
भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं. एक ओर बांग्लादेश उभरते सऊदी अरब-तुर्किये-पाकिस्तान गठजोड़ (मक्का संयुक्त रक्षा समझौता) में दिलचस्पी के संकेत दे रहा है. वहीं भारत भी मध्य पूर्व में जारी युद्ध और अस्थिरता के बीच रूस और चीन के साथ अपने संबंधों को मजबूत कर रहा है.
इस उथल-पुथल भरे माहौल में भारत-चीन संबंध एक और अहम कूटनीतिक परीक्षा से गुजर रहे हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधियों की 25वें दौर की बातचीत के लिए बीजिंग में चीन के विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की है.
यह बातचीत ऐसे समय हो रही है, जब दोनों देश सीमा विवाद, आपसी रणनीतिक अविश्वास और एशिया में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण मुश्किल दौर से गुजर रहे रिश्तों को संभालने की कोशिश कर रहे हैं.
यह बैठक भारत में 12-13 सितंबर को होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन से कुछ ही हफ्ते पहले हो रही है. इसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सात साल में पहली बार भारत आने की उम्मीद है. उनकी मौजूदगी नई दिल्ली और बीजिंग के बीच उच्चस्तरीय बातचीत फिर शुरू करने और रिश्तों को बड़े स्तर पर सुधारने का अहम मौका दे सकती है.
विशेष प्रतिनिधियों की 25वें दौर की बातचीत से पहले चीन के उपराष्ट्रपति हान झेंग ने डोभाल से मुलाकात की. बीजिंग की ओर से जारी बयान में हान झेंग ने कहा कि पिछले दो वर्षों में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो बार मिल चुके हैं और चीन-भारत संबंधों के विकास तथा द्विपक्षीय रिश्तों को सुधार की दिशा में ले जाने को लेकर महत्वपूर्ण सहमति बनी है.
बयान में यह भी कहा गया कि पड़ोसी और प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं होने के नाते चीन और भारत को अपने रिश्तों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से देखना चाहिए, आपसी विश्वास बढ़ाना चाहिए, बहुपक्षीय तालमेल मजबूत करना चाहिए और मतभेदों को संभालना चाहिए.

भारत के लिए यह दौरा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सिर्फ उच्चस्तरीय बातचीत दोबारा शुरू नहीं होगी, बल्कि यह भी पता चलेगा कि भारत और चीन सीमा तनाव, सैन्य तैनाती और संकट प्रबंधन के सिलसिले से आगे बढ़ सकते हैं या नहीं.
2020 की गलवान घाटी झड़प की विरासत, एक-दूसरे के क्षेत्र पर दावे और हिमालयी सीमा पर लगातार बढ़ता सैन्य बुनियादी ढांचा दोनों देशों के रिश्तों में स्थाई सुधार की राह में बड़ी बाधाएं हैं.
भारत-चीन सीमा विवाद एशिया की सबसे जटिल भू-राजनीतिक चुनौतियों में से एक है. विवादित सीमा पश्चिम में लद्दाख से लेकर पूर्व में अरुणाचल प्रदेश तक करीब 3,488 किलोमीटर लंबी है. 2003 में बनाई गई विशेष प्रतिनिधियों की व्यवस्था का मकसद इस विवाद का राजनीतिक समाधान तलाशना था.
दो दशक से ज्यादा समय बाद भी सीमा विवाद पर कोई अंतिम समझौता नहीं हो सका है. हालांकि, इस व्यवस्था ने संवाद के रास्ते खुले रखने और विवादों को बड़े संकट में बदलने से रोकने में अहम भूमिका निभाई है.
लेकिन भारत के नजरिए से बातचीत मूल सुरक्षा समस्या के समाधान का विकल्प नहीं बन सकती. स्थाई समाधान के बिना बातचीत तनाव के कारणों को खत्म करने के बजाय उन्हें संभालने का माध्यम बनकर रह सकती है.
जून 2020 की गलवान घाटी झड़प एक निर्णायक मोड़ थी. यह दशकों में भारत और चीन के बीच सबसे गंभीर सैन्य टकराव था और इसने दोनों देशों के रिश्तों को लेकर बनी पुरानी सोच को पूरी तरह बदल दिया. गलवान से पहले सीमा विवाद कायम रहने के बावजूद आर्थिक संबंधों की वजह से राजनीतिक मतभेदों को संभालने की कुछ गुंजाइश थी.
सैनिकों के बीच झड़प के बाद नई दिल्ली ने सुरक्षा पर ज्यादा जोर देना शुरू किया. भारत ने सीमा पर बुनियादी ढांचे का विकास तेज किया, वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सैन्य तैयारियां मजबूत कीं, निगरानी और तेजी से जवाब देने की क्षमता बढ़ाई और एशिया-पैसेफिक क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारियां मजबूत कीं.
इसी दौरान तिब्बत में चीन की ओर से सड़कों, रेल संपर्क, हवाई पट्टियों और सैन्य सुविधाओं का विस्तार भी हुआ. इससे हिमालयी सीमा पर लंबे समय की सुरक्षा स्थिति को लेकर भारत की चिंता बढ़ी है. नई दिल्ली के लिए सबक साफ है: व्यापक रिश्तों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया को सीमा पर शांति और स्थिरता से अलग नहीं किया जा सकता.

डोभाल-वांग की बातचीत में दोनों देशों के दो ऐसे वरिष्ठ अधिकारी आमने-सामने हैं, जो द्विपक्षीय रिश्तों के शायद सबसे संवेदनशील मुद्दे से जुड़े हैं. भारत की प्राथमिकताओं में LAC पर शांति बनाए रखना, एक और सैन्य टकराव को रोकना, मौजूदा सीमा समझौतों का पालन सुनिश्चित करना और यथास्थिति को एकतरफा बदलने की कोशिशों का विरोध करना शामिल है.
भारत व्यावहारिक विश्वास-बहाली के उपाय भी करना चाहता है, उसका रुख सिर्फ भरोसे पर आधारित होने की संभावना नहीं है. भरोसे के साथ सत्यापन योग्य कदम, पारदर्शिता और मौजूदा व्यवस्थाओं का सम्मान भी जरूरी होगा.
चीन पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक, यहीं दोनों देशों के नजरिए में मूल अंतर सामने आता है. भारत मानता है कि स्थाई स्थिरता आपसी विश्वास, पारदर्शिता और पहले से तय प्रतिबद्धताओं के पालन पर निर्भर करती है.
वहीं बीजिंग आम तौर पर अपने क्षेत्रीय दावों को कायम रखते हुए विवाद को संभालने की कोशिश करता रहा है.
अरुणाचल प्रदेश भारत की सुरक्षा चिंताओं के केंद्र में बना रहेगा. चीन इस भारतीय राज्य को 'दक्षिण तिब्बत' कहकर अपना हिस्सा बताता है जबकि भारत का स्पष्ट रुख है कि अरुणाचल प्रदेश देश का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है.
नई दिल्ली ने राज्य के स्थानों को चीनी नाम देने की बीजिंग की कोशिशों को बार-बार खारिज किया है. भारत का कहना है कि जगहों के नाम बदलने से संप्रभुता, ऐतिहासिक वास्तविकता या जमीन पर स्थिति नहीं बदल सकती.
भारत के लिए यह सिर्फ नक्शे या कूटनीतिक भाषा का सवाल नहीं है बल्कि सीधे तौर पर क्षेत्रीय अखंडता से जुड़ा है.
अरुणाचल प्रदेश का रणनीतिक महत्व सीमा विवाद से कहीं आगे है. तिब्बत के पास इसकी स्थिति भारत की पूर्वोत्तर सुरक्षा व्यवस्था और व्यापक हिमालयी रणनीतिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है. इसलिए इस क्षेत्र में गंभीर तनाव बढ़ने का असर सिर्फ भारत-चीन संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा.
राजनीतिक और सैन्य तनाव के बावजूद भारत और चीन बड़े आर्थिक साझेदार बने हुए हैं. दोनों देशों के बीच करीब 150 अरब डॉलर (14.3 लाख करोड़ रुपए) का द्विपक्षीय व्यापार है.
हालांकि इस रिश्ते पर बड़े व्यापार घाटे और बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का असर है. दांव सिर्फ दोनों देशों के बीच व्यापार तक सीमित नहीं हैं. भारत-चीन संबंध एशिया-पैसेफिक की सुरक्षा, ग्लोबल सप्लाई चेन, क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक सहयोग और एशिया में व्यापक शक्ति संतुलन को प्रभावित करते हैं.

अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ वैश्विक रणनीतिक परिदृश्य में भारत का महत्व भी बढ़ा है. बीजिंग के लिए आर्थिक और कूटनीतिक कारणों से नई दिल्ली के साथ स्थिर संबंध महत्वपूर्ण हैं. वहीं भारत ऐसी बातचीत चाहता है जिससे उसकी रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय सुरक्षा हित सुरक्षित रहें.
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता से तीन तरह के नतीजे सामने आ सकते हैं. सबसे सकारात्मक संभावना धीरे-धीरे स्थिरता आने की है. इसमें दोनों पक्ष विश्वास-बहाली के उपाय लागू कर सकते हैं, सैन्य तनाव कम कर सकते हैं और आपसी संवाद बेहतर कर सकते हैं. ऐसी प्रगति से आगे चलकर व्यापक सहयोग की गुंजाइश बन सकती है.
निकट भविष्य में ज्यादा व्यावहारिक संभावना नियंत्रित प्रतिस्पर्धा की है. इसमें सीमा विवाद के अंतिम समाधान के बिना कूटनीतिक बातचीत जारी रह सकती है और दोनों देश यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर सकते हैं कि तनाव खुले संघर्ष में न बदले.
तीसरी संभावना फिर से संकट पैदा होने की है. सैन्य गतिविधियों में बढ़ोतरी या अरुणाचल प्रदेश और दूसरे संवेदनशील इलाकों को लेकर ज्यादा तीखा विवाद एक और टकराव की वजह बन सकता है. इसका असर क्षेत्रीय स्थिरता पर भी पड़ सकता है.
इसलिए भारत के लिए मकसद सिर्फ बातचीत करना नहीं है. लगातार बातचीत का समर्थन करते हुए भारत स्पष्ट करता रहा है कि संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता.
डोभाल-वांग बातचीत तनाव कम करने में मदद कर सकती है लेकिन इससे अकेले सीमा विवाद का समाधान नहीं होगा. असली परीक्षा हिमालयी सीमा पर उठाए जाने वाले ठोस कदमों से होगी.
अगर बीजिंग और नई दिल्ली कूटनीतिक बातचीत को संयम, पारदर्शिता और विश्वास-बहाली के ठोस कदमों में बदल पाते हैं तो रिश्ते धीरे-धीरे नियंत्रित स्थिरता की ओर बढ़ सकते हैं.
हिमालयी सीमा अब सिर्फ दोनों देशों के बीच का सीमा विवाद नहीं रह गई है. यह 21वीं सदी के एशिया में रणनीतिक संतुलन को तय करने वाला एक अहम कारक बन चुकी है. भारत के लिए स्थाई शांति के साथ संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और पहले से की गई प्रतिबद्धताओं का सम्मान भी जरूरी है.

