सात साल पहले भारत ने स्पेस सेक्टर में निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी के लिए सुधारों की शुरुआत की थी. इन सालों के दौरान देश में स्पेस स्टार्टअप्स की संख्या लगभग 400 तक पहुंच गई है.
बेंगलुरु के केप्लर एयरोस्पेस के संस्थापक और CEO नवनीत सिंह इस क्षेत्र में आए बड़े बदलाव को 'जमीन-आसमान का अंतर' बताते हैं. उन्होंने 'इंडिया टुडे कॉन्क्लेव मुंबई' में 'टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन: द न्यू स्पेस वॉरियर्स' चर्चा के दौरान कहा, “स्पेस सेक्टर में सुधार होने से पहले भी निजी क्षेत्र अंतरिक्ष कारोबार में शामिल था. लेकिन तब वे केवल वेंडर इकोसिस्टम में थे, ना कि ओनर इकोसिस्टम.अब वे ओनर इकोसिस्टम बनना शुरू हो गए हैं.”
चर्चा में शामिल दूसरे पैनलिस्ट, नोएडा के ओमनीप्रेजेंट रोबोट टेक्नोलॉजी के संस्थापक निदेशक और CEO आकाश सिन्हा ने कहा, “अब इस क्षेत्र में प्रवेश करना काफी आसान हो गया है और सरकार से फंडिंग की मदद भी मिलने लगी है. अनुदान के अलावा सरकार कॉन्ट्रैक्ट के साथ न्यूनतम ऑर्डर की मात्रा भी तय कर रही है. यानी आप टेक्नोलॉजी विकसित करते हैं और आपको ऑर्डर मिलने का भरोसा भी रहता है.” उनकी कंपनी ने चंद्रयान-3 मिशन के प्रज्ञान मून रोवर के लिए नेविगेशन सॉफ्टवेयर पर काम किया था.
इसके साथ ही निजी क्षेत्र से 'पेशेंट कैपिटल' यानी प्राइवेट सेक्टर से लंबे समय के लिए निवेश भी अब आसानी से आ रहा है. भारतीय निवेशक अब समझने लगे हैं कि स्पेस टेक्नोलॉजी एक अहम क्षेत्र है जिसमें परिणाम लंबे समय में मिलते हैं. हालांकि इस क्षेत्र की कुछ पुरानी अड़चनों को दूर करना अभी बाकी है.
जहां एक तरफ भारत का निजी क्षेत्र सब-सिस्टम (उप-प्रणालियां) बना रहा है वहीं देश को कलपुर्जों (कंपोनेंट्स) के निर्माण का पूरा तंत्र खड़ा करने की जरूरत है. सिंह ने कहा, "दौड़ने से पहले चलना और चलने से पहले रेंगना पड़ता है. हम अभी चलने वाले दौर में हैं. ऐसे में दौड़ने वाले स्तर तक पहुंचने में कुछ साल और लगेंगे."
सिंह का मानना है कि भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र को ऐसी तकनीकों पर ध्यान देना चाहिए जो अमेरिका और चीन से हमारे अंतर को कम कर सकें क्योंकि उनके पास हमसे ज्यादा अंतरिक्ष क्षमताएं हैं. उन्होंने कहा, “इसके लिए हमें एडवांस्ड टेक्नोलॉजीज, इंटरकनेक्टेड सैटेलाइट्स, ऑनबोर्ड कंप्यूटर सिस्टम और डिस्ट्रिब्यूटेड इंटेलिजेंस गैदरिंग सिस्टम (वितरित खुफिया जानकारी जुटाने वाली प्रणाली) पर ध्यान देना होगा. मेरे हिसाब से भविष्य इसी का है.” उनका स्टार्ट-अप ऑटोनॉमस स्वार्मिंग सैटेलाइट्स (स्वायत्त झुंड में काम करने वाले उपग्रह) पर काम कर रहा है.
सिन्हा के अनुसार, जरूरी तकनीक के लिए सरकार से और ज्यादा सहयोग तथा बड़े स्तर पर फंड की जरूरत है. उन्होंने कहा, "यह जरूरी है कि स्टार्टअप्स को इस तरह का सहयोग मिले. मुझे पूरा भरोसा है कि जब निजी क्षेत्र को सरकार की तरफ से ऐसा समर्थन मिलेगा तो वह भी उतनी ही बराबरी से आगे आएगा."
सत्र की मुख्य बातें :
नवनीत सिंह
- "अंतरिक्ष और रक्षा कारोबार से जुड़ने का यह बेहतरीन समय है और मुझे लगता है कि आगे चलकर यह और बेहतर होगा. यह तेजी से बढ़ता हुआ आर्थिक क्षेत्र है जिस पर हमें ध्यान देना ही होगा क्योंकि यह अब हमारी पसंद से ज्यादा जरूरत बन चुका है."
- "ISRO एक तरह से हमें सक्षम बनाने वाली संस्था है तो दूसरी तरफ गेटकीपर (नियंत्रक) भी है. कुछ चीजें ऐसी हैं जिन्हें सरकार अपने नियंत्रण में रखना चाहती है और और कुछ ऐसी हैं जो बाहर सौंपने के लिहाज से बहुत ज्यादा महंगी हैं."
- "मुझे बस और अधिक आर्डर चाहिए, अहम तकनीकों के लिए देश स्तर पर एक मजबूत प्रयास चाहिए और स्पेस टेक के मामले में ग्लोबल साउथ में भारत का दबदबा चाहिए. अगर हम ये तीन काम कर लें तो हमारा भविष्य शानदार होगा."
आकाश सिन्हा
- “हाल ही में, खासकर पिछले कुछ वर्षों में जो बदलाव आया है, वह यह है कि भारत की अपनी अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाएं बहुत बड़ी हो गई हैं अब सरकार और सेना में भी भारत को स्पेस टेक के क्षेत्र में अग्रणी बनाने के लिए गंभीरता से विचार हो रहा है."
- “हमें रक्षा मंत्रालय से एक अनुबंध मिला है जिसके तहत हम दुनिया की सबसे हाई-रिजॉल्यूशन और शायद सबसे सटीक 3D मैपिंग सैटेलाइट बना रहे हैं.”
- "सरकार स्टार्टअप्स का हाथ थामकर उन्हें आगे बढ़ाने का बहुत बढ़िया काम कर रही है लेकिन उन्हें लंबे समय तक सहारा देने और एक साफ रास्ता दिखाने की जरूरत है."

