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क्या NEET-PG 2025 में जीरो कट-ऑफ से मेडिकल की पढ़ाई बर्बाद हो जाएगी?

NEET PG 2025 में यूपी की 1200 सीटों समेत कुल 18 हजार से ज्यादा सीटें खाली रहने पर कट-ऑफ शून्य तक घटाने का फैसला लिया गया है

Health ministry records show that qualifying thresholds for NEET-PG have been revised in several previous admission cycles, indicating a recurring mismatch between eligibility criteria and available training capacity rather than a one-off adjustment.
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 19 जनवरी , 2026

नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट यानी NEET PG 2025 के लिए क्वालिफाइंग कट-ऑफ को अचानक घटाकर कुछ श्रेणियों में शून्य परसेंटाइल तक लाने के फैसले ने देशभर के डॉक्टरों, मेडिकल शिक्षकों और स्वास्थ्य नीति से जुड़े विशेषज्ञों के बीच गहरी बहस छेड़ दी है. 

यह बहस सिर्फ एक परीक्षा या दाखिले की प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता, भविष्य के विशेषज्ञ डॉक्टरों की क्षमता और आम मरीजों की सुरक्षा जैसे बुनियादी सवाल खड़े हो गए हैं.

मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) और नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) के 15 जनवरी को लिए गए इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण देश भर में पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटों का बड़े पैमाने पर खाली रह जाना है. अनुमान है कि काउंसलिंग के दो राउंड पूरे होने के बाद भी लगभग 18,000 MD, MS और DNB सीटें खाली थीं. इनमें सरकारी के साथ-साथ निजी मेडिकल कॉलेजों की बड़ी संख्या में सीटें शामिल हैं. अकेले उत्तर प्रदेश के निजी मेडिकल कॉलेजों में करीब 1200 PG सीटें खाली बताई जा रही हैं.

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के निर्देशों के तहत उठाए गए इस कदम का उद्देश्य 2025-26 के एकेडमिक सेशन में सीटों को खाली जाने से रोकना बताया गया है. संशोधित नियमों के अनुसार, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल को घटाकर शून्य कर दिया गया है, जबकि अनारक्षित वर्ग के लिए इसे 50 से घटाकर सात परसेंटाइल कर दिया गया. बेंचमार्क विकलांगता (PwBD) वाले अनारक्षित उम्मीदवारों के लिए यह सीमा पांच परसेंटाइल तय की गई है. 

इस फैसले के बाद सोशल मीडिया और मेडिकल समुदाय में यह चर्चा तेजी से फैली कि माइनस 40 अंक पाने वाले उम्मीदवारों को भी अब PG में दाखिला मिल सकता है. इससे छात्रों और आम लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई. हालांकि, कई डॉक्टरों और विशेषज्ञों ने साफ किया कि माइनस 40 अंक सिर्फ NEET PG की नेगेटिव मार्किंग प्रणाली के तहत रॉ स्कोर को दर्शाते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसे उम्मीदवार को अपने आप सीट मिल जाएगी. शून्य परसेंटाइल सिर्फ काउंसलिंग में शामिल होने की पात्रता देता है. अंतिम सीट आवंटन अब भी रैंक, भरी गई चॉइस और उपलब्ध सीटों पर निर्भर करता है.
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के पूर्व शिक्षक प्रोफेसर नरसिंह वर्मा इस फैसले को एक व्यावहारिक कदम के तौर पर देखते हैं. उनके मुताबिक, “यह समझना जरूरी है कि NEET PG में बैठने वाला हर उम्मीदवार पहले से एमबीबीस डॉक्टर होता है. कट-ऑफ कम करने से मेरिट के आधार पर दाखिला खत्म नहीं हो जाता. शून्य परसेंटाइल का मतलब सिर्फ यह है कि उम्मीदवार काउंसलिंग में बैठ सकता है. काउंसलिंग के दौरान हमेशा बेहतर रैंक वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता मिलेगी.”

KGMU के एक वरिष्ठ फैकल्टी सदस्य का भी मानना है कि परसेंटाइल को काबिलियत का सीधा पैमाना मानना सही नहीं है. उन्होंने कहा, “परसेंटाइल एक सापेक्ष आंकड़ा है. इसे अक्सर उन ब्रांचों या कॉलेजों की सीटें भरने के लिए घटाया जाता है, जिन्हें छात्र कम पसंद करते हैं. दाखिला मिलना यह नहीं दिखाता कि उम्मीदवार को डिग्री मिल ही जाएगी. MD, MS या DNB पाने के लिए तीन साल की कठोर ट्रेनिंग, मरीजों के साथ काम और परीक्षाएं पास करनी होती हैं.”

लेकिन इस फैसले को लेकर आलोचनाओं की आवाज कहीं ज्यादा तेज सुनाई दे रही है. कई सीनियर डॉक्टरों और मेडिकल संगठनों ने इसे भारतीय चिकित्सा मानकों में गिरावट और जनस्वास्थ्य के लिए खतरा बताया है. नेशनल यूनाइटेड फ्रंट ऑफ डॉक्टर्स (NUFD) के संस्थापक प्रोफेसर अनिल नौसरान ने इस निर्णय पर कड़ी आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि “मेडिकल शिक्षा को किसी अन्य कोर्स की तरह नहीं देखा जा सकता. डॉक्टर सीधे इंसानी जिंदगी से जुड़े होते हैं. योग्यता से किया गया कोई भी समझौता देश के जनस्वास्थ्य और सुरक्षा को खतरे में डालता है.”

प्रो. नौसरान का आरोप है कि कट-ऑफ घटाने से असल फायदा निजी मेडिकल कॉलेजों को होगा. वे कहते हैं, “जो सीटें योग्यता के अभाव में खाली रहती हैं, उन्हें ऐसे उम्मीदवारों से भरा जा रहा है जो मेरिट से ज्यादा फीस देने की क्षमता रखते हैं. इससे ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन मेधावी छात्र पीछे रह जाते हैं. यह शैक्षिक सुधार नहीं, बल्कि चिकित्सा का व्यवसायीकरण है.” उन्होंने यह भी बताया कि संशोधित नियमों के बाद सामान्य वर्ग में 800 में से 103 अंक पाने वाले, सामान्य वर्ग के दिव्यांग उम्मीदवार 90 अंक और ओबीसी, एससी व एसटी वर्ग के उम्मीदवार माइनस 40 अंक के बावजूद काउंसलिंग के लिए पात्र हो गए हैं. उनके अनुसार, “कट-ऑफ कम करने का सीधा असर रोगी सुरक्षा, जनविश्वास और राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिणामों पर पड़ेगा. चिकित्सा में योग्यता का कोई विकल्प नहीं हो सकता.”

आलोचक यह भी सवाल उठा रहे हैं कि अगर समस्या सिर्फ नॉन-क्लिनिकल और पैरा-क्लिनिकल विषयों में सीटें खाली रहने की है, तो क्या इतना बड़ा कट-ऑफ घटाना जरूरी था. एक वरिष्ठ डॉक्टर का कहना है कि “अगर 5 से 10 परसेंटाइल की मामूली छूट दी जाती, तो शायद कम पसंद किए जाने वाले विषयों में भी उम्मीदवार आ जाते. माइनस 40 का कट-ऑफ एक बहुत अलग मैसेज देता है और इससे पूरे सिस्टम की साख पर सवाल उठते हैं.”

इस बहस के बीच परीक्षा और काउंसलिंग में हो रही देरी भी एक बड़ी चिंता बन रही है. NEET PG 2025 का रिजल्ट सितंबर में घोषित हुआ, लेकिन काउंसलिंग जनवरी तक चलती रही. कई डॉक्टरों का मानना है कि इस देरी के कारण भी सीटें खाली रह जाती हैं, क्योंकि उम्मीदवार या तो विदेश चले जाते हैं या अन्य करियर विकल्प चुन लेते हैं.

पीडियाट्रिशियन डॉ. अतुल अग्रवाल का कहना है कि “स्टैंडर्ड कम करना किसी भी तरह से समाधान नहीं है. असली जरूरत सिस्टम में सुधार की है. पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में नए मेडिकल कॉलेज खुले हैं, लेकिन कई जगह फैकल्टी स्ट्रेंथ और इंफ्रास्ट्रक्चर कमजोर है. ऐसे में चयन प्रक्रिया को और कमजोर करना भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है.” कुछ डॉक्टरों ने यह भी चेतावनी दी कि मानकों में गिरावट का सबसे ज्यादा असर गरीब और ग्रामीण मरीजों पर पड़ेगा, जो सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों पर निर्भर हैं. उनका तर्क है कि अगर ट्रेनिंग की गुणवत्ता कमजोर हुई तो उसका सीधा असर मरीजों की देखभाल पर दिखेगा.

वहीं, इस फैसले का बचाव करने वालों का कहना है कि हर साल बड़ी संख्या में PG सीटों का खाली रहना भी एक गंभीर समस्या है. एक निजी मेडिकल यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर के अनुसार, “कई नॉन-क्लिनिकल PG सीटें हर साल खाली रह जाती हैं. इससे संसाधनों की बर्बादी होती है और फैकल्टी की कमी बनी रहती है. कट-ऑफ कम करने से सीटें भरेंगी और एकेडमिक कामकाज पर इसका नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा.” उनका कहना है कि यह एक अस्थायी प्रशासनिक उपाय है, न कि दीर्घकालिक नीति. “आज मेडिकल शिक्षा प्रणाली में परीक्षा के समय, फंडिंग और रेगुलेशन से जुड़े बड़े सुधारों की जरूरत है. कट-ऑफ घटाना उन समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं है, लेकिन खाली सीटों की तत्काल समस्या से निपटने का एक तरीका जरूर है.” वाइस चांसलर ने कहा. 

सरकारी पक्ष भी इस तर्क के साथ सामने आया है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह टिप्पणी कर चुका है कि मेडिकल PG सीटें खाली नहीं जानी चाहिए. नेशनल मेडिकल कमीशन की ओर से जारी नोट में कहा गया है कि इतनी बड़ी संख्या में सीटों का खाली रहना राष्ट्रीय मेडिकल शिक्षा संसाधनों की बर्बादी है और इसका कारण उम्मीदवारों की काबिलियत की कमी नहीं, बल्कि मौजूदा परसेंटाइल मानदंड हैं, जो पात्र उम्मीदवारों के दायरे को सीमित कर देते हैं.

फिलहाल, NEET PG 2025 का यह फैसला मेडिकल शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़े पुराने सवालों को एक बार फिर उजागर करता है. एक तरफ सीटें भरने और संसाधनों के बेहतर उपयोग की दलील है, तो दूसरी तरफ योग्यता, गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा की चिंता. साफ है कि सिर्फ कट-ऑफ घटाने से न तो मेडिकल शिक्षा की जटिल समस्याएं हल होंगी और न ही देश को बेहतर डॉक्टर मिलेंगे.

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