
मध्य पूर्व में फिर से तनाव बढ़ गया है. ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट के पास 10 जहाजों पर हमला किया है. इससे पहले अमेरिका ने कहा था कि उसने ओमान की खाड़ी और खार्ग द्वीप के पास ईरान के कच्चे तेल से भरे पांच जहाजों पर बम गिराए थे. अमेरिका ने यह हमला तब किया, जब ईरानी सेना ने अमेरिका के एक युद्धपोत पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागी थीं.
इन नए हमलों से एक बार फिर दुनिया के कच्चे तेल के बाजार में चिंता बढ़ गई है. लंदन या न्यूयॉर्क में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है. भारत में कच्चे तेल का बास्केट भी 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया है. इसमें भारत की सरकारी रिफाइनरियों की ओर से कच्चे तेल के लिए चुकाई जाने वाली असल कीमत शामिल होती है, यानी वह कीमत जिस पर तेल खरीदा जाता है या भारत तक पहुंचता है.
इसमें मौके के हिसाब से बढ़ी हुई कीमत और क्षेत्र में जहाज से तेल लाने का खर्च भी शामिल होता है. केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल की ओर से साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, 10 सितंबर को इसकी कीमत 116 डॉलर प्रति बैरल थी.
इसका भारत पर बड़ा असर पड़ सकता है क्योंकि देश अपनी जरूरत का करीब 88 फीसदी कच्चा तेल दूसरे देशों से खरीदता है. वित्त वर्ष 2026 में भारत ने करीब 134.7 अरब डॉलर का कच्चा पेट्रोलियम आयात किया था. अगर लंबे समय तक तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं तो भारत का चालू खाता घाटा बढ़ सकता है और पहले से बढ़ रही महंगाई और बढ़ सकती है.

ईंधन की कीमत बढ़ने से तेल कंपनियों पर भी आर्थिक दबाव बढ़ता है. ऐसे में सरकार को ज्यादा सब्सिडी देनी पड़ सकती है, जिससे सरकारी खर्च बढ़ेगा और सरकार के बजट पर दबाव पड़ेगा.
भारत में कच्चे तेल की कीमत का यह पैमाना देश के लिए तेल आयात करने में आने वाली लागत समझने के लिए अहम है. इसमें दो तरह के कच्चे तेल शामिल होते हैं. एक ज्यादा सल्फर वाला सॉर कच्चा तेल और दूसरा कम सल्फर वाला स्वीट कच्चा तेल. सॉर कच्चे तेल की कीमत ओमान और दुबई ग्रेड की औसत कीमत के आधार पर तय होती है जबकि स्वीट कच्चे तेल की कीमत ब्रेंट डेटेड के आधार पर तय होती है. इसमें दोनों तरह के तेल का अनुपात भी करीब वही रखा जाता है, जितना भारत की रिफाइनरियां इस्तेमाल करती हैं. इसमें करीब 78.7 फीसदी सॉर ग्रेड और 21.3 फीसदी स्वीट ग्रेड होता है.
इस बीच 10 सितंबर को ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 105.6 डॉलर प्रति बैरल थी. वहीं अमेरिका के तेल बाजार में इस्तेमाल होने वाले वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट (WTI) कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल रही.
ICRA के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और कॉरपोरेट रेटिंग्स के को-ग्रुप हेड प्रशांत वशिष्ठ बताते हैं, "ईरान और अमेरिका के बीच फिर से शुरू हुई दुश्मनी से होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते आने वाली कम कच्चे तेल की सप्लाई पर असर पड़ सकता है. इसके अलावा, ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट से आगे एक नया सीमित समुद्री क्षेत्र बनाने की धमकी दी है. ऐसे में स्ट्रेट के आगे से आने वाली ऊर्जा की सप्लाई भी खतरे में पड़ सकती है."
उन्होंने बताया कि इन घटनाओं के बाद पिछले कुछ दिनों में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं और भारत में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है. प्रशांत वशिष्ठ के मुताबिक, "कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से पेट्रोल-डीजल जैसे ईंधन बेचने वाली कंपनियों का मार्जिन निगेटिव हो सकता है. घरेलू LPG में अभी करीब 200 रुपए प्रति सिलेंडर की अंडर-रिकवरी भी बढ़ सकती है."
अंडर-रिकवरी उस नुकसान को कहा जाता है जो सरकारी ईंधन कंपनियों को तब होता है, जब उन्हें घरेलू LPG और डीजल जैसे उत्पाद अपनी असल आयात लागत से कम कीमत पर बेचने पड़ते हैं. बाद में सरकार नकद मदद या सब्सिडी देकर इस नुकसान की भरपाई करती है. कुछ हिस्सा खुदरा ईंधन की कीमतों में बदलाव करके भी पूरा किया जाता है.
जुलाई में भारत ने जितना कुल कच्चा तेल आयात किया, उसमें रूस से आया तेल आधे से ज्यादा था. जुलाई में रूस से भारत का तेल आयात एक साल पहले के मुकाबले 62.4 फीसदी बढ़ा. हालांकि यह जून 2026 के रिकॉर्ड 26 लाख बैरल प्रति दिन के आंकड़े से 4.8 फीसदी कम रहा.
होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते आना-जाना रुकने के बाद भारत ने कच्चे तेल के आयात के लिए रूस पर काफी ज्यादा भरोसा किया है. वित्त वर्ष 2025 में भारत के करीब 54 फीसदी गैस आयात और 45 फीसदी तेल आयात की सप्लाई होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते हुई थी.

