालते हैं.
म्हस्के संचार क्षेत्र के पेशेवर नहीं हैं बल्कि एक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने एक मध्यम आकार के राज्य में जिले से लेकर ऊपर तक डिजिटल ऑपरेशन तैयार किया है.

यह सिर्फ पद संभालने वाले व्यक्ति में बदलाव नहीं है. यह इस पद की परिभाषा में बदलाव है. पार्टी ने अपने नैरेटिव को चलाने के लिए किसी तकनीकी विशेषज्ञ को नियुक्त करना बंद कर एक ऐसे संगठनकर्ता को जिम्मेदारी दी है, जिसकी पहली नजर इस पर होगी कि कोई संदेश किस बूथ तक पहुंच रहा है, न कि किस प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड कर रहा है.
अगर BJP का आकलन है कि वह क्षेत्रीय भाषाओं की जमीनी लड़ाई हार गई थी, तो उस लड़ाई को वास्तव में लड़ चुके किसी व्यक्ति को आगे बढ़ाना कम से कम पार्टी की सोच के अनुरूप है.
यह भी साफ तौर पर नवीन का अपना चुनाव है. छत्तीसगढ़ में वह चुनाव प्रभारी थे और 2023 में उन्होंने कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने में अहम भूमिका निभाई थी. म्हस्के के साथ उन्होंने काम किया है और उन्हें चुना है.
उनके साथ चार सह-संयोजक भी बनाए गए हैं- प्रीति गांधी, शिवानंद द्विवेदी, आलोक भट्ट और अरुण यादव. इससे विकेंद्रीकरण की उस व्याख्या को बल मिलता है, जिसे पार्टी की ओर से सामने रखा जा रहा है.
लेकिन संरचनात्मक रूप से एक तथ्य सबसे महत्वपूर्ण है. पार्टी का सबसे धारदार हथियार 11 साल से नरेंद्र मोदी-अमित शाह की पसंद से नियुक्त व्यक्ति के हाथ में था. अब यह जिम्मेदारी पहली बार राष्ट्रीय पद पाने वाले ऐसे व्यक्ति को दी गई है जिसकी नियुक्ति नए अध्यक्ष की वजह से हुई है.
ऐसी सूची में जहां बहुत कम बदलाव हुए हैं, यह वह एक जगह है जहां नवीन ने अपने व्यक्ति को एक महत्वपूर्ण पद दिलाया है. यही उनका सबसे स्पष्ट दखल है और यही वह जगह भी है जहां वह सबसे ज्यादा जोखिम में हैं.
अगर क्षेत्रीय भाषाओं की रणनीति सफल होती है तो इसका श्रेय उन्हें मिलेगा. अगर 2027 में उत्तर प्रदेश में यह मशीनरी नाकाम होती है तो जिम्मेदारी किसी और को नहीं दी जा सकेगी.
उत्तराधिकार की योजना
क्या यह किसी उत्तराधिकार योजना की सतर्क शुरुआत है? एक पूरी तरह तैयार उत्तराधिकार व्यवस्था में ऐसी दूसरी पंक्ति होनी चाहिए जिसके पास वास्तविक कार्यकारी अधिकार हों, राज्य नेतृत्व से राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचने की एक मजबूत प्रक्रिया हो और ऐसा अध्यक्ष हो जिसका अपना राजनीतिक आधार हो.
17 अगस्त को सामने आई तस्वीर में दूसरी पंक्ति के नेताओं के पास ज्यादातर औपचारिक भूमिकाएं हैं. 50 साल से कम उम्र के नेताओं में मजबूत नेतृत्व की अगली कतार तैयार होती नहीं दिखती. वहीं, अध्यक्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि पश्चिम बंगाल की जीत का श्रेय भी उनके संगठन को नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री के चुनाव अभियान को दिया जा रहा है.
फिलहाल यह भविष्य की स्थिति के लिए एक तरह की एहतियाती तैयारी है. मोदी 75 साल के हैं और सरकार का कार्यकाल 2029 तक है. नवीन का तीन साल का कार्यकाल जनवरी 2029 में खत्म होगा.
यानी अगले आम चुनाव के लिए संगठन का अभियान चलाने वाले अध्यक्ष का कार्यकाल उसी समय खत्म होने जा रहा होगा जब चुनाव की प्रक्रिया शुरू होगी. ऐसे में पार्टी के पास उन्हें लेकर फैसला करने की गुंजाइश बनी रहेगी.
सीधे शब्दों में कहें तो BJP ने एक युवा अध्यक्ष बनाया है, उन्हें ऐसी टीम दी है जिसे उन्होंने ज्यादातर खुद नहीं चुना.
इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संगठनात्मक रीढ़ और शाह की चुनावी मशीनरी को उसी जगह बनाए रखा गया है, क्षेत्रीय क्षत्रपों को सम्मानजनक लेकिन प्रभावहीन जगह दी गई है और नवीन को खुद को साबित करने के लिए एक वास्तविक हथियार दिया है.
अब आगे तीन चीजों पर नजर रखनी होगी. पहला, क्या गोयल केंद्रीय मंत्रिमंडल में बने रहते हैं. इससे पता चलेगा कि एक व्यक्ति-एक पद की अवधारणा कोषाध्यक्ष के पद के सामने टिकती है या नहीं.
दूसरा, उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी कौन बनता है. यह ईरानी को मिली संगठनात्मक जिम्मेदारी से अलग और ज्यादा महत्वपूर्ण नियुक्ति होगी.
तीसरा, म्हस्के वास्तव में क्या तैयार करते हैं. क्योंकि एक सही मायने में विकेंद्रीकृत डिजिटल ऑपरेशन और केंद्रीकृत डिजिटल ऑपरेशन पहले साल में एक जैसे दिख सकते हैं, लेकिन दूसरे साल तक दोनों में जमीन-आसमान का अंतर नजर आ जाएगा.
BJP ने अगले दशक के लिए तैयारी शुरू कर दी है. लेकिन उसने अभी उस केंद्र की अनुपस्थिति के लिए तैयारी शुरू नहीं की है, जिसके इर्द-गिर्द यह पूरी व्यवस्था घूमती है. इन 22 नामों से जो तस्वीर सामने आती है, उसमें इस बदलाव के पहले चरण में एक अध्यक्ष, एक संचार प्रमुख और एक वादा है.

