किसानों के संगठन ने ऐसे मजबूत नियामक ढांचे की मांग की है, जिसके तहत दुनिया में कहीं भी प्रतिबंधित कीटनाशक भारत में अपने आप प्रतिबंधित हो जाएं
केंद्र सरकार ने काफी देरी के बाद कीटनाशक अधिनियम-1968 के तहत घातक हर्बिसाइड पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है. यह किसानों, खेतिहर मजदूर, ग्रामीण समुदायों और पर्यावरण के स्वास्थ्य की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.
पैराक्वाट दुनिया के सबसे खतरनाक हर्बिसाइड में से एक है. यानी ऐसा कैमिकल जिसका इस्तेमाल खरपतवार को नष्ट करने के लिए किया जाता है. इसकी थोड़ी मात्रा भी जानलेवा साबित हो सकती है. इससे होने वाले जहरीले असर का कोई इलाज नहीं है. यह पार्किंसन रोग और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी अन्य बीमारियों के बढ़ते खतरे से भी जुड़ा है.
अध्ययनों से पता चलता है कि पैराक्वाट विषाक्तता में मृत्यु दर 70 प्रतिशत तक हो सकती है. इसका मुख्य असर फेफड़ों और किडनी पर पड़ता है. इसमें पल्मोनरी फाइब्रोसिस (फेफड़ों में ऊतक का क्षतिग्रस्त होकर सख्त होना) सबसे आम है. इससे जन्मजात विकृतियों से लेकर सीखने और विकास संबंधी विकारों तक कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं.
पैराक्वाट डाइक्लोराइड 60 से ज्यादा देशों में प्रतिबंधित है. भारत में, जहां इसके कारण अनुमानित तौर पर कई हजार मौतें हो चुकी हैं, यह हर्बिसाइड अब तक आसानी से उपलब्ध रहा है और किसानों द्वारा आत्महत्या के लिए इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता रहा है.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने 2024 में कीटनाशकों से जुड़ी 34,000 से अधिक मौतें दर्ज कीं. इनमें कीटनाशक के सेवन से हुई 26,921 आत्महत्याएं और आकस्मिक विषाक्तता से हुई 7,821 मौतें शामिल थीं.
पैराक्वाट डाइक्लोराइड का इस्तेमाल चाय, कॉफी, रबर, फलों और कपास की खेती के साथ-साथ गैर-कृषि या औद्योगिक वनस्पति प्रबंधन में बड़े पैमाने पर किया जाता है. पॉलिसी एक्सपर्ट डॉ. डोंथी नरसिम्हा रेड्डी के मुताबिक, आधिकारिक तौर पर इसे केवल नौ फसलों में इस्तेमाल की अनुमति है, लेकिन मूंग जैसी दूसरी फसलों में भी इसका अनधिकृत रूप से इस्तेमाल किए जाने की जानकारी है.
विशेषज्ञों के मुताबिक, केंद्र का पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर प्रतिबंध तब तक पर्याप्त नहीं होगा, जब तक इसे प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जाता. किसान संगठन आशा किसान स्वराज की सह-संयोजक कविता कुरुगंती का कहना है कि प्रतिबंध का स्वागत है लेकिन भारत को मजबूत प्रावधानों और सुरक्षा उपायों वाले मजबूत कीटनाशक प्रबंधन कानून की जरूरत है.
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर पहले भी प्रतिबंध लगाया जा चुका है लेकिन कीटनाशक उद्योग के दबाव के कारण उस आदेश को पलट दिया गया था. उद्योग के अनुमान के मुताबिक भारत में पैराक्वाट डाइक्लोराइड का बाजार सालाना करीब 1,500 करोड़ रुपए का है.
मौजूदा कानून के तहत कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार केंद्र के पास है जबकि कृषि और खेती राज्य के विषय हैं.
कुरुगंती का कहना है कि अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य, जनकल्याण और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को उद्योग के हितों पर प्राथमिकता दी जाए. उनका सुझाव है कि घातक कीटनाशकों से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए भारत में ऐसा नियामक ढांचा होना चाहिए, जिसके तहत कहीं और प्रतिबंधित किए गए कीटनाशक देश में अपने आप प्रतिबंधित हो जाएं.
वे यह भी कहती है कि पाबंदी के अलावा सभी रजिस्टर्ड कीटनाशकों की नियमित और समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य सरकारों को अपनी कृषि नीतियों के अनुरूप कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार होना चाहिए.

