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मद्रास हाई कोर्ट के फैसले से ‘हाउस हसबैंड’ को लेकर बदलेगी सोच?

मद्रास हाई कोर्ट ने ‘होममेकर’ शब्द को महिला और पुरुष दोनों के लिए इस्तेमाल होने वाला बताते हुए उस सोच पर सवाल उठाया है जिसके मुताबिक घर का काम करना सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी माना जाता है

सांकेतिक तस्वीर (एआइ)
सांकेतिक तस्वीर (एआइ)
अपडेटेड 22 अक्टूबर , 2026

बेंगलुरू में रहने वाले 39 साल के कार्तिक नायर पहले मार्केटिंग मैनेजर थे. दूसरे बच्चे के जन्म के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी. इसके पीछे आर्थिक वजह साफ थी. उनकी पत्नी इन्वेस्टमेंट बैंकर हैं और उनसे काफी ज्यादा कमाती हैं. वहीं, दो छोटे बच्चों की देखभाल पर काफी खर्च आता है और दोनों की नौकरी के समय के हिसाब से बच्चों को संभालना भी मुश्किल होता है लेकिन कार्तिक को हैरानी इस बात पर होती है कि उन्हें बार-बार अपने इस फैसले की वजह बतानी पड़ती है. वे कहते हैं, “अगर मेरी पत्नी कहती हैं कि वह बच्चों की देखभाल कर रही हैं तो कोई नहीं पूछता कि वे दिन भर क्या करती हैं. जब मैं ऐसा कहता हूं तो लोग तुरंत पूछते हैं कि मैं काम पर कब लौट रहा हूं.”

पिछले हफ्ते मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले में इस परेशानी को बहुत साफ शब्दों में सामने रखा गया. एक डॉक्टर दंपती की शादी खत्म करने का फैसला सुनाते हुए जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस एम.डी. सुमति की पीठ ने कहा कि ‘होममेकर’ यानी घर संभालने वाला शब्द किसी एक लिंग तक सीमित नहीं है. अदालत ने कहा कि अगर घर संभालने वाली महिलाएं हो सकती हैं तो घर संभालने वाले पुरुष भी हो सकते हैं. अदालत ने कहा, “आइए, इसे एक नया सामान्य चलन बनाएं.”

यह मामला दो डॉक्टरों का है. पति कार्डियोलॉजी में आगे की पढ़ाई और डिग्रियां हासिल करने में जुटे हैं जबकि उनके दो बच्चों की परवरिश की ज्यादातर जिम्मेदारी पत्नी संभालती हैं. घर में उनके इस योगदान की आर्थिक अहमियत को मानते हुए पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति के करियर में आगे बढ़ने की राह काफी हद तक इस बात पर निर्भर हो सकती है कि उसका जीवनसाथी परिवार के लिए बिना वेतन वाला काम करने की जिम्मेदारी उठाता है या नहीं.

यह फैसला भारतीय परिवारों में मौजूद एक बड़े विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाता है. महिलाओं का नौकरी और दूसरे वेतन वाले कामों में हिस्सा बदल रहा है लेकिन घर के कामों की जिम्मेदारी अब भी काफी हद तक महिलाओं पर ही है. भारत के 2024 के टाइम यूज सर्वे के मुताबिक बिना वेतन के घरेलू काम करने वाली महिलाएं हर दिन औसतन 289 मिनट इन कामों में बिताती हैं, जबकि पुरुषों के लिए यह समय 88 मिनट है. बच्चों और परिवार के दूसरे सदस्यों की बिना वेतन देखभाल करने में भी महिलाएं पुरुषों के मुकाबले काफी ज्यादा समय देती हैं.

मुंबई की 41 साल की कॉरपोरेट वकील प्रियंका शाह (बदला हुआ नाम) की बेटी जब तीन साल की थी तब उनके पति का नौकरी छोड़कर घर संभालने का फैसला उनके अपने करियर के लिए मददगार साबित हुआ. वे बताती हैं कि रिश्तेदार अक्सर उनके पति को 'होममेकर' कहने के बजाय ऐसा व्यक्ति बताते हैं जो फिलहाल नौकरी की तलाश में है.

प्रियंका के मुताबिक, “कोई भी यह नहीं कहना चाहता कि वे जो कर रहे हैं वह भी काम है. मैं देर तक काम कर सकती हूं क्योंकि वे बच्चों को स्कूल छोड़ने और लाने, खाना बनाने, डॉक्टर के पास ले जाने और बाकी सभी कामों की जिम्मेदारी संभालते हैं.”

शब्दों का यह फर्क एक गहरी समस्या की ओर इशारा करता है. भारतीय समाज में आज भी पुरुष होने की पहचान को कमाने से जोड़कर देखा जाता है. ऐसे में सैलरीड नौकरी न करने वाले पुरुषों से सिर्फ पैसों को लेकर ही सवाल नहीं होते बल्कि उनकी हैसियत, महत्वाकांक्षा और परिवार में उनके अधिकार को लेकर भी सवाल उठते हैं.

शहरी भारत में घर पर रहकर बच्चों की देखभाल करने वाले पिताओं पर शोध करने वाले जानकार यह भी समझने की कोशिश करते हैं कि परिवार के कमाऊ सदस्य की पारंपरिक भूमिका से हटने पर पुरुष अपनी मर्दानगी को लेकर बनी सोच से कैसे निपटते हैं. पति-पत्नी आपस में यह तय कर सकते हैं कि ज्यादा कमाने वाले व्यक्ति को नौकरी जारी रखनी चाहिए लेकिन माता-पिता और रिश्तेदार इसके बावजूद घर पर रहने वाले पुरुष को बेरोजगार मान सकते हैं. वहीं परिवार का खर्च उठाने वाली महिला को तय सामाजिक व्यवस्था के उलट काम करने वाली नजर से देखा जा सकता है.

मद्रास हाई कोर्ट ने ‘हाउस हसबैंड’ की कोई नई कानूनी श्रेणी नहीं बनाई है. अदालत की ये टिप्पणियां शादी से जुड़े एक विवाद के दौरान आईं लेकिन उन्होंने उस सवाल को न्यायिक मान्यता दी जिसका सामना दो कमाने वाले सदस्यों वाले परिवार तेजी से कर रहे हैं: अगर महिलाएं बिना वेतन के घरेलू काम करती हैं तो उस काम को आर्थिक रूप से अहम माना जाता है. फिर जब यही काम कोई पुरुष करता है तो उसकी अहमियत क्यों खत्म हो जानी चाहिए?

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