दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में BJP की बढ़ती राजनीतिक मौजूदगी के बावजूद केरल में पार्टी इसे मजबूत चुनावी आधार में क्यों नहीं बदल पाई, यह सवाल 30 सितंबर को कोच्चि में हुए इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ में पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. के.एस. राधाकृष्णन से पूछा गया.
'फेथ वर्सस पॉलिटिक्स इन द साउथ' सत्र में शामिल राधाकृष्णन ने इस बात को खारिज कर दिया कि केरल में BJP के विरोध की वजह सिर्फ लोगों का पार्टी पर शक या राज्य की मजबूत वामपंथी सोच है. इसके बजाय उन्होंने कहा कि केरल का राजनीतिक इतिहास उदारवादी, वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति के एक 'झूठे नैरेटिव' से बना है.
राधाकृष्णन ने केरल के राजनीतिक बदलाव को देखने का एक अलग नजरिया पेश करते हुए कहा कि शुरुआती कम्युनिस्ट आंदोलन को हिंदू समाज के कुछ तबकों का समर्थन मिला था और बाद में उभरी राज्य की धर्मनिरपेक्ष छवि ने उन सामाजिक और राजनीतिक जड़ों को ढकने का काम किया
1957 का केरल विधानसभा चुनाव इस बात को समझने के लिए अहम था. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) ने 60 सीटें जीती थीं और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से ई.एम.एस. नंबूदरीपाद के नेतृत्व में केरल की पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार बनाई थी. राधाकृष्णन ने कहा कि इस इतिहास ने एक ऐसा राजनीतिक माहौल बनाया जिसमें बाद में BJP के लिए अपनी जगह बनाना मुश्किल रहा.
राधाकृष्णन ने माना कि BJP के सामने अब चुनौती सिर्फ वामपंथ तक सीमित नहीं है. उन्होंने कहा कि मुस्लिम और ईसाई मतदाताओं का कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के साथ एकजुट होना भी राज्य में BJP की सीमित चुनावी पहुंच की एक मुख्य वजह है.
केरल में ईसाई समुदायों को अपने साथ जोड़ने के लिए BJP ने कई बार कोशिश की है. जिनमें उनका 'स्नेह यात्रा' संपर्क अभियान भी शामिल है. राधाकृष्णन ने माना कि इसके बावजूद पार्टी इस जन-संपर्क को वोटों में बदलने के लिए लगातार संघर्ष कर रही है.
इसके बाद बातचीत BJP के लिए केरल के सबसे अहम राजनीतिक मुद्दों में से एक आस्था और सबरीमाला मंदिर पर पहुंची. 2018 में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद यह मुद्दा बड़ा विवाद बना, जिसमें हर उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी. इसके बाद BJP की अगुआई में लंबे समय तक आंदोलन चला था.
राधाकृष्णन ने कहा कि सबरीमाला पर पार्टी के रुख को मुख्य रूप से धार्मिक आजादी के मुद्दे के तौर पर समझा जाना चाहिए, न कि चुनावी रणनीति के तौर पर. उन्होंने BJP के उस विरोध का भी बचाव किया जिसे पार्टी जबरन धर्म परिवर्तन बताती है. साथ ही उन्होंने केरल में शिक्षा के क्षेत्र में ईसाई संस्थानों के योगदान को माना. हालांकि उन्होंने कहा कि केरल के परिवारों का अपने बच्चों को ईसाई संस्थानों द्वारा चलाए जाने वाले स्कूलों में भेजने में कोई विरोधाभास नहीं है.
राधाकृष्णन ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि श्री नारायण गुरु और चट्टम्पी स्वामीकल जैसे सामाजिक सुधारकों से प्रभावित केरल में BJP को एक रूढ़िवादी राजनीतिक ताकत के तौर पर देखा जाता है. दोनों सुधारकों ने जाति व्यवस्था और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई थी.
राधाकृष्णन ने भरोसे के साथ अपनी बात खत्म करते हुए कहा कि BJP आखिरकार केरल में सत्ता में आएगी. BJP राज्य में पहले ही एक ऐतिहासिक कामयाबी हासिल कर चुकी है. 2024 के लोकसभा चुनाव में सुरेश गोपी की त्रिशूर से जीत के साथ BJP ने पहली बार केरल में लोकसभा सीट जीती. वहीं, पूरे राज्य में पार्टी का वोट शेयर भी काफी बढ़ा.
सेशन की मुख्य बातें | डॉ. के.एस. राधाकृष्णन
- “अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यकों ने कांग्रेस की अगुआई वाले UDF को अपनी स्वाभाविक राजनीतिक सोच के तौर पर अपना लिया. हमें इन समूहों से वोट नहीं मिल रहे हैं. यह एक तथ्य है.”
- “यह (सबरीमाला) निश्चित तौर पर आस्था का मामला है. फिर सरकार इसमें दखल क्यों दे? आपकी आस्था में सरकार की क्या भूमिका है? आपके पास संविधान का अनुच्छेद 25 है. आपको अपनी अंतरात्मा के मुताबिक धर्म का पालन करने का पूरा अधिकार है. फिर सरकार को सबरीमाला मंदिर और हिंदू मंदिरों की धार्मिक परंपराओं में दखल क्यों देना चाहिए?”
- “ईसाई समुदाय ने शिक्षा के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया है लेकिन उस समय की राज्य सरकारों, खासकर राजाओं ने जमीन देकर उनकी मदद की थी और यह सिर्फ एकतरफा मामला नहीं था.”
- “लोगों की सोच में बदलाव हो सकता है. पिछले चुनाव में यही हुआ.”

