
भारत के बिजली क्षेत्र को साझा डिजिटल व्यवस्था से जोड़ने की योजना अब आगे बढ़ रही है. 29 अक्टूबर को इस दिशा में एक अहम कदम उठाया गया. इस दिन इंडिया एनर्जी स्टैक (IES) की निगरानी करने वाले टास्क फोर्स ने नई दिल्ली में अपनी अंतिम रिपोर्ट की समीक्षा की और इसे देशभर में लागू करने का रास्ता तय किया. इंडिया एनर्जी स्टैक बिजली क्षेत्र के लिए सरकार की अगुवाई में तैयार किया जा रहा डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा (DPI) है.
अगला पड़ाव भी तय हो चुका है. 26 अक्टूबर को जारी एक निविदा में ऐसी सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट एजेंसी चुनने की मांग की गई है जो 730 दिनों तक इस प्लेटफॉर्म का डिजाइन तैयार करे, उसे विकसित करे और तकनीकी सहायता दे. इसके लिए 7 नवंबर तक बोलियां जमा करनी हैं. इस कदम के साथ ही यह पहल साझा मानक तय करने के चरण से आगे बढ़कर उन्हें लागू करने के लिए जरूरी प्रणालियां तैयार करने की दिशा में बढ़ रही है.
हालांकि तय समयसीमा पहले ही आगे खिसक चुकी है. नोडल एजेंसी आरईसी लिमिटेड ने पहले इस परियोजना को जुलाई 2026 तक पूरा करने की बात कही थी. देशभर में इसे लागू करना अभी बाकी है. इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत की अलग-अलग बिजली कंपनियां इस ढांचे को अपनाती हैं या नहीं.
इस पहल का मकसद बिजली क्षेत्र में वही बदलाव लाना है जो डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में एकीकृत भुगतान इंटरफेस (UPI) ने किया. जून 2025 में टास्क फोर्स के गठन की घोषणा करते हुए केंद्रीय विद्युत मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा था कि यह व्यवस्था बिजली क्षेत्र में "वही काम करेगी, जो पहचान के क्षेत्र में आधार और डिजिटल भुगतान में UPI ने किया है".
व्यावहारिक रूप से इसका मतलब है कि अलग-अलग संस्थाएं एक साझा डिजिटल व्यवस्था के जरिए लेन-देन और सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकेंगी. इसके लिए हर संस्था को बाकी सभी संस्थाओं से अलग-अलग संपर्क व्यवस्था बनाने की जरूरत नहीं होगी.

हालांकि, बिजली का मामला कहीं अधिक जटिल है. भुगतान डिजिटल नेटवर्क के जरिए होते हैं लेकिन बिजली की आपूर्ति को वास्तविक समय में भौतिक ग्रिड के भीतर संतुलित रखना पड़ता है. इसके लिए बिजली का निर्धारण, बिलिंग, रेगुलेशन और आपूर्ति की विश्वसनीयता, सभी सटीक सूचनाओं पर निर्भर करते हैं.
इंडिया एनर्जी स्टैक सरकार की उस व्यापक कोशिश का हिस्सा है जिसके तहत डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का विस्तार पहचान, भुगतान और कल्याणकारी योजनाओं के वितरण से आगे बढ़ाकर उत्पादक अर्थव्यवस्था तक किया जा रहा है.
अलग-अलग क्षेत्रों में इस पहल का विस्तार दिखने भी लगा है हालांकि सभी योजनाएं अभी विकास के एक समान चरण में नहीं हैं. कृषि क्षेत्र के लिए एकीकृत डिजिटल व्यवस्था तैयार करने वाली पहल एग्रीस्टैक के तहत अगस्त 2026 तक 10.31 करोड़ से अधिक किसान आईडी बनाई जा चुकी थीं.
अगस्त के मध्य तक आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत 96 करोड़ से अधिक स्वास्थ्य खाते बनाए जा चुके थे और 110 करोड़ से ज्यादा स्वास्थ्य रिकॉर्ड उनसे जोड़े जा चुके थे. ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) ने जुलाई में कुल 50 करोड़ लेन-देन का आंकड़ा पार कर लिया. 27 सितंबर को शुरू किए गए नेशनल डिजिटल टूरिज्म स्टैक का लक्ष्य 2028 के अंत तक 23,000 पर्यटन अनुभवों और होमस्टे को अपने नेटवर्क से जोड़ना है.
नीति आयोग के DPI\@2047 रोडमैप में आठ क्षेत्रों में बदलाव की पहचान की गई है. इसे अप्रैल में जारी किया गया था. इसमें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME), कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ ऋण, लाभ वितरण और विकेंद्रीकृत ऊर्जा बाजार शामिल हैं. हालांकि ऊर्जा इस सूची में सबसे पहले नहीं है. रोडमैप के पहले दो साल के चरण यानी 2026-27 में MSME और कृषि पर ध्यान दिया गया है.
इस पहल के पीछे साझा सोच यह है कि अलग-अलग सेवाओं को डिजिटल बनाने से आगे बढ़कर ऐसा साझा बुनियादी ढांचा तैयार किया जाए, जिसके जरिए संस्थाएं आंकड़ों का आदान-प्रदान कर सकें, सेवाओं तक पहुंच बढ़ा सकें और नई सेवाएं शुरू कर सकें.
बिजली क्षेत्र में इसकी खास अहमियत है. इस क्षेत्र का भौतिक बुनियादी ढांचा लगातार बड़ा और जटिल हुआ है, लेकिन इसकी डिजिटल प्रणालियां अब भी अक्सर एक-दूसरे से अलग-थलग हैं. साझा व्यवस्था इस पुरानी समस्या को दूर कर सकती है.

विद्युत मंत्रालय ने जून 2025 में इस टास्क फोर्स का गठन किया था. इसकी अध्यक्षता भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण के पूर्व महानिदेशक और राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी राम सेवक शर्मा कर रहे हैं. राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण ही स्वास्थ्य मिशन का संचालन करता है.
आधार के पूर्व मुख्य वास्तुकार प्रमोद वर्मा इस टास्क फोर्स में वही जिम्मेदारी निभा रहे हैं. बिजली मंत्रालय के पूर्व सचिव और केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रदीप कुमार पुजारी इसके उपाध्यक्ष हैं. इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि इसके मुख्य मार्गदर्शक हैं. आरईसी लिमिटेड नोडल एजेंसी और एफएसआर ग्लोबल ज्ञान भागीदार है.
टास्क फोर्स ने इंडिया एनर्जी स्टैक को एक सरल सिद्धांत के आधार पर तैयार किया है. इसके तहत साझा मानकों के जरिए संस्थाएं अपनी मौजूदा सॉफ्टवेयर और प्रणालियों को बरकरार रखते हुए सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकेंगी.
यह ढांचा तीन कामों पर आधारित है- रजिस्ट्रेशन, खोज और आदान-प्रदान. इसमें भाग लेने वाली संस्थाएं सत्यापित की जा सकने वाली डिजिटल पहचान के जरिए पंजीकरण करेंगी. दूसरी संस्थाएं उनकी पहचान और उपलब्ध सेवाओं का पता लगा सकेंगी और उनका सत्यापन कर सकेंगी. इसके बाद साझा डेटा प्रारूपों और प्रोटोकॉल के जरिए सूचनाओं का आदान-प्रदान होगा.
इंडिया एनर्जी स्टैक का मकसद बिजली कंपनियों की मौजूदा प्रणालियों को हटाकर उनकी जगह एक राष्ट्रीय डेटाबेस बनाना नहीं है. इसका उद्देश्य इन प्रणालियों को एक-दूसरे के साथ काम करने लायक बनाना है. इससे हर कंपनी के लिए अलग सॉफ्टवेयर कनेक्शन बनाने की जरूरत घट सकती है, प्रणालियों को जोड़ने की लागत कम हो सकती है और नए सेवा प्रदाताओं के लिए अलग-अलग राज्यों में काम करना आसान हो सकता है.
सरकार ने इस पहल को बिजली क्षेत्र की पूरी वैल्यू चेन में मानकीकृत डेटा के आदान-प्रदान, वास्तविक समय में आंकड़ों के विश्लेषण और उपभोक्ता सेवाओं को बेहतर बनाने का जरिया बताया है. इस विचार का एक उदाहरण पहले भी सामने आ चुका है. उत्तर प्रदेश ने 2020-21 में लखनऊ में बिजली बिलिंग और मीटर से जुड़े आंकड़ों के आदान-प्रदान के लिए ऊर्जा लेन-देन के एक ओपन प्रोटोकॉल, यूनिफाइड एनर्जी इंटरफेस का पायलट परीक्षण किया था.
शुरुआती परीक्षण पांच राज्यों की छह बिजली कंपनियों के साथ किए गए हैं. इनमें टाटा पावर मुंबई, आंध्र प्रदेश ईस्टर्न पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड, दक्षिण गुजरात विज कंपनी लिमिटेड, पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड, बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड और टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड शामिल हैं.

इस सूची में सरकारी और निजी, दोनों तरह की बिजली वितरण कंपनियां हैं. इससे अलग-अलग कार्यप्रणालियों में साझा प्रोटोकॉल की उपयोगिता पर शुरुआती परीक्षण का मौका मिला है. हालांकि अलग-अलग राज्यों में फैले इस क्षेत्र के लिए छह कंपनियों का नमूना बहुत छोटा है. अलग-अलग राज्यों में नियमन की प्रक्रियाएं, पुरानी प्रणालियां और डिजिटल तैयारी का स्तर भी अलग-अलग है.
अगले चरण के लिए सात प्राथमिक उपयोग तय किए गए हैं. इनमें ज्यादातर प्रशासनिक प्रक्रियाएं हैं, लेकिन इनके नतीजे अहम हो सकते हैं. अगले चरण में सात कामों को प्राथमिकता दी गई है. इनमें बिजली उत्पादकों से राज्य के बिजली नियंत्रण केंद्रों को बिजली उत्पादन का शेड्यूल भेजना और दो पक्षों के बीच बिजली खरीद-बिक्री के लिए एक ही जगह से शेड्यूल तय करने की व्यवस्था बनाना शामिल है.
इसके अलावा, ओपन एक्सेस के लिए सत्यापन योग्य अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करना और बिजली वितरण कंपनियों की ओर से राज्य विद्युत नियामक आयोगों को जमा किए जाने वाले कुल राजस्व आवश्यकता (ARR) के दस्तावेजों का एक समान प्रारूप तैयार करना भी इसमें शामिल है.
बाकी तीन उपयोग हैं- बिजली वितरण कंपनियों की अपनी प्रणालियों के भीतर डेटा का आदान-प्रदान, बिजली उत्पादकों के बिलों का सत्यापन और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की रिपोर्टिंग के प्रारूपों को मशीन से पढ़े जा सकने वाले डेटा प्रारूपों में बदलना.
इन प्रक्रियाओं में परिचालन और व्यावसायिक सूचनाओं का बार-बार आदान-प्रदान होता है. मानकीकरण से आंकड़ों का मैन्युअल मिलान करने की जरूरत घट सकती है, रिकॉर्ड की जांच आसान हो सकती है और जमा किए गए दस्तावेजों के सत्यापन में लगने वाला समय कम हो सकता है.
रेगुलेटरों के लिए साझा डेटा प्रारूपों से अलग-अलग बिजली कंपनियों की टैरिफ संबंधी अर्जियों की तुलना करना आसान हो सकता है. बिजली उत्पादकों और बाजार के अन्य भागीदारों को भी अलग-अलग प्रशासनिक प्रणालियों की शर्तें पूरी करने में कम मशक्कत करनी पड़ सकती है.
उपभोक्ताओं से जुड़ी सेवाओं पर भी काम शुरू हो रहा है. राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस प्रभाग के साथ साझेदारी के जरिए उपभोक्ता डिजिलॉकर पर कंज्यूमर एनर्जी पासपोर्ट और कंज्यूमर मीटर डाइजेस्ट हासिल कर सकते हैं. पीयर-टू-पीयर (P2P) यानी दो पक्षों के बीच ऊर्जा कारोबार की व्यवस्था सबसे आगे बढ़ी है.
आरईसी ने जनवरी में तकनीकी सेवा प्रदाताओं को इंडिया एनर्जी स्टैक के मानकों के आधार पर अंतरराज्यीय P2P कारोबार का पायलट तैयार करने के लिए आमंत्रित किया था. फरवरी में नई दिल्ली में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में इसका लाइव प्रदर्शन किया गया. इसमें मेरठ के एक किसान ने छत पर लगे सौर ऊर्जा संयंत्र से बनी बिजली की छह यूनिट दिल्ली के एक दुकानदार को 30 रुपए में बेची.
आरईसी ने इसे अब तक इंडिया एनर्जी स्टैक का सबसे अधिक दिखाई देने वाला इस्तेमाल बताया है. हालांकि ये शुरुआती प्रयोग हैं. इनसे यह साबित नहीं होता कि देशभर में ऊर्जा का बाजार पहले से काम करने लगा है. इनका व्यापक इस्तेमाल बिजली कंपनियों की भागीदारी, नियामकीय मंजूरी, व्यावसायिक नियमों और उपभोक्ताओं की मांग पर निर्भर करेगा.
कुल मिलाकर इस पहल का समय काफी अहम है. भारत की बिजली व्यवस्था को बिजली उत्पादन और खपत के बदलते तौर-तरीकों के अनुरूप ढालना होगा. इसमें नवीकरणीय ऊर्जा और छतों पर लगे सौर ऊर्जा संयंत्रों जैसे विकेंद्रीकृत ऊर्जा स्रोतों का विस्तार भी शामिल है. ऐसे में ग्रिड संचालकों, बिजली उत्पादकों, वितरण कंपनियों और उपभोक्ताओं के बीच भरोसेमंद सूचनाओं का आदान-प्रदान पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है.
इसमें से काफी सूचनाएं स्मार्ट मीटरों से मिलेंगी. हालांकि इन्हें लगाने की रफ्तार अभी सभी जगह एक जैसी नहीं है. जुलाई 2026 तक देशभर में करीब 6.13 करोड़ स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके थे. जबकि संशोधित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS) और इससे पहले की योजनाओं के तहत करीब 23 करोड़ मीटर लगाने की मंजूरी दी गई थी.
एक साझा डिजिटल व्यवस्था इन गतिविधियों के तालमेल में मदद कर सकती है. हालांकि यह भौतिक बिजली ग्रिड में निवेश की जगह नहीं ले सकती और न ही बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय कमजोरियों को दूर कर सकती है.
सबसे बड़ी बाधा तकनीकी के बजाय संस्थागत हो सकती है. बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति, सॉफ्टवेयर, कर्मचारियों और नई प्रणालियां अपनाने की क्षमता में काफी अंतर है. साझा मानक अपनाने के लिए खरीद संबंधी अनुबंधों, आंतरिक कामकाज और डेटा प्रबंधन की प्रक्रियाओं में बदलाव करने पड़ सकते हैं.
इस दिशा में क्षमता भी सीमित है. सरकार ने आरडीएसएस के तहत बिजली वितरण कंपनियों के कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने के लिए 100.9 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं. जुलाई 2026 तक 14,853 लोगों को प्रशिक्षण दिया जा चुका था.
इतने बड़े क्षेत्र के कर्मचारियों की संख्या के लिहाज से यह आंकड़ा काफी कम है. बिजली कंपनियों को यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि इस व्यवस्था की लागत कौन उठाएगा, गलत आंकड़ों के लिए किसकी जवाबदेही होगी और सूचनाओं को अनधिकृत पहुंच से कैसे सुरक्षित रखा जाएगा.
एक अहम सवाल अब भी बना हुआ है: बिजली कंपनियां इस व्यवस्था से क्यों जुड़ेंगी? टास्क फोर्स ने बिजली क्षेत्र से जुड़े पक्षों को इंडिया एनर्जी स्टैक अपनाने की तैयारी करने की सिफारिश की है. मार्च में जारी रणनीति दस्तावेज में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने का रास्ता बताया गया है.
इसके तहत पहले उपयोग के मामलों को तैयार और सत्यापित किया जाएगा. फिर तय मानकों के आधार पर धीरे-धीरे इसका विस्तार किया जाएगा. हर उपयोग को अगले चरण में ले जाने से पहले कुछ निर्धारित शर्तें पूरी करनी होंगी.
लेकिन अंतिम रिपोर्ट के बारे में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी यह नहीं बताती कि क्या विद्युत मंत्रालय के नियमों या नियामकीय आदेशों के जरिए इसे अपनाना अनिवार्य किया जाएगा, क्या आरडीएसएस जैसी योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता की शर्तों से इसे बढ़ावा दिया जाएगा या फिर हर बिजली कंपनी को अपने स्तर पर फैसला लेने की छूट होगी.
UPI को बड़े पैमाने पर अपनाए जाने की एक वजह यह भी थी कि भारतीय रिजर्व बैंक और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम बैंकों के लिए नियम तय कर सकते थे. लेकिन बिजली वितरण का नियमन अलग-अलग राज्यों के स्तर पर होता है. इसलिए कोई एक संस्था ऐसा नहीं कर सकती.
साइबर सुरक्षा, डेटा की गुणवत्ता और निजता इस पूरी प्रक्रिया के अहम पहलू होंगे. साझा ढांचा आंकड़ों के आदान-प्रदान को अधिक व्यवस्थित बना सकता है, लेकिन इससे यह गारंटी नहीं मिलती कि मूल जानकारी सही ही होगी. न ही अलग-अलग प्रणालियों के बीच तालमेल से साइबर हमलों का खतरा खत्म हो जाता है. बिजली कंपनियों पर नियमों के पालन का बोझ भी बढ़ रहा है.
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने 31 जुलाई को विद्युत क्षेत्र में साइबर सुरक्षा विनियम अधिसूचित किए थे. यह इस क्षेत्र का पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी साइबर सुरक्षा ढांचा है. इसमें सुरक्षा ऑडिट, घटनाओं की रिपोर्टिंग और सप्लाई चेन की सुरक्षा शामिल है. इसके ज्यादातर प्रावधान 1 अप्रैल 2027 से लागू होंगे.
27-28 अक्टूबर को जयपुर में इंडिया स्मार्ट ग्रिड फोरम की ओर से आयोजित बिजली वितरण कंपनियों की बैठक में इंडिया एनर्जी स्टैक, डेटा के आदान-प्रदान, साइबर सुरक्षा और डेटा निजता पर एक पूरा सत्र रखा गया था. बैठक के एजेंडे में इंडिया एनर्जी स्टैक और नए साइबर सुरक्षा विनियमों, दोनों को अपनाने के लिए बिजली वितरण कंपनियों की तैयारी का मुद्दा भी शामिल था.
उपभोक्ताओं के आंकड़ों को उनकी सहमति से साझा करने की व्यवस्था को डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम का पालन भी करना होगा. नवंबर 2025 में अधिसूचित नियमों के तहत पंजीकृत सहमति प्रबंधकों से जुड़े प्रावधान नवंबर 2026 से लागू होंगे. वहीं सूचना देने, सहमति लेने और सुरक्षा उपायों से जुड़ी मुख्य जिम्मेदारियां मई 2027 से लागू होंगी. यह वही समय होगा, जब इंडिया एनर्जी स्टैक का प्लेटफॉर्म निर्माण के चरण में होगा.
टास्क फोर्स ने मानकों को बनाए रखने और उनके अनुरूप कामकाज का प्रमाणन करने के लिए एक संस्थागत व्यवस्था बनाने की सिफारिश की है. नेटवर्क के विस्तार के साथ यह व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण होगी. तकनीक और रेगुलेशन में बदलाव के साथ मानकों को भी विकसित होना होगा.
इसके साथ ही, हर बिजली कंपनी को एक ही समय पर अपनी प्रणालियां उन्नत करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए. प्रमाणन की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए. तकनीकी विवादों को सुलझाने और अलग-अलग प्रणालियों के बीच तालमेल बनाए रखने के तरीके भी स्पष्ट होने चाहिए.
इसके मानक और डेटा प्रारूप सार्वजनिक रूप से उपलब्ध करा दिए गए हैं. आरईसी की वेबसाइट पर एक पोर्टल भी है, जहां संबंधित पक्ष नए सुझाव दे सकते हैं. चुनौती इस खुले तकनीकी ढांचे को ऐसी व्यवस्था में बदलने की है, जिस पर संस्थाएं भरोसा करें और जिसका नियमित रूप से इस्तेमाल करें.
अगला कदम निविदा प्रक्रिया है. आरईसी ने 26 अक्टूबर को जारी निविदा में ऐसी एजेंसी से प्रस्ताव मांगे हैं, जो इंडिया एनर्जी स्टैक का डिजाइन तैयार करे, इसे विकसित और लागू करे. इसके साथ 730 दिनों तक उत्पादन संबंधी तकनीकी सहायता और रखरखाव की जिम्मेदारी भी उसी एजेंसी की होगी.
बोलियां जमा करने की अंतिम तारीख 7 नवंबर है और इन्हें अगले दिन खोला जाना है. यह समयसीमा परियोजना की प्रगति का एक ठोस संकेत देती है. हालांकि केवल निविदा जारी होने से देशभर में इसे लागू करने की लागत स्पष्ट नहीं होती और न ही यह गारंटी मिलती है कि बिजली कंपनियां इसे अपना लेंगी.
इसलिए इस पहल का आकलन कुछ मापने योग्य नतीजों के आधार पर होना चाहिए. जैसे बिजली शेड्यूल तय करने और बिलिंग में कितना समय बचता है, मैन्युअल गलतियां और आंकड़ों के मिलान की लागत कितनी घटती है, नियामकीय दस्तावेजों पर कितनी जल्दी कार्रवाई होती है और कितनी बिजली कंपनियां इस ढांचे के जरिए सक्रिय रूप से आंकड़ों का आदान-प्रदान करती हैं.
यह देखना भी जरूरी होगा कि क्या छोटी बिजली कंपनियां बिना बहुत ज्यादा खर्च किए इस व्यवस्था से जुड़ सकती हैं. मार्च 2026 में सरकार ने राज्यसभा को बताया था कि इस पहल के लिए 51.3 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे, जिनमें से 3.88 करोड़ रुपए जारी किए गए थे. ये आंकड़े शुरुआती वित्तीय स्थिति बताते हैं न कि परियोजना को पूरी तरह लागू करने की अंतिम लागत.
UPI इस पहल को समझने के लिए एक उपयोगी उदाहरण है लेकिन उसे सीधे अपनाया नहीं जा सकता. UPI की सफलता के पीछे साझा प्रोटोकॉल, व्यापक भागीदारी और रोजमर्रा के जीवन में काम आने वाली स्पष्ट व्यवस्था थी. बिजली क्षेत्र में कामकाज कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है.
यहां भौतिक सीमाएं और रेगुलेटरी जिम्मेदारियां हैं, जिन्हें केवल मानकीकरण से खत्म नहीं किया जा सकता. एनर्जी स्टैक इस व्यवस्था में सूचनाओं के प्रवाह को बेहतर बना सकता है, लेकिन यह बिजली वितरण कंपनियों की बेहतर वित्तीय स्थिति, मजबूत नियमन या भरोसेमंद ग्रिड का विकल्प नहीं है.
भारत ने दिखाया है कि साझा डिजिटल बुनियादी ढांचे को बड़े पैमाने पर संचालित किया जा सकता है. इंडिया एनर्जी स्टैक के पास अब प्रस्तावित ढांचा, कुछ शुरुआती परीक्षण, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध मानक और अगले चरण के लिए निविदा प्रक्रिया है.
असली परीक्षा तब शुरू होगी, जब बिजली कंपनियों को अपनी मौजूदा प्रणालियों में बदलाव करना होगा और साझा मानकों को अपने रोजमर्रा के कामकाज का हिस्सा बनाना होगा. इसकी सफलता का पैमाना कोई नया डिजिटल मंच शुरू करना नहीं होगा, बल्कि यह होगा कि इससे भारत की बिजली व्यवस्था का संचालन, नियमन और इस्तेमाल कितना आसान होता है.

