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‘नक्शों की जंग’ में भारत के फैसले से क्यों भड़का चीन?

भारत ने अरुणाचल प्रदेश के 27 स्थानों और भौगोलिक विशेषताओं के नाम आधिकारिक नक्शों पर मानकीकृत किए हैं. चीन ने इसे खारिज करते हुए राज्य पर अपना दावा दोहराया है

सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शों के आधार पर भारत में अरुणाचल प्रदेश में 27 जगहों के नाम तय किए हैं
अपडेटेड 13 अगस्त , 2026

किसी जगह का नाम भले ही मामूली बात लगे लेकिन भारत-चीन सीमा पर इसका राजनीतिक महत्व हो सकता है. भारत ने अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों और भौगोलिक विशेषताओं के नाम अपने आधिकारिक नक्शों पर तय कर दिए हैं. 

इस पर चीन ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. चीन ने इस कदम को एकतरफा और ‘अमान्य’ बताया है. उसने अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा भी दोहराया है और इसे 'जंगनान' यानी दक्षिणी तिब्बत कहा है.

भारत की प्रतिक्रिया भी स्पष्ट रही. विदेश मंत्रालय (MEA) ने 11 अगस्त को फिर कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का ‘अविभाज्य और अभिन्न’ हिस्सा है. मंत्रालय ने कहा कि जगहों के नाम बदलने की कोशिश से यह वास्तविकता नहीं बदल सकती. 

भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि इन इलाकों में शांति और स्थिरता बनाए रखना बेहद जरूरी है. सीमा की स्थिति का असर दोनों देशों के व्यापक संबंधों पर भी पड़ेगा.

ताजा घटनाक्रम भारत और चीन के बीच नक्शों, जगहों के नाम और क्षेत्र को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद का नया अध्याय है. भारत का तर्क सीधा है. वह किसी दूसरे देश के इलाके का नाम नहीं रख रहा है बल्कि उन जगहों के नाम तय कर रहा है जो भारत के प्रशासन के तहत हैं और जिन्हें वह देश का अभिन्न हिस्सा मानता है. 

भारत और तिब्बत के बीच 1914 में मैकमोहन लाइन (सीमा रेखा) तय हुई थी
भारत और तिब्बत के बीच 1914 में मैकमोहन लाइन (सीमा रेखा) तय हुई थी

चीन के लिए यह उस क्षेत्र पर अपने दावे को मजबूत करने की भारत की एक और कोशिश है जिस पर वह अपना अधिकार बताता है.

सैन्य मामलों के जानकारों का मानना है कि यह चीन की उस रणनीति का जवाब है जिसमें वह भारतीय इलाके की जगहों के नाम बदलकर और फिर आधिकारिक या कानूनी दस्तावेज जारी करके अपने दावे को मजबूत करने की कोशिश करता है. 

नक्शों और प्रशासनिक फैसलों के जरिए क्षेत्रीय दावों को मजबूत करना चीन की लंबे समय से चली आ रही रणनीति का हिस्सा है.

ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में चीन मामलों की एक्सपर्ट प्रोफेसर श्रीपर्णा पाठक कहती हैं कि भारत की ओर से अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों के नाम सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक नक्शों पर तय करना अपनी संप्रभुता का स्पष्ट दावा है. यह बीजिंग की ओर से बार-बार भारतीय इलाके के लिए चीनी नाम देने की कोशिशों का सीधा जवाब है. 

पाठक के मुताबिक इससे यह बात और स्पष्ट होती है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है. यह दावा 1914 के शिमला सम्मेलन में ब्रिटिश भारत और तिब्बत के बीच तय मैकमोहन रेखा पर आधारित है.

पाठक ने कहा, "लॉन्गजू जैसे स्थान, जहां 1959 में चीन ने घुसपैठ की थी, और थाग ला, जहां 1962 के भारत-चीन युद्ध में बड़ी लड़ाई हुई थी, भारतीय सीमाओं की रक्षा की ऐतिहासिक लड़ाई के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं. जसवंत गढ़ और शेर-ए-थापा स्मारक जैसे स्मारक उन भारतीय सैनिकों के बलिदान को याद करते हैं, जिन्होंने इन संघर्षों में मोर्चा संभाला था. इस तरह राष्ट्रीय स्मृति भी आधिकारिक नक्शे का हिस्सा बन जाती है."

श्रीपर्णा आगे यह भी जोड़ती हैं कि चीन की तथाकथित ‘नक्शों की जंग’ और जगहों के काल्पनिक नाम देने की कोशिश उस जमीन पर अपना दावा बनाने का प्रयास है, जिस पर उसका कभी नियंत्रण नहीं रहा. इससे जमीनी स्तर पर भारत की संप्रभुता की स्थिति नहीं बदल सकती.

भारत सरकार की कोशिश है कि अरुणाचल प्रदेश में इन नए नामों को लेकर जागरूकता बढ़े
भारत सरकार की कोशिश है कि अरुणाचल प्रदेश में इन नए नामों को लेकर जागरूकता बढ़े

विशेषज्ञों के मुताबिक अरुणाचल प्रदेश सरकार से सलाह करके इन नामों को तय करने से वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के आसपास लोगों में जागरूकता बढ़ेगी, प्रशासन के लिए स्थिति ज्यादा स्पष्ट होगी और भारत का रणनीतिक रुख मजबूत होगा. 

यह कदम भारत की क्षेत्रीय अखंडता पर जोर देता है और यह संदेश देता है कि चीनी प्रचार से अरुणाचल प्रदेश की भारत में स्थिति नहीं बदल सकती.

भारतीय सेना की लेह स्थित XIV कोर में लंबे समय तक सेवा दे चुके मेजर जनरल ए.पी. सिंह (रिटायर्ड) का मानना है कि नक्शों में छोटे-छोटे बदलाव करके अपने क्षेत्रीय दावे को मजबूत करना भी चीनी आक्रामकता का एक तरीका है. 

उनके मुताबिक यह अरुणाचल प्रदेश और पूर्वी सिक्किम में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जगहों पर कब्जा करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा लगता है. इसमें विवादित डोकलाम पठार पर स्थित जामफेरी रिज भी शामिल है.

मेजर जनरल सिंह कहते हैं, "भारतीय रणनीतिकारों ने अब इन 27 जगहों के नाम तय करके जवाब दिया है. हमें सीमावर्ती इलाकों का तेजी से विकास करने और वहां लोगों को बसाने पर भी जोर देना चाहिए. इसका मकसद सिर्फ अपने दावे को मजबूत करना नहीं, बल्कि गश्त और दूसरी गतिविधियों के लिए स्थायी ठिकाने तैयार करना भी होना चाहिए."

नामों को लेकर विवाद नया नहीं है. चीन ने अरुणाचल प्रदेश में जगहों के नाम बदलने की मौजूदा कवायद 2017 में शुरू की थी. तब उसने छह जगहों के चीनी नाम जारी किए थे. इसके बाद 2021, 2023, 2024 और 2025 में भी ऐसी सूचियां जारी की गईं. 

अप्रैल 2024 में बीजिंग ने 30 और जगहों के नाम जारी किए. भारत ने हर बार इन कवायदों को खारिज करते हुए कहा कि जगहों के नाम बदलने से उनकी स्थिति नहीं बदल सकती.

इसलिए भारत के ताजा कदम को सीधे जवाब के तौर पर देखा जा रहा है. बीजिंग अपने नामों के जरिए क्षेत्रीय दावे को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है जबकि नई दिल्ली यह सुनिश्चित कर रही है कि उसके आधिकारिक नक्शों में भारत द्वारा मान्यता प्राप्त नाम ही दर्ज हों. यह भले ही प्रतीकात्मक लगे, लेकिन क्षेत्रीय विवाद में इसका महत्व है.

नक्शों का इस्तेमाल सरकारें, सेनाएं, अंतरराष्ट्रीय संगठन और शोधकर्ता करते हैं. किसी जगह के लिए किसी खास नाम का बार-बार इस्तेमाल होने से धीरे-धीरे उस जगह को देखने और समझने का नजरिया प्रभावित हो सकता है. 

भारत और चीन दोनों नहीं चाहते कि दूसरे देश की शब्दावली को उस जगह के लिए सामान्य या आधिकारिक नाम माना जाए.

अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन सीमा के पास लगा एक साइन पोस्ट
अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन सीमा के पास लगा एक साइन पोस्ट

आज सीमा का स्वरूप काफी बदल चुका है. भारत ने सीमावर्ती इलाकों तक पहुंच बेहतर बनाने के लिए सड़कों, पुलों और दूसरे बुनियादी ढांचे का निर्माण तेज किया है. चीन ने भी सीमा के अपने हिस्से में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा तैयार किया है. 

हिमालय में सैनिकों, उपकरणों और सामान को तेजी से पहुंचाने की क्षमता कई बार वहां तैनात सैनिकों की संख्या जितनी ही महत्वपूर्ण हो सकती है. इसलिए जगहों के नाम तय करने की यह कवायद सीमा को लेकर बड़ी प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है.

चीन की प्रतिक्रिया एक जानी-पहचानी रणनीति के मुताबिक है. बीजिंग अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताता है और जब भी भारत वहां कोई प्रशासनिक या राजनीतिक गतिविधि करता है, चीन आपत्ति जताता है. नई दिल्ली इसे भारतीय संप्रभुता का दावा मानती है. 

चीन से जुड़े सरकारी मीडिया ने भी कहा है कि भारत की यह कवायद दोनों देशों के संबंध सुधारने और सीमा विवाद सुलझाने की कोशिशों को मुश्किल बना सकती है.

भारत ने इस तर्क को बार-बार खारिज किया है. जब चीन ने 2024 में 30 नामों की सूची जारी की थी तब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इसे खारिज करते हुए कहा था कि ‘गढ़े हुए’ नाम देने से यह वास्तविकता नहीं बदल सकती कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है. 

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी यही बात और सरल शब्दों में कही है: किसी जगह का नाम बदलने से उसका मालिकाना हक नहीं बदल जाता.

ताजा घटनाक्रम का समय भी महत्वपूर्ण है. 2020 में पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी की खूनी झड़प के बाद भारत और चीन ने पिछले कुछ वर्षों में संबंधों को स्थिर करने की कोशिश की है. इसके बाद दोनों देशों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर कई टकराव वाले स्थानों पर तनाव कम करने और राजनयिक संबंधों में कुछ सामान्य स्थिति बहाल करने के कदम उठाए हैं.

लेकिन अरुणाचल प्रदेश अब भी दोनों देशों के संबंधों के सबसे मुश्किल हिस्सों में से एक है. चीन पूरे राज्य पर अपना दावा करता है. इसलिए वहां भारत की हर गतिविधि- चाहे वह राजनीतिक हो, प्रशासनिक हो या बुनियादी ढांचे से जुड़ी हो- बीजिंग के लिए बेहद संवेदनशील होती है.

नई दिल्ली के सामने चुनौती यह है कि वह अपने क्षेत्रीय रुख पर मजबूती से कायम रहे लेकिन चीन की हर कार्रवाई को बड़े तनाव में बदलने से भी रोके. ताजा प्रतिक्रिया इसी संतुलन को दिखाती है. भारत ने चीन की आपत्ति को पूरी तरह खारिज किया है, साथ ही यह भी कहा है कि सीमा की स्थिति का सीधा असर दोनों देशों के व्यापक संबंधों पर पड़ेगा.

सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि 27 नाम इस बहुत बड़ी प्रतिस्पर्धा का सिर्फ एक हिस्सा हैं. जमीन पर असली मायने सिर्फ इस बात के नहीं हैं कि किसी पहाड़, दर्रे या झील का नाम क्या है. 

महत्वपूर्ण यह है कि उसका प्रशासन किसके पास है, वहां कौन पहुंच सकता है और कौन वहां लगातार अपनी मौजूदगी बनाए रख सकता है. इसलिए सीमा की सड़कों, पुलों, संचार व्यवस्था और सैन्य बुनियादी ढांचे में भारत का निवेश नक्शे पर लिखे शब्दों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. चीन भी सीमा के पार अपने बुनियादी ढांचे को तेजी से विकसित कर रहा है.

फिर भी नक्शे महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे क्षेत्रीय दावों को ऐसे रूप में पेश करते हैं जो दिखाई देता है, आधिकारिक होता है और बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है. चीन अरुणाचल प्रदेश की जगहों के लिए अपने नामों का इस्तेमाल जारी रख सकता है. 

भारत अपने आधिकारिक नामों का इस्तेमाल करता रहेगा और बीजिंग के दावों को खारिज करता रहेगा. किसी नाम की वजह से दोनों में से कोई भी अपना रुख बदलने वाला नहीं है. लेकिन यही वजह है कि ताजा घटनाक्रम महत्वपूर्ण है. 

भारत-चीन सीमा विवाद अब सिर्फ जमीन पर या बातचीत की मेज पर नहीं लड़ा जा रहा है. यह नक्शों पर भी लड़ा जा रहा है और उन पर दर्ज नामों को लेकर भी. 

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