scorecardresearch
डार्क मोड

पूर्व चुनाव आयुक्त क्यों चाहते हैं कि चुनाव आयोग हर सवाल का जवाब दे?

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में पारदर्शिता, भरोसे और 'खामियों' का मुद्दा इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ में चुनाव आयोग को लेकर हुई बहस के केंद्र में रहा.

ओम प्रकाश रावत (बाएं) और अशोक लवासा
अपडेटेड 1 अक्टूबर , 2026

चुनाव आयोग (EC) की विश्वसनीयता, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद और चुनाव आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया की स्वतंत्रता पर इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ के एक सत्र में गंभीर सवाल उठे. 

29 सितंबर को कोच्चि में आयोजित इस सत्र में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत और पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा शामिल हुए थे.

‘क्या चुनाव आयोग कठघरे में है: क्या भारत के चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं?’ नाम के इस सत्र में दोनों विशेषज्ञों से पूछा गया कि क्या मौजूदा चुनाव आयोग पर भरोसा किया जा सकता है. रावत ने किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सावधानी बरतने की बात कही. 

रावत के मुताबिक पिछले 75 वर्षों में चुनाव आयोग ने स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव कराने के मामले में दुनिया के सामने एक मानक स्थापित किया है. हालांकि उन्होंने माना कि इस संस्था को लेकर विवाद चल रहा है. उनका कहना था कि फैसला सुनाने से पहले तथ्यों के सामने आने का इंतजार करना चाहिए.

लवासा ने मौजूदा स्थिति पर ज्यादा सीधे तौर पर बात की. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को लेकर भरोसे की कमी पैदा हुई है और इस धारणा को बनाने में संस्था का भी योगदान रहा है. साथ ही उन्होंने चुनाव आयोग की संस्था को उसके तीनों आयुक्तों से जोड़कर देखने से सावधान किया. 

लवासा ने कहा कि भारत के चुनावी लोकतंत्र के लिए चुनाव आयोग जरूरी है और कुछ लोगों के किसी भी तरह के काम की वजह से पूरी संस्था को खारिज नहीं किया जाना चाहिए.

बहस का एक बड़ा हिस्सा SIR पर केंद्रित रहा. लवासा ने इसे चुनाव आयोग के इतिहास के सबसे विवादित फैसलों में से एक बताया. उन्होंने इस पूरी कवायद की बुनियादी संरचना पर सवाल उठाया. 

उनका तर्क था कि ऐसा लगता है कि इसमें पात्रता साबित करने की जिम्मेदारी चुनाव मशीनरी से हटाकर मतदाताओं पर डाल दी गई है. उन्होंने कहा कि मतदाता बनने के लिए संविधान में तय मानदंड हैं- नागरिकता, कम से कम 18 साल की उम्र और कानून के तहत अयोग्य न होना.

रावत ने चुनाव मशीनरी के कामकाज को लेकर अलग नजरिया रखा. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग सिर्फ तीन आयुक्तों तक सीमित नहीं है बल्कि उसके साथ जमीनी स्तर पर काम करने वाला एक बड़ा संगठन है. 

बिहार में अपने अनुभव का हवाला देते हुए रावत ने कहा कि स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने मतदाताओं की मदद के लिए पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान शिविर लगाए थे. उनका तर्क था कि 1.5 करोड़ चुनाव कर्मचारियों को ऊपर बैठे चुनाव आयुक्तों के इशारे पर नियंत्रित नहीं किया जा सकता.

हालांकि रावत और लवासा दोनों ने ज्यादा पारदर्शिता की जरूरत पर सहमति जताई. रावत ने कहा कि मौजूदा आयुक्तों को सिर्फ मीडिया बयान जारी करने के बजाय खुलकर सामने आकर सवालों के जवाब देने चाहिए. लवासा ने भी तथ्यों का पूरा खुलासा करने की मांग की. उनका कहना था कि अगर कोई गलती हुई है तो उसे भी स्वीकार किया जाना चाहिए.

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का मुद्दा भी चर्चा में आया. 2023 के कानून में चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की जगह प्रधानमंत्री की ओर से नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI चयन समिति का हिस्सा होते थे.

रावत ने कहा कि पहले की व्यवस्था में भी कार्यपालिका की ओर से नियुक्तियां होने के बावजूद विश्वसनीय चुनाव हुए हैं और संस्थागत व्यवस्थाएं समय के साथ बदल सकती हैं. हालांकि लवासा ने CJI को हटाने के फैसले के तर्क पर सवाल उठाया. उनका कहना था कि नई व्यवस्था से कार्यपालिका दबदबे की धारणा बन सकती है. उन्होंने कहा कि इससे चुनाव आयोग में नियुक्त लोगों पर अनावश्यक दबाव पड़ता है.

इस सवाल पर कि क्या चुनाव आयोग के भीतर असहमति किसी के इस्तीफे की वजह बननी चाहिए, लवासा ने कहा कि हर संस्था में असहमति की जगह होनी चाहिए. असहमति रखने वालों को हटाने से व्यवस्था कमजोर होगी.

पार्टियों के चुनाव चिह्न को लेकर विवादों पर फैसला करने में हो रही देरी पर भी चर्चा हुई. दोनों ने ज्यादा पारदर्शिता का समर्थन किया. हालांकि रावत ने कहा कि तय समयसीमा लागू करना मुश्किल हो सकता है क्योंकि कुछ मामलों में बड़ी संख्या में दस्तावेज और हलफनामे होते हैं.

आखिर में चर्चा फिर भरोसे के मुद्दे पर लौट आई. रावत के मुताबिक, SIR को लेकर चुनाव आयोग पर उठे सवालों पर निष्कर्ष निकालने से पहले समय और तथ्यों का इंतजार करना चाहिए. वहीं लवासा के मुताबिक पारदर्शिता और पूरी जानकारी सार्वजनिक करना उस संस्था पर भरोसा बहाल करने के लिए जरूरी है जो भारत के चुनावी लोकतंत्र के केंद्र में है.

सत्र की प्रमुख बातें

ओम प्रकाश रावत :

  • "मैं कहूंगा कि कुछ समय इंतजार करते हैं और फिर चुनाव आयोग के कामकाज और लगाए जा रहे आरोपों पर कोई निष्कर्ष निकालते हैं."
  • "वे ऐसा नहीं कर सकते. अगर वे ऐसा करना भी चाहें तो चुनावी प्रक्रिया में हेरफेर नहीं कर सकते. चुनाव मशीनरी में इतने लोग शामिल होते हैं कि ऐसा करना संभव नहीं है."
  • "अगर वे प्रेस नोट के जरिए नहीं बल्कि खुलकर सामने आकर सवालों के जवाब दें तो कोई समस्या नहीं होगी. सब कुछ साफ हो जाएगा."
  • "अगर वे ऐसा करते रहे तो आखिरकार नुकसान चुनाव आयोग का ही होगा क्योंकि इससे संस्था की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचेगा."
  • "पिछले 75 वर्षों में स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव कराने के मामले में चुनाव आयोग ने पूरी दुनिया में एक मानक स्थापित किया है."

अशोक लवासा :

  • "स्पष्ट रूप से भरोसे की कमी का माहौल है. और दुख की बात है कि इस धारणा को बनाने में चुनाव आयोग का भी योगदान रहा है."
  • "चुनाव आयोग के सामने एक ही रास्ता है कि वह लोगों के सामने पूरी जानकारी रखे- हर तथ्य का खुलासा करे. इसमें अपनी कुछ गलतियों को स्वीकार करना भी शामिल हो सकता है."
  • "पूरी SIR प्रक्रिया की बुनियादी अवधारणा ही गलत है. इस कवायद में मतदाता पर यह साबित करने की जिम्मेदारी डाली जा रही है कि वह पात्र है."
  • "इससे पूरी व्यवस्था उलट रही है. नागरिक से यह साबित करने के लिए कहा जा रहा है कि वह मतदाता सूची में शामिल होने के योग्य है, जबकि व्यवस्था को यह तय करना चाहिए कि कौन योग्य नहीं है."
  • "हर व्यवस्था में असहमति रखने वालों के लिए जगह होनी चाहिए. अगर आप यह कहना शुरू कर दें कि सभी असहमत लोगों को व्यवस्था से बाहर हो जाना चाहिए तो इससे अंत में व्यवस्था ही कमजोर होगी."
     
ADVERTISEMENT
Advertisement