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अगस्त रहा अब तक का सबसे गर्म महीना, भारत में खेती और पानी पर क्या होगा असर?

इस साल अगस्त का तापमान औद्योगिक क्रांति से पहले के दौर के मुकाबले 1.65°C ज्यादा रहा जिसने ग्लोबल वॉर्मिंग के बढ़ते खतरे को लेकर दुनिया को फिर चेताया है

अल नीनो भी इस बार भीषण गर्मी की वजह बना (सांकेतिक फोटो)
अपडेटेड 17 सितंबर , 2026

लगातार नौ महीने तक दुनिया का औसत तापमान 2015 के पेरिस क्लाइमेट एग्रीमेंट में तय की गई सीमा से नीचे रहा लेकिन इस अगस्त में तापमान एक बार फिर उस सीमा को पार कर गया.

कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (C3S) यूरोपीय संघ के पृथ्वी पर नजर रखने वाले कार्यक्रम का हिस्सा है. इसके मुताबिक, पिछले महीने हवा का औसत तापमान 16.96°C रहा. यह 1991-2020 के औसत तापमान से 0.85°C ज्यादा और 1850-1900 के औसत तापमान से 1.65°C ज्यादा था. 1850-1900 के दौर को औद्योगिक विकास से पहले का समय माना जाता है. नवंबर 2025 के बाद यह पहला महीना था, जब तापमान 1.5°C से ऊपर पहुंचा.

दरअसल, यह अब तक का सबसे गर्म अगस्त रहा. इसका तापमान 2023 और 2024 में दर्ज अगस्त के संयुक्त रिकॉर्ड से भी ज्यादा रहा. पूरे साल के सभी महीनों की तुलना करें तो यह जुलाई 2023 के साथ अब तक का सबसे गर्म महीना भी रहा.

अगर किसी एक महीने का तापमान 1.5°C से ज्यादा हो जाए, तो इससे यह नहीं माना जा सकता कि पेरिस एग्रीमेंट में तय 1.5°C की सीमा पार हो गई है. यह सीमा किसी एक महीने या एक साल के तापमान से तय नहीं होती. इसे 20 साल के औसत तापमान में हुई बढ़ोतरी के आधार पर तय किया जाता है.

हालांकि, विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) साफ कह चुका है कि अगर तापमान बढ़ने का सिलसिला जारी रहा तो आने वाले समय में तापमान 1.5°C की सीमा से कुछ समय के लिए ऊपर जा सकता है.

लेकिन 20 साल का यह औसत अगस्त 2026 जैसे हर महीने के तापमान से मिलकर बनता है. साल 2024 पहला ऐसा कैलेंडर वर्ष था जब तापमान 1.5°C से ऊपर गया. इसके बाद जब भी किसी महीने का तापमान 1.5°C से ऊपर जाता है तो 20 साल का औसत भी बढ़ता है. इससे तापमान के लंबे समय तक 1.5°C से ऊपर रहने की संभावना बढ़ती जाती है.

यूरोप को भी इस बार भयंकर गर्मी से जूझना पड़ा (सांकेतिक तस्वीर)
यूरोप को भी इस बार भयंकर गर्मी से जूझना पड़ा (सांकेतिक तस्वीर)

मई 2025 में जारी अपने अगले 10 साल के अनुमान में WMO ने कहा था कि 2025 से 2029 के बीच कम से कम एक साल ऐसा होने की 70 फीसदी संभावना है जब तापमान 1.5°C से ऊपर रहेगा. अगस्त 2026 में तापमान का 1.5°C से ऊपर जाना इस सीमा को हमेशा के लिए पार करने की संभावना को और करीब ले आता है.

फॉसिल फ्यूल्स को बहुत ज्यादा जलाना अब भी तापमान बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है लेकिन इस महीने तापमान के 1.5°C से ऊपर जाने में इक्वेटोरियल प्रशांत महासागर में मजबूत हो रहा अल नीनो भी जिम्मेदार रहा. C3S के मुताबिक यह अब तक के सबसे मजबूत अल नीनो में से एक हो सकता है.

पश्चिमी यूरोप में इस बार गर्मी का मौसम अब तक का सबसे गर्म रहा. मई से शुरू हुई गर्मी की लहरों के कारण 2003 में बना रिकॉर्ड भी टूट गया. फ्रांस, ब्रिटेन, हंगरी, रोमानिया और सर्बिया में काफी ज्यादा सूखा पड़ा. राइन, डेन्यूब, सदर्न बग और ड्निप्रो नदियों में पानी का बहाव भी बहुत कम हो गया. वहीं, एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में अल नीनो का असर बढ़ने से इंडोनेशिया में हर साल लगने वाली जंगल की आग और तेज हो गई.

भारत में इस बार मानसून की शुरुआत ऐसे समय हुई, जब अल नीनो की संभावना जताई जा रही थी. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अनुमान लगाया था कि इस पूरे मानसून में पिछले कई सालों की औसत बारिश के मुकाबले 90 फीसदी बारिश होगी. साथ ही, औसत से कम बारिश वाला मानसून रहने की 60 फीसदी संभावना जताई गई थी.

जून में सामान्य से 35.4 फीसदी कम बारिश हुई. लेकिन जुलाई में बारिश कुछ बेहतर हुई और 283.3 मिमी बारिश दर्ज की गई, जबकि जुलाई में औसतन 280.5 मिमी बारिश होती है. इससे जून और जुलाई में बारिश की कुल कमी घटकर 13 फीसदी रह गई.

31 जुलाई को IMD ने अगस्त और सितंबर में औसत से कम बारिश होने का अनुमान जताया था. साथ ही, देश के ज्यादातर हिस्सों में अधिकतम तापमान औसत से ज्यादा रहने का अनुमान था. जुलाई की शुरुआत में खरीफ की बुवाई पिछले साल के मुकाबले 20.8 प्रतिशत कम हुई थी. लेकिन महीने के आखिर तक यह कमी घटकर करीब 3 प्रतिशत रह गई.

आईसीआरए के मुताबिक, इस साल खरीफ की बुवाई पिछले साल के मुकाबले 1-2 प्रतिशत कम रह सकती है.

असल में सितंबर का महीना सबसे अहम है. भारत सरकार के मुताबिक, देश में अल नीनो और बारिश का असर सितंबर में सबसे ज्यादा देखने को मिलता है. अगस्त में पड़ी तेज गर्मी, अल नीनो और दुनिया में लगातार बढ़ रहे तापमान का असर अब भारत की खेती और पानी के भंडार पर भी दिखाई देने लगा है.

राज्य सरकारें किसी जिले को 'सूखा प्रभावित' घोषित करने के लिए अक्टूबर तक इंतजार करती हैं लेकिन किसान और रिसर्च इंस्टीट्यूट्स बारिश पर नजर रख रहे हैं, जबकि सरकारी एजेंसियां जलाशयों में पानी का स्तर देख रही हैं. इन आंकड़ों से साफ है कि हालात पहले ही बिगड़ने लगे हैं.

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