
भारत की महंगाई की कहानी के केंद्र में एक दिलचस्प विरोधाभास है. वैश्विक तेल संकट गहराता जा रहा है लेकिन सरकारी तेल कंपनियों के पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल और डीजल की कीमतें पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के बाद से केवल करीब 3 रुपए प्रति लीटर बढ़ी हैं.
इस संकट का स्वरूप भी बदल गया है. कच्चे तेल की कीमत करीब आधी बढ़ चुकी है. फरवरी के अंत में युद्ध शुरू होने से पहले ब्रेंट क्रूड करीब 70-75 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था. सितंबर की शुरुआत में वायदा कीमतें युद्ध से पहले के स्तर से करीब 45 फीसदी ऊपर थीं और भारत के लिए कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 109 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई थी.
डीजल की कीमत लगभग दोगुनी हो गई है. सितंबर की शुरुआत में अमेरिका में डीजल की कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई जो युद्ध से पहले के स्तर से 94 फीसदी अधिक थी. एशिया और यूरोप में भी कीमतें इससे ज्यादा पीछे नहीं थीं.
एशिया में डीजल के रिफाइनिंग मार्जिन यानी कच्चे तेल की लागत से ऊपर रिफाइनर को मिलने वाला मुनाफा, युद्ध से पहले करीब 22 डॉलर प्रति बैरल था. अब यह बढ़कर रिकॉर्ड 87 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया है.
पेट्रोल का बाजार अपेक्षाकृत शांत रहा है. रेटिंग और रिसर्च एजेंसी आईसीआरए (ICRA) के मुताबिक भारत में पेट्रोल की पंप कीमत और आयात लागत के बीच का अंतर करीब 5 रुपए प्रति लीटर है जबकि डीजल में यह अंतर 23 रुपए है.

अब यह संकट सिर्फ कच्चे तेल का नहीं बल्कि रिफाइनिंग का भी हो गया है. इससे खाड़ी क्षेत्र से तेल के निर्यात के दोनों रास्तों पर दबाव बढ़ गया है. होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के बाद सऊदी अरब ने लाल सागर के रास्ते यनबू से अपना निर्यात शुरू किया. जुलाई से यमन के हूती वहां सऊदी जहाजों की आवाजाही पर घोषित नाकाबंदी लागू कर रहे हैं. वे टैंकरों पर मिसाइलें दाग रहे हैं और सऊदी की एक रिफाइनरी को भी निशाना बना चुके हैं.
अगस्त में यानबू से होने वाला निर्यात करीब आधा रह गया. दूसरी ओर यूक्रेन के ड्रोन हमलों ने रूस के ईंधन निर्यात को लगभग ठप कर दिया है और मॉस्को ने डीजल निर्यात पर लगी रोक को अक्टूबर के अंत तक बढ़ा दिया है.
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुमान के मुताबिक, युद्ध से पहले दुनिया के समुद्री डीजल व्यापार में करीब आधी हिस्सेदारी रखने वाले खाड़ी देशों और रूस से अगस्त में डीजल निर्यात फरवरी के मुकाबले 16 लाख बैरल प्रतिदिन कम रहा. यह लगभग उतना ही डीजल है जितना भारत एक दिन में इस्तेमाल करता है.
कोविड महामारी के दौरान रिफाइनरियां बंद होने के बाद वैश्विक रिफाइनिंग क्षमता पहले ही दबाव में थी. अब सर्दियों में हीटिंग और खेती की मांग बढ़ने के समय डीजल का भंडार मौसमी स्तर पर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है.
भारत के लिए यह इसलिए अहम है क्योंकि डीजल अर्थव्यवस्था का सबसे अहम ईंधन है. इससे ट्रक, ट्रैक्टर, सिंचाई पंप और जनरेटर चलते हैं. पेट्रोल पंप पर कीमतें स्थिर रखने की सबसे ज्यादा कीमत भी इसी ईंधन के मामले में चुकानी पड़ रही है.
उपभोक्ता के लिए यह संकट पंप पर लगभग दिखाई नहीं देता. लेकिन अर्थव्यवस्था के लिए ऐसा नहीं है. पड़ोसी देशों में उपभोक्ता भी इसका असर सीधे देख रहे हैं. पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में ईंधन की राशनिंग हो रही है या पेट्रोल पंप खाली होने की खबरें हैं.
श्रीलंका ने QR कोड वाले ईंधन पास फिर शुरू कर दिए हैं जिनसे हर सप्ताह खरीदे जा सकने वाले ईंधन की मात्रा तय होती है.
साथ ही यह पता लगाने का समय तेजी से खत्म हो रहा है कि भारत कितने समय तक इस झटके से खुद को अलग रख सकता है. 7 अक्टूबर को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) तेल संकट के दोबारा गहराने के बाद अपना पहला फैसला सुना सकती है.

9 सितंबर को ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया था. MPC के सामने सवाल यह होगा: क्या यह संकट अभी भी सीमित है या इसका असर दूसरी चीजों पर भी पड़ने लगा है?
ICRA का अनुमान है कि सितंबर में अब तक औसत कीमतों के आधार पर तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को डीजल पर करीब 23 रुपए प्रति लीटर, पेट्रोल पर 5 रुपए प्रति लीटर और हर घरेलू LPG सिलेंडर पर 200 रुपए का नुकसान हो रहा है.
भारत रोजाना करीब 28 करोड़ लीटर डीजल इस्तेमाल करता है. इस मात्रा के हिसाब से डीजल की कीमत में यह अंतर करीब 650 करोड़ रुपए प्रतिदिन या एक पखवाड़े में 9,000 करोड़ रुपए से अधिक के जोखिम के बराबर है.
यह रोज होने वाला लेखा-जोखा नुकसान नहीं है. रिफाइनिंग से होने वाला मुनाफा इसका कुछ हिस्सा पूरा करता है और अंतरराष्ट्रीय कीमतें भी पूरे समय आज के स्तर पर नहीं रही हैं. यह उस झटके का पैमाना है जिसे व्यवस्था के किसी न किसी हिस्से में सोखा जा रहा है. अब यह भार बढ़ते हुए सिर्फ सरकारी क्षेत्र पर आ रहा है.
पहला बचाव मोर्चा
IOC, BPCL और HPCL ने इसका भार उठाया है. इन कंपनियों का एकीकृत कारोबारी मॉडल इसे संभव बनाता है. जब कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ती हैं तो रिफाइनिंग मार्जिन ईंधन की बिक्री पर होने वाले नुकसान की कुछ भरपाई कर सकते हैं.
पहली तिमाही में इसकी सीमाएं सामने आ गईं. असाधारण रूप से ऊंचे रिफाइनिंग मार्जिन के बावजूद HPCL को 11,526 करोड़ रुपए, BPCL को 3,962 करोड़ रुपए और IOC को 2,661 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ.
इसकी वजह पंप की कीमतों को स्थिर रखना और LPG पर बढ़ता नुकसान था. जून के अंत में कच्चे तेल की कीमतें कम होने पर ब्रोकरेज कंपनियों को दूसरी तिमाही में सुधार की उम्मीद थी. सितंबर में कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने उस सुधार पर सवाल खड़ा कर दिया है.
भारत ने चार साल पहले भी ऐसा प्रयोग किया था. 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद इन तीनों कंपनियों ने रिकॉर्ड सात महीने तक पंप की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया. वित्त वर्ष 2022-23 की पहली छमाही में उन्हें 21,201 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ और सरकार ने पुराने LPG नुकसान की भरपाई के लिए एकमुश्त 22,000 करोड़ रुपए का अनुदान दिया. आखिरकार यह रणनीति काम कर गई क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें गिर गईं और ईंधन की बिक्री से होने वाला मार्जिन सुधर गया.

इस बार हिसाब अलग है. 2022 में समस्या मुख्य रूप से कच्चे तेल की थी. 2026 में समस्या तेजी से डीजल के रिफाइनिंग मार्जिन और खाड़ी से रिफाइंड ईंधन बाहर ले जाने वाले रास्तों से जुड़ती जा रही है.
युद्धविराम की खबर आते ही कच्चे तेल की कीमत गिर सकती है. लेकिन रिफाइनिंग क्षमता और जहाजों के रास्तों को एक तिमाही में बहाल नहीं किया जा सकता. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन का अनुमान है कि खाड़ी क्षेत्र में ज्यादातर उत्पादन और व्यापारिक गतिविधियां युद्ध से पहले के स्तर पर 2027 की दूसरी तिमाही तक ही लौटेंगी.
संकट खत्म होने का इंतजार करना इस उम्मीद पर दांव लगाना है कि जो रणनीति एक बार अलग तरह के संकट में काम कर गई थी, वह इस बार भी काम करेगी.
निजी क्षेत्र की थकान
निजी क्षेत्र की खुदरा कंपनियों के सामने भी यही लागत थी लेकिन उन्होंने अलग रास्ता चुना. नायरा एनर्जी ने मार्च में पेट्रोल की कीमत 5 रुपए और डीजल की कीमत 3 रुपए प्रति लीटर बढ़ा दी. शेल ने इससे भी ज्यादा बढ़ोतरी की और बेंगलुरु में डीजल की कीमत 25 रुपए प्रति लीटर से अधिक बढ़ा दी.
ग्राहकों ने अपेक्षित प्रतिक्रिया दी. अप्रैल में नायरा की पेट्रोल बिक्री 30 फीसदी और डीजल बिक्री 46 फीसदी गिर गई. शेल की डीजल बिक्री 77 फीसदी गिर गई. सरकारी तेल कंपनियों के पंपों पर बिक्री करीब 9 फीसदी बढ़ गई. रिलायंस की जियो-बीपी ने सरकारी कंपनियों के बराबर कीमतें रखीं और उसकी बाजार हिस्सेदारी बढ़ गई.
औद्योगिक ग्राहकों के लिए भी कीमतें बाजार से जुड़ी हुई हैं. सरकारी तेल कंपनियों ने मार्च में थोक डीजल की कीमत करीब 22 रुपए प्रति लीटर बढ़ा दी. खबरों के मुताबिक थोक खरीदार अब खुदरा पंपों का रुख कर रहे हैं जहां ईंधन सस्ता है.

इसका नतीजा यह है कि सब्सिडी का भार कुछ कंपनियों पर सिमट रहा है. निजी पंप या थोक अनुबंध से सरकारी तेल कंपनी के खुदरा पंप पर जाने वाला हर लीटर ऐसा ईंधन है, जिसे सरकारी कंपनी लागत से कम कीमत पर बेच रही है.
कीमतों पर रोक उपभोक्ताओं को राहत देती है लेकिन इससे बिक्री और नुकसान दोनों IOC, BPCL और HPCL के हिस्से में आ रहे हैं.
राष्ट्रवादी अर्थशास्त्र
सरकार ने तेल विपणन कंपनियों को पूरी तरह अकेला नहीं छोड़ा है. मार्च में उसने पेट्रोल पर विशेष उत्पाद शुल्क घटाकर 3 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर शून्य कर दिया. एमके ग्लोबल के अनुमान के मुताबिक इससे सरकार को सालाना करीब 1.55 लाख करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान हो सकता है.
साथ ही सरकार ने ईंधन निर्यात पर विंडफाल टैक्स फिर से लागू किया जिसकी दर हर पखवाड़े बदली जाती है. अप्रैल में डीजल पर यह कर 55.5 रुपए प्रति लीटर तक पहुंच गया था और 16 सितंबर को किए गए संशोधन के बाद यह 20 रुपए था.
इसका तर्क संसाधनों के पुनर्वितरण का है. विदेशों में अप्रत्याशित मुनाफा कमाने वाले रिफाइनर उसका कुछ हिस्सा सरकार को देते हैं. सरकार घरेलू स्तर पर उत्पाद शुल्क से होने वाला राजस्व छोड़ती है और सरकारी तेल कंपनियां बाकी भार उठाती हैं. यह उस एक आंकड़े यानी पंप की कीमत को स्थिर रखने की एक जटिल व्यवस्था है.
लेकिन इस समायोजन से लागत खत्म नहीं होती. वह तेल विपणन कंपनियों के मार्जिन, सरकारी राजस्व, आयात बिल और माल ढुलाई तथा उत्पादन लागत में चली जाती है. आखिरकार इसका असर व्यापक महंगाई में भी दिखाई दे सकता है. अगस्त के आंकड़े बताते हैं कि ऐसा कुछ असर पहले ही दिखने लगा है.
बचाव कब तक टिकेगा
उपभोक्ता महंगाई अगस्त में बढ़कर 4.82 फीसदी हो गई जो जुलाई में 4.45 फीसदी थी. इसमें एक अहम आंकड़ा छिपा है: माल परिवहन सेवाओं की महंगाई 14 फीसदी से ऊपर पहुंच गई, जबकि पंप की कीमतें मई के बाद से नहीं बदली हैं. ट्रांसपोर्टर और लॉजिस्टिक्स कंपनियां बढ़ी हुई लागत का भार आगे ग्राहकों पर डाल रही हैं, जिसका असर अभी वाहन चलाने वालों को दिखाई नहीं दे रहा है.
थोक कीमतों के आंकड़े इसे और स्पष्ट करते हैं. थोक मूल्य सूचकांक (WPI) की महंगाई 9.92 फीसदी तक पहुंच गई. ईंधन और बिजली की महंगाई 22.93 फीसदी रही जबकि खनिज तेलों की कीमतें 38 फीसदी से ज्यादा बढ़ीं. बाजार से जुड़ी कीमतों पर ईंधन खरीदने वाले औद्योगिक ग्राहक पहले ही इस झटके को झेल रहे हैं.

एचडीएफसी बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री साक्षी गुप्ता के अनुमान के मुताबिक खाद्य और ईंधन को अलग रखने वाली मूल महंगाई करीब 4.2 फीसदी तक पहुंच गई है जो 3.86 फीसदी थी. इसमें कुछ बढ़ोतरी सोने और चांदी की कीमतों की वजह से है, न कि तेल की वजह से. इसलिए यह बढ़ोतरी फिलहाल नजर रखने वाला संकेत है, पुख्ता सबूत नहीं. खाद्य महंगाई 5.95 फीसदी है जो मुख्य रूप से मौसम से जुड़ी है, लेकिन यह दबाव को और बढ़ा रही है.
एक कम दिखाई देने वाला असर भी है. दूसरे देशों में पंप की कीमतें बढ़ने पर लोग कम गाड़ी चलाते हैं और कंपनियां ईंधन की खपत घटाती हैं. भारत में कीमतों पर लगी रोक इस संकेत को खत्म कर देती है.
अप्रैल-जुलाई में कच्चे तेल के आयात की मात्रा पिछले साल की समान अवधि के लगभग बराबर रही. यह 8.19 करोड़ टन थी. लेकिन आयात बिल 56.5 फीसदी बढ़कर 63.4 अरब डॉलर हो गया.
मोतीलाल ओसवाल का अनुमान है कि अगर साल की दूसरी छमाही में कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक 90 डॉलर से ऊपर रहती है तो चालू खाते का घाटा जीडीपी के 1.7 फीसदी यानी करीब 71 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है.
इसका असर रुपए पर पड़ता है. तेल की कीमत बढ़ने का मतलब है डॉलर की ज्यादा मांग और रुपए का कमजोर होना. कमजोर रुपया हर आयातित बैरल की रुपए में लागत बढ़ा देता है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व की पिछले सप्ताह की दर वृद्धि से अमेरिकी और भारतीय ब्याज दरों के बीच अंतर बढ़ता है और इस दबाव में और इजाफा होता है.
रिजर्व बैंक (RBI) रुपए में गिरावट को नियंत्रित करने के लिए दखल दे रहा है लेकिन वह इस गणित को रोक नहीं सकता. पंप की कीमत को नियंत्रित किया जा सकता है. पूरी अर्थव्यवस्था को नहीं.
RBI की मुश्किल
3-5 अगस्त की बैठक में एमपीसी ने रेपो रेट 5.25 फीसदी पर बरकरार रखा और अपना रुख तटस्थ रखा. उसने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए महंगाई का अनुमान घटाकर 5 फीसदी कर दिया और विकास दर का अनुमान बढ़ाकर 6.7 फीसदी कर दिया. लेकिन उसने यह भी अनुमान लगाया कि अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में महंगाई 5.9 फीसदी के शिखर पर पहुंच सकती है.
बैठक के विवरण का रुख फैसले की तुलना में ज्यादा सख्त था. RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि अगर आपूर्ति का यह झटका व्यापक होने लगे, महंगाई की उम्मीदों को अस्थिर करे या लंबे समय तक बना रहे तो मौद्रिक नीति को प्रतिक्रिया देनी होगी. उनका कहना था, "इन जोखिमों के वास्तविक रूप लेने के किसी भी सबूत पर मौद्रिक नीति को सख्त करना जरूरी हो सकता है."
RBI की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने कहा कि साल के दौरान ब्याज दर बढ़ाने की जरूरत सामने आ सकती है. इसके बाद RBI ने अतिरिक्त नकदी को कम करने के लिए बॉन्ड बेचने की घोषणा की.
दुनिया तेजी से आगे बढ़ी है. पिछले दो हफ्तों में अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने 2023 के बाद पहली बार ब्याज दरें बढ़ाईं. यूरोपीय सेंट्रल बैंक ने इस साल दूसरी बार दर बढ़ाई और बैंक ऑफ जापान ने अपनी नीतिगत दर को 31 साल के उच्च स्तर पर पहुंचा दिया. इन सभी ने एक ही ऊर्जा संकट के जवाब में यह कदम उठाया.
भारत के करीब, बैंक इंडोनेशिया और फिलीपींस के केंद्रीय बैंक युद्ध शुरू होने के बाद से अपनी मुद्राओं को संभालने के लिए ब्याज दरें बढ़ा रहे हैं. बैंक ऑफ इंग्लैंड ने दरें नहीं बढ़ाईं लेकिन उसके नौ में से तीन सदस्यों ने बढ़ोतरी के पक्ष में मतदान किया. बैंक ने चेतावनी दी कि लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष और महंगाई के दूसरे दौर के बढ़ते जोखिम उसे दरें बढ़ाने के लिए मजबूर कर सकते हैं. यह लगभग वही भाषा है जो मल्होत्रा के बैठक विवरण में दिखाई दी.

भारत तेजी से एक अलग स्थिति में खड़ा दिख रहा है और उसके पास इसके लिए दूसरों की तुलना में कम वजह है. बैंक ऑफ इंग्लैंड कमजोर होते श्रम बाजार के बीच दरों को स्थिर रख रहा है और फिलीपींस ने निवेश में गिरावट के बीच दरें बढ़ाई हैं.
भारत की अर्थव्यवस्था अप्रैल-जून तिमाही में 7.8 फीसदी बढ़ी है और मॉर्गन स्टेनली तथा सिटी ने पूरे साल की विकास दर के अपने अनुमान बढ़ाकर 7.3 फीसदी कर दिए हैं. अभी दर बढ़ाने से रुकता है तो इसकी वजह अर्थव्यवस्था की कमजोर विकास दर नहीं होगी.
फिर भी इंतजार करने के पक्ष में एक गंभीर तर्क है. ब्याज दर बढ़ाने से डीजल की कीमत कम नहीं होगी. इसकी कीमत हजारों किलोमीटर दूर रिफाइनरी में रुकावटों और मिसाइल हमलों से तय हो रही है.
RBI के अगस्त के अपने आकलन में कहा गया था कि व्यापक स्तर पर कीमतों का दबाव अभी सीमित है. यूरोप में भी यूरोपीय सेंट्रल बैंक के नीति-निर्माताओं का कहना है कि उन्हें अभी महंगाई के दूसरे दौर के स्पष्ट असर दिखाई नहीं दे रहे हैं.
होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते जहाजों की आवाजाही बहाल करने के लिए ईरान और ओमान के बीच जिस समझौते पर चर्चा हुई थी और जिसे पिछले सप्ताह ही टाल दिया गया था, उससे कच्चे तेल की कीमत तेजी से नीचे आ सकती है. अगर आपूर्ति संकट उसके बाद खत्म हो जाता है तो ऐसे समय में ब्याज दर बढ़ाना महंगा फैसला साबित हो सकता है.
इसी वजह से 7 अक्टूबर की एमपीसी बैठक महज एक नियमित समीक्षा नहीं है. अगस्त में महंगाई का आंकड़ा मोटे तौर पर RBI के अनुमान के अनुरूप है लेकिन पिछली बैठक के बाद से महंगाई की संरचना और तेल बाजार दोनों बदल गए हैं.
ICRA की अदिति नायर का अनुमान है कि अगर महंगाई का दबाव व्यापक होता है और कच्चे तेल की कीमत ऊंची बनी रहती है तो दिसंबर में दर बढ़ाई जा सकती है और यह बढ़ोतरी अक्टूबर में भी हो सकती है.
साक्षी गुप्ता को उम्मीद है कि RBI दरें स्थिर रखेगा और इंतजार करेगा. दोनों ही स्थितियों में समिति को ऐसे ईंधन की कीमत को ध्यान में रखते हुए दर तय करनी होगी जिस पर उसका नियंत्रण नहीं है. साथ ही सितंबर की महंगाई के आंकड़े भी उसके पास नहीं होंगे क्योंकि वे अगले सप्ताह आएंगे.
फिसलन भरी राह
आसान उपाय अपनाए जा चुके हैं. डीजल पर विशेष उत्पाद शुल्क पहले ही शून्य है, पंप की कीमतें एक बार बढ़ाई जा चुकी हैं और निर्यात पर अप्रत्याशित लाभ कर एक तय फॉर्मूले के आधार पर निर्धारित होता है.
अब जो विकल्प बचे हैं, वे मुश्किल हैं: सरकारी तेल कंपनियों को और ज्यादा नुकसान उठाने दिया जाए, खुदरा कीमतें फिर बढ़ाई जाएं या कहीं और से राजकोषीय मदद जुटाई जाए.
हर विकल्प की अपनी कीमत है. ज्यादा नुकसान उठाने का मतलब उन तीन सरकारी कंपनियों की बैलेंस शीट पर पहले से बढ़ रहे नुकसान को और बढ़ाना होगा. राजकोषीय मदद ऐसे बजट पर दबाव डालेगी जो पहले ही उत्पाद शुल्क से होने वाला राजस्व छोड़ चुका है.
खुदरा कीमतें बढ़ाने से तेल विपणन कंपनियों के मार्जिन में सुधार होगा लेकिन इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा. और अगर महंगाई पहले ही व्यापक हो रही है तो मौद्रिक नीति के नजरिए से यह विकल्प काफी ज्यादा महंगा हो जाएगा.
ईंधन की कीमतों पर रोक लगाकर सरकार ने फिलहाल इस संकट को टाल रखा है. 7 अक्टूबर को RBI संकेत देगा कि इसमें से कितना समय बाकी है. अगर संकट IOC, BPCL और HPCL की बैलेंस शीट तक सीमित रहता है तो यह तेल कंपनियों की समस्या है.
अगर इसका असर परिवहन, विनिर्माण, सेवाओं और घरेलू बजट तक पहुंचता है तो यह महंगाई की समस्या बन जाती है. और तब यह एमपीसी की समस्या बन जाएगी.

