
करीब 10 महीने पहले भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अर्थव्यवस्था को ‘दुर्लभ गोल्डीलॉक्स दौर’ में बताया था. मतलब कि अर्थव्यवस्था के लिहाज से आदर्श या संतुलित.
तब आर्थिक विकास दर करीब 8 फीसदी थी, पूरे साल महंगाई के 2 फीसदी रहने का अनुमान था और एक कैलेंडर वर्ष में रेपो रेट में 125 बेसिस पॉइंट (bps) की कटौती हो चुकी थी. जब उनसे पूछा गया कि क्या ब्याज दरों में और कटौती की गुंजाइश है तो मल्होत्रा ने संकेत दिया था कि नीतिगत दरें ऊंची रहने के बजाय कम रहने की संभावना है.
7 अक्टूबर को उन्हीं ने फरवरी 2023 के बाद रेपो रेट में पहली बढ़ोतरी का ऐलान किया. RBI की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने सर्वसम्मति से रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.5 फीसदी करने का फैसला किया. साथ ही अपना रुख ‘तटस्थ’ से बदलकर ‘संतुलित सख्ती’ कर दिया. मल्होत्रा ने कहा कि निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की कोई गुंजाइश नहीं है और अगला कदम सिर्फ दर बढ़ाने या रोकने का हो सकता है.
इन दोनों घटनाओं के बीच का फासला इस साल की पूरी कहानी है. इस दौरान एक युद्ध हुआ. 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों के बाद ऐसा संघर्ष शुरू हुआ जिसने प्रभावी रूप से होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 88 फीसदी आयात करता है और इसमें से ज्यादातर तेल इसी रास्ते से आता है.

एक दिन पहले 78 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा ब्रेंट क्रूड अप्रैल के आखिर तक 125 डॉलर के पार पहुंच गया. अप्रैल में संघर्षविराम और 17 जून को अमेरिका-ईरान के बीच अंतरिम समझौते के बाद जून के अंत तक इसकी कीमत घटकर 73 डॉलर हो गई. फिर अगस्त के आखिर में दोबारा संघर्ष शुरू हुआ और सितंबर की शुरुआत में ब्रेंट 96 डॉलर के पार पहुंच गया.
इस पूरे दौर में रुपया एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा रहा है. संघर्ष शुरू होने के बाद से इसमें करीब 6 फीसदी की गिरावट आई है. 7 अक्टूबर को RBI के फैसले की सुबह रुपया एक डॉलर के मुकाबले 96.54 पर कारोबार कर रहा था जो उसके अब तक के सबसे निचले स्तर से ज्यादा दूर नहीं है.
25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की बाजार को पहले से उम्मीद थी. लेकिन RBI के रुख में बदलाव का अनुमान बाजार ने नहीं लगाया था. ऐलान के बाद 10 साल की बेंचमार्क बॉन्ड यील्ड छह बेसिस पॉइंट बढ़ गई. कोटक महिंद्रा बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री उपासना भारद्वाज ने RBI के रुख में बदलाव को चौंकाने वाला बताया और आगे 25-50 बेसिस पॉइंट की और सख्ती का अनुमान लगाया.
DBS बैंक की वरिष्ठ अर्थशास्त्री और कार्यकारी निदेशक राधिका राव के मुताबिक, जोखिम और बढ़ने से पहले RBI ने महंगाई को लेकर बाजार का भरोसा बनाए रखने की कोशिश के तहत यह कदम उठाया.
इस मौद्रिक नीति में सबसे अहम शब्द ‘संतुलित सख्ती’ है. यह ब्याज दरों में लगातार बढ़ोतरी के दौर की घोषणा नहीं है. यह इस बात का ऐलान है कि दरों में कटौती का दौर खत्म हो गया है.
यह समझने के लिए कि RBI ने दिसंबर का इंतजार करने के बजाय अभी कदम क्यों उठाया, उसके अपने अनुमानों को देखना होगा. जून में बढ़ने से पहले उपभोक्ता महंगाई लगातार 16 महीनों तक 4 फीसदी के लक्ष्य से नीचे रही थी. इसके बाद जुलाई में यह बढ़कर 4.5 फीसदी और अगस्त में 4.8 फीसदी हो गई. खाद्य और ईंधन की कीमतों को छोड़कर देखी जाने वाली मूल महंगाई भी बढ़कर 4.2 फीसदी हो गई.

केंद्रीय बैंक ने पूरे साल की महंगाई का अनुमान 5 फीसदी से बढ़ाकर 5.2 फीसदी कर दिया है. लेकिन औसत से ज्यादा अहम तिमाही अनुमान है: जुलाई-सितंबर में 4.9 फीसदी, अक्टूबर-दिसंबर में 6 फीसदी और जनवरी-मार्च में 5.7 फीसदी.
6 फीसदी RBI की महंगाई सहनशीलता सीमा का ऊपरी स्तर है जिसके लिए वह कानून से बंधा है. कोई केंद्रीय बैंक ऐसा अनुमान जारी नहीं कर सकता जिसमें महंगाई उसकी अपनी तय ऊपरी सीमा तक पहुंच रही हो और फिर भी अपना रुख तटस्थ रखे क्योंकि इससे उसके तय लक्ष्य को हासिल करने की मंशा पर सवाल उठेंगे.
इस नजरिए से देखें तो रुख में बदलाव कुछ हद तक खुद को बचाने का कदम भी है. अगर दिसंबर तिमाही में महंगाई 6 फीसदी तक पहुंचती है तो RBI कह सकेगा कि उसने पहले ही कदम उठा लिया था.
गणित भी बताता है कि ज्यादातर अर्थशास्त्री ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की उम्मीद क्यों कर रहे हैं. रेपो रेट 5.5 फीसदी है और आने वाली तिमाहियों में महंगाई का अनुमान 5.2 से 6 फीसदी के बीच है. ऐसे में अनुमानित महंगाई को ध्यान में रखने पर वास्तविक नीतिगत दर करीब शून्य रह जाती है. RBI के पिछले अनुमानों में तटस्थ वास्तविक दर करीब 0.8 से 1 फीसदी बताई गई है. इस अंतर को पूरी तरह नहीं बल्कि आंशिक रूप से भी भरने के लिए रेपो रेट को 5.75 या 6 फीसदी तक ले जाना होगा.
बाजार में अब अंतिम रेपो रेट का अनुमान भी इसी स्तर के आसपास है. फैसले के बाद जिन विश्लेषकों से राय ली गई उनमें ज्यादातर ने दिसंबर की बैठक में 25 बेसिस पॉइंट की एक और बढ़ोतरी की उम्मीद जताई.
हालांकि MPC के सदस्य आगे के रास्ते को लेकर एकमत नहीं हैं. रेपो रेट बढ़ाने के फैसले पर वोट 6-0 रहा. लेकिन रुख बदलने पर वोट 4-2 रहा. दो सदस्य तेल की कीमतों में उछाल के जोखिम से बचने के लिए ब्याज दर बढ़ाने को तैयार थे लेकिन उन्होंने सख्ती के रुख का समर्थन नहीं किया. बैठक के विवरण दो हफ्ते में जारी होंगे. तभी पता चलेगा कि असहमति जताने वाले सदस्य कौन थे और उनकी वजह क्या थी.

तब तक यह बंटवारा सबसे स्पष्ट संकेत है कि ‘संतुलित’ शब्द सोच-समझकर चुना गया है. MPC के बहुमत को आगे और सख्ती की संभावना दिख रही है जबकि अल्पमत का मानना है कि आज की बढ़ोतरी पर्याप्त है. दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि अक्टूबर के फैसले के बजाय दिसंबर के आंकड़े तय करेंगे कि आगे क्या होगा.
इस फैसले को सिर्फ घरेलू महंगाई के नजरिए से नहीं देखा जा सकता. यह कुछ हद तक मुद्रा से जुड़ा फैसला भी है. 2026 में विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजारों से 2 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा निकाल चुके हैं.
मार्च की शुरुआत में रुपया एक डॉलर के मुकाबले 92 के पार गया, उसी महीने के अंत तक 95 और मई में 96 के पार पहुंच गया. हर बार कच्चे तेल की कीमतों में नई तेजी के साथ रुपए पर दबाव बढ़ा. यह एक-दूसरे को बढ़ाने वाला चक्र है: महंगा कच्चा तेल आयात बिल बढ़ाता है, जिससे रुपया कमजोर होता है. इससे आयात किए जाने वाले हर बैरल की रुपए में लागत और बढ़ जाती है. इसका असर फिर महंगाई पर पड़ता है और RBI पर दबाव बढ़ता है.
रेपो रेट बढ़ाने से इस चक्र पर दो तरह से असर पड़ता है. पहला, इससे भारत और अमेरिका की ब्याज दरों के बीच ब्याज दरों का अंतर कुछ हद तक फिर बढ़ जाता है. यह अंतर तब कम हुआ था जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने 16 सितंबर को अपनी दरें बढ़ाई थीं और साल खत्म होने से पहले एक और बढ़ोतरी का संकेत दिया था.
इससे उन निवेशकों के लिए रुपए में निवेश आकर्षक बना रहता है जिनकी पूंजी पहले ही देश से बाहर जा रही है. दूसरा, इससे RBI की मंशा का संकेत मिलता है. इसका उदाहरण पहले भी मिल चुका है. अगस्त 2022 में यूरोप में युद्ध के कारण तेल की कीमतों में उछाल के बाद RBI ने ब्याज दरों में 50 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की थी.
तब भारतीय स्टेट बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री ने इस कदम को रुपए के बचाव के लिए ब्याज दरों के इस्तेमाल के तौर पर देखा था. 7 अक्टूबर की बढ़ोतरी का मकसद भी कुछ ऐसा ही है हालांकि इस बार बढ़ोतरी छोटी है.
इस छोटी बढ़ोतरी की अपनी अहमियत है. RBI पूरे साल अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर रुपए की गिरावट को धीमा करता रहा है. साथ ही उसने नीतिगत दर बढ़ाने के बावजूद बाजार में नकदी की स्थिति को बहुत ज्यादा सख्त नहीं होने दिया.
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक इसका मतलब है कि पैसे की कीमत यानी ब्याज दर को ऊंचा रखा जा रहा है लेकिन उसकी उपलब्धता बनी हुई है ताकि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में कर्ज का प्रवाह जारी रहे. इससे RBI के पास आगे इस्तेमाल करने के लिए गुंजाइश भी बची रहती है. अभी बड़ी दर बढ़ोतरी करने से वह गुंजाइश कम हो जाएगी, जिसकी जरूरत होर्मुज स्ट्रेट फिर बंद होने पर पड़ सकती है.
ऐसा हो भी सकता है. 5.2 फीसदी महंगाई के अनुमान में कच्चे तेल की जो कीमत मानी गई है वह इस अनुमान का सबसे कमजोर हिस्सा है क्योंकि इस साल हर तिमाही में यह अनुमान गलत साबित हुआ है. तेल कभी ऊपर रहा तो कभी नीचे.
अप्रैल के आखिर से जून के आखिर के बीच सिर्फ कूटनीतिक प्रयासों के कारण ब्रेंट की कीमत 50 डॉलर से ज्यादा गिर गई थी. फिर हमले दोबारा शुरू होने पर इसमें तेज उछाल आया.
गोल्डमैन सैक्स ने चेतावनी दी है कि होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक बंद रहा तो ब्रेंट की कीमत पूरे साल 100 डॉलर से ऊपर रह सकती है. वहीं, हालात स्थिर होने पर उसने कीमत करीब 80 डॉलर रहने का अनुमान लगाया है.
RBI को ऐसी स्थिति में नीतिगत फैसले लेने पड़ रहे हैं जिस बारे में वह कुछ हफ्तों से ज्यादा समय के लिए भरोसे के साथ अनुमान नहीं लगा सकता. यही वह असली वजह है जिसके चलते गवर्नर मल्होत्रा ने सिर्फ ब्याज दर बढ़ाने या उसे रोकने की बात कही है.
भारत की स्थिति इस मामले में अलग है कि इस झटके का सामना करने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में वह सबसे ज्यादा प्रभावित भी है और उसके पास सबसे बेहतर सुरक्षा कवच भी है. यह जोखिम ढांचागत है.
कोई दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था ऐसी नहीं है जो होर्मुज से होकर आने वाले आयातित कच्चे तेल पर लगभग पूरी तरह निर्भर हो, चालू खाते में घाटा हो और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश के प्रति इतनी संवेदनशील हो.
अमेरिकी फेडरल रिजर्व, यूरोपीय केंद्रीय बैंक और बैंक ऑफ जापान, सभी ऊर्जा की कीमतों से पैदा हुई महंगाई से जूझ रहे हैं. लेकिन इनमें से किसी को भी इसके साथ भुगतान संतुलन से जुड़ी समस्या का सामना नहीं करना पड़ रहा है.
भारत की सुरक्षा उसकी आर्थिक विकास दर है. अप्रैल-जून तिमाही में अर्थव्यवस्था 7.8 फीसदी की दर से बढ़ी जो RBI के अपने अनुमान से काफी ज्यादा है. केंद्रीय बैंक ने पूरे साल की विकास दर का अनुमान भी 6.7 फीसदी से बढ़ाकर 7.1 फीसदी कर दिया है.
अब दूसरी तिमाही में विकास दर 7.2 फीसदी और तीसरी तिमाही में 6.9 फीसदी रहने का अनुमान है. दुनिया की कुछ ही बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के पास इतनी गुंजाइश है कि वे मंदी की स्थिति पैदा किए बिना ब्याज दरों में 50-75 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी झेल सकें.
यूरोप 1 फीसदी से कम की विकास दर के बीच ब्याज दरें बढ़ा रहा है. बैंक ऑफ इंग्लैंड ने सितंबर में 6-3 के वोट से दरें स्थिर रखीं. तीन सदस्य महंगाई के दूसरे दौर के असर को रोकने के लिए बढ़ोतरी चाहते थे. अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने भी सितंबर में 2023 के बाद पहली बार दरें बढ़ाईं. उसने इसके लिए मजबूत अर्थव्यवस्था को दरें बढ़ाने की गुंजाइश बताया और अब वह भारत के साथ-साथ सख्ती की राह पर है.
भारत के सामने चुनौती महंगाई से लड़ने और असाधारण रूप से मजबूत आर्थिक विकास को धीमा करने के बीच संतुलन की है. ये दोनों समान जोखिम नहीं हैं. भारत से सबसे ज्यादा तुलना एशिया की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं से की जा सकती है. दक्षिण कोरिया मजबूत विकास के बीच ब्याज दरें बढ़ा रहा है, लेकिन वहां संपत्ति की कीमतों में तेजी और घरेलू कर्ज का अतिरिक्त बोझ भी है.
वहीं सिंगापुर आयातित महंगाई से निपटने के लिए अपनी मुद्रा को मजबूत होने देता है. भारत निर्यातकों को नुकसान पहुंचाए बिना ऐसा नहीं कर सकता. ब्राजील कई वर्षों तक बहुत ऊंची ब्याज दरों के दौर में रहा, अब दरों में कटौती कर रहा है.
इस तुलना से यह सबक नहीं मिलता कि हर देश को ब्याज दरें बढ़ानी चाहिए. इससे पता चलता है कि हर केंद्रीय बैंक का फैसला उसकी शुरुआती स्थिति पर निर्भर करता है. भारत की शुरुआती स्थिति मध्यम ब्याज दरों, मजबूत विकास और कमजोर मुद्रा की है. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट नहीं आई तो ब्याज दरों में धीरे-धीरे और बढ़ोतरी की संभावना बनी हुई है.
दिसंबर की बैठक तक पहुंचने के तीन रास्ते हैं. अगर होर्मुज की स्थिति सामान्य हो जाती है और ब्रेंट की कीमत धीरे-धीरे 80 डॉलर के करीब लौट आती है तो RBI 5.5 फीसदी पर दर रोक सकता है. सख्ती का रुख बना रहेगा और रुपए में भी कुछ सुधार हो सकता है.
अगर गतिरोध बना रहता है और तेल की कीमत 90 से 105 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहती है तो अर्थशास्त्रियों के बीच मुख्य अनुमान एक और 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी और मुद्रा बाजार में बड़े पैमाने पर दखल का है.
अगर अमेरिका-ईरान संघर्ष और बढ़ता है और ब्रेंट फिर 115 डॉलर या उससे ऊपर पहुंच जाता है तो 2013 और 2022 वाला तरीका फिर अपनाया जा सकता है. इसमें बड़ी दर बढ़ोतरी, मुद्रा से जुड़े कदम और विकास दर के अनुमान में कटौती शामिल होगी.
RBI का फैसला इस जोखिम के असमान असर को ध्यान में रखकर होगा. पहले मामले में दर रोकने से उसे ज्यादा नुकसान नहीं होगा लेकिन तीसरे मामले में जरूरत से कम कदम उठाने पर उसकी विश्वसनीयता को बड़ा नुकसान हो सकता है.
7 अक्टूबर की ब्याज दर बढ़ोतरी का असली महत्व यही है. RBI ने महंगाई के खिलाफ युद्ध की घोषणा नहीं की है. उसने यह संकेत दिया है कि उसकी अर्थव्यवस्था बाहरी झटके का सामना करने के लिए पर्याप्त मजबूत है और उसे इसे नजरअंदाज करने के बजाय इससे निपटना चाहिए. साथ ही रुपए और महंगाई के अनुमान ने उसके सामने कोई आसान विकल्प नहीं छोड़ा था.
ब्याज दरें तेल की कीमतों के झटके को महंगाई की उम्मीदों के झटके और फिर मुद्रा संकट में बदलने से रोक सकती हैं. लेकिन इसे रोकने के लिए एक बार की यह संतुलित बढ़ोतरी पर्याप्त है या नहीं, इसका फैसला मुंबई स्थित RBI मुख्यालय में नहीं बल्कि होर्मुज स्ट्रेट में होगा. और अपने रुख पर 4-2 से बंटा MPC भी यह बात जानता है.

