
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में भारत के रत्न और आभूषण उद्योग से कहा कि लैब-ग्रोन डायमंड (LGD) का पूरा कारोबार भारत में ही विकसित करने की कोशिश की जाए. इसमें डायमंड बनाने वाली मशीनों से लेकर हीरों का उत्पादन, आभूषण बनाना, उनकी ब्रांडिंग और दुनिया भर में शोरूम तक पहुंचाना, सब कुछ भारत से किया जाए.
मुंबई में 52वें इंडिया जेम्स एंड ज्वैलरी अवॉर्ड्स में अमित शाह ने कहा कि आने वाले समय में लैब-ग्रोन डायमंड का कारोबार आज के डायमंड कारोबार से 50 गुना तक बड़ा हो सकता है. उन्होंने इसे भारत के लिए 'बहुत बड़ा मौका' बताया. उनके मुताबिक, इस मौके का फायदा उठाने के लिए भारत के पास जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर, क्षमता, पैसा और कारोबारी मौजूद हैं. उन्होंने बताया कि भारत करीब 6,000 साल से दूसरे देशों के साथ रत्नों का कारोबार करता आ रहा है.
लैब-ग्रोन डायमंड रासायनिक, भौतिक और दिखने में प्राकृतिक हीरों जैसे ही होते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि प्राकृतिक हीरे जमीन के अंदर से निकाले जाते हैं जबकि लैब-ग्रोन डायमंड मशीन में बनाए जाते हैं. लैब-ग्रोन डायमंड बनाने के दो तरीके हैं. पहला तरीका हाई-प्रेशर हाई-टेम्परेचर (HPHT) है. इसमें मशीन के अंदर धरती के भीतर जैसी तेज गर्मी और दबाव बनाया जाता है, जिससे कुछ हफ्तों में हीरे का क्रिस्टल तैयार हो जाता है.
दूसरा तरीका केमिकल वेपर डिपोजिशन (CVD) है. इसमें प्लाज्मा चैंबर के अंदर कार्बन वाली गैस की मदद से क्रिस्टल के ऊपर धीरे-धीरे कार्बन की परत जमा की जाती है, जिससे हीरा तैयार होता है.

भारत ने केमिकल वेपर डिपोजिशन तकनीक में अच्छी पकड़ बना ली है. देश में करीब 90 फीसदी लैब-ग्रोन डायमंड इसी तकनीक से तैयार होते हैं. इसकी वजह है कि हाई-प्रेशर हाई-टेम्परेचर तकनीक के मुकाबले केमिकल वेपर डिपोजिशन में कम खर्च आता है और बड़े पैमाने पर उत्पादन करना भी आसान है. उद्योग के अनुमान के मुताबिक, भारत में करीब 2,200 से 2,800 केमिकल वेपर डिपोजिशन मशीनें चल रही हैं. इनमें से ज्यादातर सूरत और मुंबई में हैं.
जेम्स एंड ज्वैलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के मुताबिक, अभी इस्तेमाल हो रही ज्यादातर हाई-प्रेशर हाई-टेम्परेचर मशीनें चीन से मंगाई जाती हैं. भारत में केमिकल वेपर डिपोजिशन मशीन बनाने वाली कंपनियां भी माइक्रोवेव जनरेटर, वैक्यूम पंप, सेंसर और अच्छी क्वालिटी के क्रिस्टल विदेशों से खरीदती हैं.
केंद्रीय बजट 2023 में लैब-ग्रोन डायमंड के लिए इस्तेमाल होने वाले क्रिस्टल पर कस्टम ड्यूटी खत्म कर दी गई थी. साथ ही IIT मद्रास को पांच साल के लिए 242 करोड़ रुपए की रिसर्च ग्रांट दी गई थी. इसका मकसद लैब-ग्रोन डायमंड के क्रिस्टल और इन्हें बनाने वाली मशीनें भारत में ही तैयार करना था.
IIT मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि ने इसे 'आत्मनिर्भर भारत' की दिशा में एक कदम बताया था लेकिन तीन साल बाद भी भारत की विदेश से सामान मंगाने पर निर्भरता कम नहीं हुई है. केमिकल वेपर डिपोजिशन के पुर्जे और क्रिस्टल अब भी विदेशों से मंगाए जा रहे हैं.
इसके अलावा, लैब-ग्रोन डायमंड का सीधा मुकाबला प्राकृतिक हीरा उद्योग से भी है. इस क्षेत्र में भी भारत दुनिया के प्रमुख देशों में है. दुनिया के हर 10 प्राकृतिक हीरों में से 9 की पॉलिशिंग सूरत में होती है. भारत का प्राकृतिक हीरा उद्योग करीब 30 लाख लोगों को सीधे या इससे जुड़े दूसरे कामों के जरिए रोजगार देता है. पुराने हीरा कारोबारी लैब-ग्रोन डायमंड के खिलाफ हैं. उनके विरोध की वजह से ज्वैलरी के कारोबार में लैब-ग्रोउन डायमंड का इस्तेमाल तेजी से नहीं बढ़ पाया है.
लैब-ग्रोन डायमंड हो या प्राकृतिक डायमंड, दोनों को पॉलिश करने का काम लगभग एक जैसा होता है. इसी वजह से हीरा कारोबार में पॉलिशिंग का काम करने वाले कई लोग अब लैब-ग्रोन डायमंड की भी पॉलिशिंग कर रहे हैं. इससे पुराने हीरा कारोबारियों को चिंता हो रही है. लैब-ग्रोन डायमंड की वजह से प्राकृतिक हीरे की मांग कुछ कम हुई है. रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका के टैरिफ को लेकर स्थिति साफ नहीं होने से भी हीरा कारोबार को नुकसान हुआ है.

भारत 2023 में दुनिया में लैब-ग्रोन डायमंड का सबसे बड़ा निर्यात करने वाला देश बन गया था. उस साल दुनिया भर के कुल लैब-ग्रोन डायमंड निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 28.6 फीसदी थी. लैब-ग्रोन डायमंड बनाने में चीन के बाद भारत दूसरे नंबर पर है और दुनिया में बनने वाले लैब-ग्रोन डायमंड में भारत की हिस्सेदारी 35 फीसदी है, जबकि रत्नों में इस्तेमाल होने वाले लैब-ग्रोन पत्थरों की 90 से 95 फीसदी प्रोसेसिंग सूरत में होती है.
थोक बाजार में लैब-ग्रोन डायमंड की कीमतें 2019 के बाद से करीब 90 फीसदी गिर गई हैं. वहीं, डी बीयर्स ने दक्षिण अफ्रीका की वेनेशिया खदान में अपना काम दो साल के लिए रोक दिया है. अनुमान है कि 2029 तक लैब-ग्रोन डायमंड दुनिया के हीरा बाजार का 16 फीसदी हिस्सा हासिल कर सकता है. 2024 में यह हिस्सा 12 फीसदी था.
आभूषणों के अलावा अब लैब-ग्रोन डायमंड का इस्तेमाल सेमीकंडक्टर में गर्मी कम करने वाले हीट सिंक, डायमंड वेफर, क्वांटम कंप्यूटिंग, मशीनों में इस्तेमाल होने वाले खास औजार और एयरोस्पेस के पुर्जे बनाने में भी हो रहा है. क्वांटम कंप्यूटिंग में हीरे के अंदर मौजूद नाइट्रोजन-वैकेंसी सेंटर का इस्तेमाल क्यूबिट बनाने में किया जा सकता है. क्यूबिट क्वांटम कंप्यूटर में जानकारी रखने का एक तरीका है. उद्योग में हीरे के इन नए इस्तेमाल को 'डायमंडट्रॉनिक्स' कहा जाता है.
अगस्त में भारत से पॉलिश किए गए लैब-ग्रोन डायमंड का एक्सपोर्ट पिछले साल के मुकाबले 28.45 फीसदी बढ़कर 12.51 करोड़ डॉलर हो गया. अप्रैल से अगस्त के बीच भी इसका एक्सपोर्ट 11.76 फीसदी बढ़ा और 53.36 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया. जेम्स एंड ज्वैलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के मुताबिक इस बढ़ोतरी की बड़ी वजह हांगकांग, इजरायल, थाईलैंड, रूस और कनाडा से बढ़ी मांग है.
रत्न और आभूषण का कुल कारोबार अगस्त में 3.14 फीसदी बढ़कर 2.30 अरब डॉलर हो गया. इसमें स्टडेड गोल्ड ज्वैलरी की विदेशों में बिक्री 51.22 फीसदी बढ़ने का बड़ा योगदान रहा. जेम्स एंड ज्वैलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन किरीट भंसाली कहते हैं, "हीरे की विदेशों में बिक्री बढ़ना दिखाता है कि भारत अब ज्यादा कीमत वाला सामान तैयार करने में तेजी से आगे बढ़ रहा है."
फिलहाल, सर्टिफिकेशन इंडस्ट्री का मानना है कि वह इस पूरी सप्लाई चेन में एक भरोसेमंद भूमिका निभा रही है. अमित शाह की बात पर इंटरनेशनल जेमोलॉजिकल इंस्टीट्यूट, इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO तेहमास्प प्रिंटर ने कहा कि लैब-ग्रोन डायमंड से जुड़ा पूरा काम भारत में ही होना चाहिए.
उन्होंने अमित शाह की इस सोच का समर्थन करते हुए कहा कि इतने बड़े कारोबार में लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए मजबूत व्यवस्था जरूरी है. उन्होंने बताया कि इंटरनेशनल जेमोलॉजिकल इंस्टीट्यूट इसी काम में मदद करता है और अब यह इंडस्ट्री सिर्फ कीमतों की बात करने के बजाय बड़े स्तर पर कारोबार को आगे बढ़ाने के तरीकों पर भी ध्यान दे रही है.

