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बेरोजगारी और बढ़ेगी! जीडीपी के नए आंकड़ों से क्यों बजी खतरे घंटी?

जीडीपी ग्रोथ के ये अनुमानित आंकड़े वित्त वर्ष 2025-26 के लिए जारी किए गए हैं

देश में पहले से ही बेरोजगारी दर बेतहाशा बढ़ी हुई है
देश में पहले से ही बेरोजगारी दर बेतहाशा बढ़ी हुई है
अपडेटेड 9 जनवरी , 2025

वित्त वर्ष 2025 के लिए जीडीपी के पहले आंकड़े मोदी सरकार के लिए उत्साहजनक नहीं दिख रहे. आरबीआई के जीडीपी के 7 प्रतिशत वृद्धि दर के अनुमान से भी नीचे केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने 6.4 प्रतिशत वृद्धि दर की बात कही है. पहले से ही बेतहाशा बढ़ती बेरोजगारी दर का आरोप झेल रही नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए जीडीपी के ये आंकड़े बिन मौसम बरसात बनकर आए हैं.

यह इसलिए क्योंकि बढ़ती बेरोजगारी से मुकाबला करने के लिए जीडीपी ग्रोथ रेट का लगातार बढ़ना बहुत जरूरी है, क्योंकि तब ही रोजगार बढ़ने की संभावना होती है. ऐसे में दिल्ली में 5 फरवरी को होने वाले चुनावों से पहले 1 फरवरी को पेश किए जाने वाले बजट में सरकार की कोशिश रहेगी कि ऐसे कदम उठाए जाएं जिससे अच्छी जीडीपी ग्रोथ रेट सुनिश्चित हो सके और ज्यादा से ज्यादा नौकरियां देश में उपलब्ध हों.

सांख्यिकी मंत्रालय के आंकड़े वित्त वर्ष 2024 के अनंतिम अनुमान (प्रोविजिनल एस्टीमेट) के आंकड़ों से भी कम हैं जिसमें जीडीपी ग्रोथ रेट 8.2 प्रतिशत बताई गई थी. इंडिया टुडे के वरिष्ठ पत्रकार एमजी अरुण के मुताबिक, यह मंदी दूसरी तिमाही में तेज गिरावट, सरकारी खर्च में कमी, उच्च ब्याज दरों और सख्त ऋण नियमों के कारण है.

भारत फिलहाल दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती और पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. अनुमान है कि भारतीय अर्थव्यवस्था 2027 तक अमेरिका और चीन के बाद तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी. लेकिन अब इस धीमी वृद्धि दर की वजह से बहुत मुमकिन है कि देश को उस मुकाम तक पहुंचने में अधिक समय लगेगा.

एमजी अरुण के मुताबिक, जीडीपी के हालिया आंकड़े चौंकाते नहीं हैं. इस वित्त वर्ष (2024) की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर 2024) ने पहले ही पर्याप्त संकेत दे दिए थे. दूसरी तिमाही में भारत की जीडीपी ग्रोथ 5.4 प्रतिशत रही थी, जो पहली तिमाही के 6.7 प्रतिशत से कम है और पिछले वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के 8.1 प्रतिशत से भी कम है. उसी समय विशेषज्ञों ने कहा था कि यह भारत की पूरे साल की ग्रोथ को उम्मीदों से नीचे ला सकता है.

रिसर्च फाउंडेशन क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी ने इंडिया टुडे को बताया, "दूसरी तिमाही के दौरान सरकार के पूंजीगत खर्च में गिरावट की भरपाई वित्त वर्ष 2024 के बाकी महीनों में भी होने की संभावना नहीं है. यही खर्च महामारी के बाद की रिकवरी की एक बड़ी वजह बनकर उभरा था. अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद प्राइवेट सेक्टर का निवेश सुस्त बना हुआ है, इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि पिछले वित्तीय वर्ष के 9 प्रतिशत से इस वित्तीय वर्ष में निवेश वृद्धि धीमी होकर 6.4 प्रतिशत हो गई."

कैपिटल एक्सपेंडिचर या पूंजीगत खर्च वह धन है जो सरकार की ओर से मशीनरी, उपकरण, भवन, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा आदि के विकास पर खर्च किया जाता है.

शहरी अर्थव्यवस्था के सामने दो संकट साफ़ नजर आते हैं. जहां एक तरफ महंगाई बढ़ती जा रही है तो वहीं दूसरी ओर क्रेडिट ग्रोथ की गति धीमी होती जा रही है. क्रेडिट ग्रोथ का मतलब बैंकों के कुल बकाया कर्ज में वार्षिक प्रतिशत वृद्धि से है. इसमें निरंतर वृद्धि आमतौर पर आर्थिक सुधार का संकेत देती है.

RBI के हालिया डेटा से पता चलता है कि शहरों में उपभोक्ता का विश्वास कम हुआ है और रिटेल क्रेडिट ग्रोथ धीमी हुई है. रिटेल क्रेडिट में छोटे लोन और असुरक्षित ऋण जैसी चीजें आती हैं.

इन सब के बावजूद एक अच्छी बात यह है कि प्राइवेट कंजम्प्शन या निजी खपत स्थिर है और जीडीपी वृद्धि के अनुरूप ही बढ़ रही है. पिछले साल, प्राइवेट कंजम्प्शन भी जीडीपी की आधी दर से बढ़ी.

ग्रामीण खपत भारत की कुल निजी खपत का लगभग 60 प्रतिशत है. मजबूत खरीफ फसल उत्पादन और रबी फसलों की अच्छी पैदावार की संभावना के कारण इसके भी बढ़ने की उम्मीद है. इसके अतिरिक्त, खाद्य पदार्थों की महंगाई घटने से खर्च में वृद्धि होने की उम्मीद है. यह खासकर कम आय वाले परिवारों के लिए फायदेमंद साबित होगा, जो अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करते हैं.

धर्मकीर्ति जोशी बताते हैं, "हमारा अनुमान है कि अगले वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था 6.7 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी, जो कि पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च, कच्चे तेल की कम कीमतों और सामान्य मानसून पर आधारित होगी. इसके बावजूद, नीति निर्माताओं को भू-राजनीतिक और जलवायु जोखिमों के बढ़ने के मद्देनजर सतर्क रहना चाहिए."

बैंक ऑफ बड़ौदा की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में उद्योग में धीमी वृद्धि की आशंका है. इसमें मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर 5.3 प्रतिशत और माइनिंग सेक्टर 2.9 प्रतिशत की दर से बढ़ेगा. हालांकि, बेहतर ग्रामीण मांग और रबी की बुवाई से कृषि में मजबूती से वृद्धि होने की उम्मीद है. हालांकि, भू-राजनीतिक तनाव जैसी वैश्विक आर्थिक चुनौतियां विकास को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन नए वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में भारत की अर्थव्यवस्था के बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है.

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