हर साल लाखों अभ्यर्थियों के लिए NEET-UG राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा मेडिकल कॉलेज और बेहतर करियर का रास्ता खोलती है. लेकिन जब प्रश्नपत्र लीक होते हैं, सिस्टम ठप पड़ जाता है या नतीजों पर सवाल उठते हैं तो इसकी कीमत बहुत बड़ी होती है.
इससे उस व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होता है जो पहले भारी दबाव में है. सरकार की ओर से गठित नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय टास्कफोर्स के जरिए भारत की परीक्षा व्यवस्था में सुधार की उम्मीद की जा रही है.
ऐसे में चुनौती सिर्फ प्रवेश परीक्षाओं को अधिक सुरक्षित बनाने की नहीं है. परीक्षा के लिए किस तरह पेपर (या जिस तरीके लिए परीक्षा ली जा रही है) तैयार होते हैं, परीक्षा आयोजित कैसे होती है और मूल्यांकन किस तरह होता है, इस पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है. इसलिए परीक्षा सुधार के लिए लिहाज से इन पांच अहम पहलुओं को ध्यान में रखना होगा :
शुरुआत से अंत तक डिजिटल सुरक्षा
परीक्षा की सुरक्षा प्रश्नपत्र तैयार होने के समय से ही शुरू होनी चाहिए. प्रश्नपत्र किसी भी चरण में लीक हो सकता है- प्रश्नपत्र तैयार करने, मॉडरेशन, भंडारण, छपाई, भेजने या उस तक पहुंच के दौरान. द एसोसिएशन ऑफ इंटरनेशनल स्कूल्स ऑफ इंडिया (TAISI) के अध्यक्ष सैयद सुल्तान अहमद कहते हैं, "इसलिए पूरी प्रक्रिया में एन्क्रिप्शन, सीमित पहुंच, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, तय समय पर प्रश्नपत्र खोलने और किसने कब और किस चीज तक पहुंच बनाई, इसका स्पष्ट रिकॉर्ड होना चाहिए."
हालांकि सिर्फ तकनीक से समस्या का समाधान नहीं होगा. सुरक्षित व्यवस्था के लिए प्रशिक्षित लोगों, मजबूत प्रक्रियाओं और स्पष्ट जवाबदेही की भी जरूरत है. अहमद कहते हैं, "लक्ष्य किसी कमजोर व्यवस्था को डिजिटल बनाना नहीं होना चाहिए बल्कि उसे इस तरह नए सिरे से तैयार करना होना चाहिए कि कोई व्यक्ति, एजेंसी या वेंडर व्यवस्था की विफलता की एकमात्र वजह न बन सके."
परीक्षा से आगे की क्षमता
टास्कफोर्स को पूरी व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए. इसमें प्रश्नपत्र तैयार करना, परीक्षा केंद्रों की मान्यता, कर्मचारियों का चयन, वेंडर का मैनेजमेंट, डेटा सुरक्षा, स्वतंत्र ऑडिट और किसी गड़बड़ी की स्थिति में जवाबदेही शामिल है.
अहमद कहते हैं, "लेकिन हमें इससे भी बुनियादी सवाल पूछना चाहिए. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हम परीक्षा कैसे लेते हैं बल्कि यह भी है कि हम परीक्षा में क्या जांचते हैं. किसी छात्र का भविष्य एक ही महत्वपूर्ण परीक्षा पर निर्भर कर देना सीखने की क्षमता को परखने का पुराना और सीमित तरीका है."
ऐसी व्यवस्था में समझ, इस्तेमाल, रचनात्मकता या क्षमता से ज्यादा परीक्षा की तैयारी को महत्व मिलता है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में पहले ही योग्यता आधारित मूल्यांकन की सिफारिश की जा चुकी है. अब इसे बड़े पैमाने पर लागू करने की जरूरत है. पोर्टफोलियो, प्रोजेक्ट, कक्षा में किया गया काम, प्रैक्टिकल एप्लीकेशन और पूरे साल की पढ़ाई को अंतिम मूल्यांकन में शामिल किया जाना चाहिए.
परीक्षा महत्वपूर्ण बनी रह सकती है लेकिन यह किसी छात्र की क्षमता जांचने का एकमात्र प्रमाण नहीं होनी चाहिए. तकनीक परीक्षा व्यवस्था को मजबूत कर सकती है. लेकिन छात्रों ने वास्तव में क्या सीखा है, यह इसे समझने के अधिक निष्पक्ष और सार्थक तरीके की जगह नहीं ले सकती.
पारदर्शी परीक्षाएं
छात्रों को केवल भरोसे के आधार पर परीक्षा के नतीजे स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए. तय समयसीमा के भीतर प्रारंभिक आन्सर शीट जारी की जानी चाहिए और आपत्ति दर्ज कराने की निष्पक्ष प्रक्रिया होनी चाहिए.
अंतिम फैसलों, अंक देने के तरीकों और नॉर्मलाइजेशन की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से समझाया जाना चाहिए. अहमद कहते हैं, "हर जरूरी फैसले का ऐसा रिकॉर्ड होना चाहिए, जिसका ऑडिट किया जा सके. शिकायतों के लिए तय समयसीमा, स्थिति की जानकारी, शिकायत को आगे बढ़ाने के माध्यम और स्वतंत्र अपील की प्रक्रिया होनी चाहिए."
पारदर्शिता संस्थानों को कमजोर नहीं करती. यह गलतियों को सुधारती है, अटकलों को कम करती है और लोगों का भरोसा मजबूत करती है.
राष्ट्रीय मानकों का ढांचा
भारत को सभी महत्वपूर्ण परीक्षाओं के लिए साझा न्यूनतम मानकों की जरूरत है. अलग-अलग एजेंसियां अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल कर सकती हैं, लेकिन सुरक्षा, निष्पक्षता, पहुंच, अभ्यर्थियों की प्राइवेसी, वेंडर मैनेजमेंट, ऑडिट और शिकायत निपटारे के मानकों में अंतर नहीं होना चाहिए.
अहमद सुझाव देते हैं, "ऐसा ढांचा परीक्षा एजेंसियों के लिए एक तरह की प्रमाणन व्यवस्था होना चाहिए. राष्ट्रीय महत्व की परीक्षा आयोजित करने से पहले किसी एजेंसी को यह साबित करना चाहिए कि उसके पास सही व्यवस्था, प्रशिक्षित लोग और जरूरी सुरक्षा उपाय मौजूद हैं."
स्कूलों से नियमित रूप से कड़े मानकों को पूरा करने की उम्मीद की जाती है. ऐसे में उन परीक्षा संस्थाओं को भी कम से कम उतने ही मजबूत मानकों के तहत रखा जाना चाहिए जो लाखों छात्रों के भविष्य को प्रभावित करती हैं.
साइबर हमलों को रोकना
व्यवस्था तैयार करते समय यह मानकर चलना चाहिए कि उसकी सुरक्षा भेदने की कोशिशें होंगी. इसलिए साइबर सुरक्षा लगातार मजबूत बनाए रखनी चाहिए. इसमें नियमित परीक्षण, रियल-टाइम निगरानी, एन्क्रिप्टेड डेटा, सुरक्षित बैकअप और किसी घटना से निपटने की स्पष्ट प्रक्रिया शामिल होनी चाहिए.
अंदर से होने वाले खतरों पर भी उतना ही ध्यान देना जरूरी है. पहुंच पूरी तरह जरूरत के आधार पर होनी चाहिए, संवेदनशील कामों के लिए एक से अधिक लोगों की मंजूरी जरूरी होनी चाहिए और गोपनीय सामग्री के साथ की गई हर गतिविधि का पता लगाया जा सके, इसकी व्यवस्था होनी चाहिए.
अहमद कहते हैं, "परीक्षा संस्थाओं को वैकल्पिक प्रश्नपत्र, बैकअप ढांचा, संकट से निपटने वाली टीमें और कर्मचारियों व वेंडर के लिए संदिग्ध गतिविधियों की सूचना देने के सुरक्षित माध्यम भी तैयार रखने चाहिए."
एक मजबूत परीक्षा व्यवस्था वह नहीं है, जिसमें कभी कोई खतरा पैदा ही न हो. मजबूत व्यवस्था वह है जो खतरे का समय रहते पता लगाए उसे तेजी से नियंत्रित करे और छात्रों को उसकी कीमत न चुकानी पड़े.

