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जेन ज़ी को गुस्सैल पीढ़ी कहना कितना सही?

करियर की अनिश्चितता, बढ़ती महंगाई और सूचनाओं की बाढ़ के बीच बड़ी हो रही Gen Z को सिर्फ गुस्सैल पीढ़ी कहना उसकी बेचैनी और बदलाव की चाह को नजरअंदाज करना है

Gen Z कई मामलों में पिछली पीढ़ियों के मुकाबले बिलकुल अलग रुख रखती है (फोटो : AI)
अपडेटेड 10 सितंबर , 2026

Gen Z को गुस्सैल कहकर आप उसकी असली भावना को समझने से चूक सकते हैं. परीक्षा के दबाव, करियर की अनिश्चितता, बढ़ती जीवन-यापन की लागत, जलवायु को लेकर चिंता और लगातार आती सूचनाओं के बीच बड़ी हो रही इस पीढ़ी के लिए जो गुस्सा दिखाई देता है, वह अक्सर कुछ और होता है. शायद यह निराशा, चिंता और अपनी बात सुने जाने की तीव्र इच्छा है?

युवा और पेरेंटिंग कोच रजत सोनी कहते हैं, "गुस्सा Gen Z की प्रमुख भावना नहीं है." उनके मुताबिक, युवा निष्पक्षता और अपने जीवन पर नियंत्रण का एहसास चाहते हैं. जब वर्षों की मेहनत के बावजूद कॉलेज, नौकरी या सुरक्षित भविष्य का कोई साफ रास्ता नहीं मिलता तो उम्मीद टूटने से खीझ पैदा हो सकती है.

सोनी की एक छात्रा ने अपनी मानसिक सेहत की कीमत पर कई साल एडमिशन टेस्ट की तैयारी की. उसने अपनी इस अनिश्चितता को बेहद सरल शब्दों में बताया, "मुझे नहीं पता कि मैं जो कुछ कर रही हूं वह काफी होगा या नहीं." शायद यह वाक्य Gen Z के अनुभव को ‘गुस्सैल पीढ़ी’ के लेबल से कहीं बेहतर तरीके से बयान करता है.

Gen Z ऐसी दुनिया में बड़ी होने वाली पहली पीढ़ी है जो हमेशा इंटरनेट से जुड़ी हुई है. खबरें, राय, संकट और अलग-अलग मुद्दे पूरे दिन उनके फोन पर पहुंचते रहते हैं. 

मानसिक स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन, लैंगिक समानता, असमानता और सामाजिक न्याय को लेकर होने वाली चर्चाओं से उनका सामना कभी-कभार आने वाली खबरों के तौर पर नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी के हिस्से के रूप में होता है. सोनी का मानना है कि लगातार इस तरह की चीजों के संपर्क में रहने से उनकी पहचान की समझ भी बनी है.

Gen Z वर्कप्लेस के माहौल पर खुलकर सवाल उठाती है (सांकेतिक तस्वीर)
Gen Z वर्कप्लेस के माहौल पर खुलकर सवाल उठाती है (सांकेतिक तस्वीर)

वर्क प्लेस पर लोगों के कल्याण, मानसिक स्वास्थ्य और नेतृत्व के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन अंतर्मन की संस्थापक और प्रबंध निदेशक सीमा रेखा भी ऐसा ही बदलाव देखती हैं. 

रेखा कहना है कि Gen Z के लोग ‘चीजें ऐसी ही होती हैं’ को स्वीकार करने के लिए पहले की तुलना में कम तैयार हैं और ज्यादा संभावना है कि वे पूछें, "यह बेहतर क्यों नहीं हो सकता?" उनके मुताबिक जो चीज गुस्सा दिखाई दे सकती है, वह अक्सर पारदर्शिता, निष्पक्षता और सार्थक प्रगति की मांग होती है.

पहली की पीढ़ियों के लिए युवा आंदोलन अक्सर कॉलेज परिसरों, संगठनों और प्रत्यक्ष रूप से जुड़े समुदायों के आसपास खड़े होते थे. Gen Z किसी पोस्ट, रील, हैशटैग या ऑनलाइन अभियान के जरिए लोगों को जोड़ सकती है. 

सोशल मीडिया ने भागीदारी को आसान और तेज कर दिया है. वे ऐसे लोगों को खोज सकते हैं जो उनकी चिंताओं को साझा करते हों, विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं और किसी संगठन या संस्थान के उन्हें मंच देने का इंतजार किए बिना मुद्दों की आवाज को ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकते हैं.

लेकिन इसकी एक कीमत भी है. जो प्लेटफॉर्म लोगों को जोड़ते हैं, वही थकान भी पैदा कर सकते हैं. भावनाएं ऑनलाइन तेजी से फैलती हैं. उम्मीद, आक्रोश और डर कुछ ही मिनटों में अलग-अलग समुदायों में फैल सकते हैं. 

Gen Z इंटरनेट के साथ बड़ी होने वाली पहली पीढ़ी है (सांकेतिक तस्वीर)
Gen Z इंटरनेट के साथ बड़ी होने वाली पहली पीढ़ी है (सांकेतिक तस्वीर)

सोनी इसे भावनात्मक संक्रमण कहते हैं. यानी सोशल मीडिया की भावनाओं को बढ़ाने की क्षमता. यह कभी लोगों को सामूहिक कार्रवाई के लिए प्रेरित कर सकता है, लेकिन संदर्भ गायब हो जाने पर ध्रुवीकरण भी बढ़ा सकता है.

रेखा एक और समस्या की ओर इशारा करती हैं- सूचनाओं की बाढ़. डिजिटल स्तर पर लगातार किसी मुद्दे के समर्थन में सक्रिय रहने से युवाओं को ऐसा लग सकता है कि उन्हें हमेशा प्रतिक्रिया देनी है, टिप्पणी करनी है, साझा करना है या किसी पक्ष में खड़ा होना है. इसका नतीजा भावनात्मक थकान हो सकता है.

Gen Z को "हर बात पर जल्दी बुरा मान जाने वाली" पीढ़ी कहना भी एक आसान तरीका है. दोनों विशेषज्ञ इस बात पर सवाल उठाते हैं. Gen Z समावेश, गरिमा, सम्मान और जवाबदेही को पहले की तुलना में ज्यादा महत्व देते हुए बड़ी हुई है. 

यह पीढ़ी उन शब्दों, वर्कप्लेस के व्यवहार और शक्ति समीकरणों पर सवाल उठाने की ज्यादा संभावना रखती है जिन्हें पहले की पीढ़ियां बिना चर्चा के स्वीकार कर सकती थीं.

इसका मतलब यह नहीं है कि हर प्रतिक्रिया उचित ही होती है. सोनी मानते हैं कि युवा कभी-कभी तुरंत प्रतिक्रिया दे सकते हैं या जटिल मुद्दों को सिर्फ सही-गलत के खांचे में देख सकते हैं. लेकिन उन्हें जरूरत से ज्यादा संवेदनशील कहकर खारिज करना बड़े सांस्कृतिक बदलाव को नजरअंदाज करना है. 

रेखा के मुताबिक, सवाल उठाने का यह रवैया पहले से ही वर्कप्लेस को प्रभावित कर रहा है खासकर मानसिक सुरक्षा, सहानुभूति और जिम्मेदार नेतृत्व के मामले में.

Gen Z का विरोधाभास यह है कि जो पीढ़ी सबसे ज्यादा मुखर दिखाई देती है वह गहराई से थकी हुई भी हो सकती है. उनसे प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी करने, करियर बनाने, AI बेस्ड इकोनॉमी में रोजगार के योग्य बने रहने, आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने, सामाजिक जीवन बनाए रखने और लगातार खुद को बेहतर बनाने की उम्मीद की जाती है. 

इसी दौरान उनके फोन उन्हें हर दिन युद्धों, जलवायु आपदाओं, आर्थिक अनिश्चितता और सामाजिक अन्याय की याद दिलाते रहते हैं.

रेखा चेतावनी देती हैं कि भावनात्मक रूप से परेशान करने वाली खबरों के लगातार संपर्क में रहने से सहानुभूति की थकान और बर्नआउट हो सकता है. तो क्या Gen Z की सक्रियता मुख्य रूप से ऑनलाइन ही रहेगी? जरूरी नहीं. 

दोनों विशेषज्ञों को इस पीढ़ी के कारोबार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, उद्यमिता और नागरिक समाज में नेतृत्व की भूमिकाओं में आने के साथ कहीं बड़े प्रभाव की संभावना दिखाई देती है.

लेकिन सिर्फ जागरूकता पर्याप्त नहीं होगी. असली परीक्षा यह होगी कि ऑनलाइन बातचीत सामुदायिक भागीदारी, रचनात्मक संवाद और लगातार जारी कार्रवाई में बदलती है या नहीं. सोनी के लिए सवाल यह है कि क्या डिजिटल जागरूकता सार्थक नेतृत्व और लंबे समय तक जुड़ाव में बदल सकती है. 

रेखा का मानना है कि अगर Gen Z के सहानुभूति, समावेश और लोगों की भलाई से जुड़े मूल्यों के साथ सहयोग, मुश्किल हालात से उबरने की क्षमता और लगातार कार्रवाई जुड़ती है तो यह पीढ़ी लंबे समय तक याद रहने वाली विरासत छोड़ सकती है.

शायद इसलिए Gen Z को समझने का बेहतर तरीका यह है कि उसे गुस्सैल पीढ़ी के बजाय ऐसी पीढ़ी माना जाए जो चुप रहने को तैयार नहीं है. चुनौती यह है कि उनकी निराशा उन पर हावी न हो और उनकी आवाज उस बदलाव की शुरुआत बने जिसकी वे मांग कर रहे हैं.

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