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परीक्षा सुधार पर पिछली सिफारिशों का क्या हुआ और अब नीलेकणी नया क्या करेंगे?

नई टास्कफोर्स का पहला काम यह जांचना होना चाहिए कि परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए पहले दिए गए विशेषज्ञों के सुझाव आखिर लागू क्यों नहीं किए गए

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नंदन नीलेकणी (फाइल फोटो)
अपडेटेड 3 अगस्त , 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 जुलाई को इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में एक हाई-पावर्ड टास्कफोर्स बनाने की घोषणा की. इसका उद्देश्य राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की तरफ से आयोजित परीक्षाओं में सुधार के सुझाव देना है. प्रधानमंत्री ने कहा है कि तकनीक आधारित इस बदलाव से परीक्षा प्रणाली भरोसेमंद, पारदर्शी और तकनीक-सक्षम बनेगी. साथ ही परीक्षा आयोजित करने वाली NTA में संरचनात्मक बदलाव भी किए जाएंगे.

इस टास्कफोर्स में इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ, इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक तपन डेका, IIT मद्रास के निदेशक वी. कामाकोटी, पूर्व शिक्षा सचिव अनीता करवाल और लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ अमृत लाल मीणा शामिल हैं. यह घोषणा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के एक दिन बाद हुई. इसके अगले दिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह राष्ट्रीय मेडिकल प्रवेश परीक्षा यानी NEET को कंप्यूटर आधारित परीक्षा बनाने के मुद्दे पर इस पैनल की राय लेगा.

पहली नजर में यह हालिया NEET-UG पेपर लीक पर सरकार की मजबूत प्रतिक्रिया लगती है. लेकिन सरकार की समस्या विशेषज्ञ सलाह की कमी नहीं है. उसके पास पहले से ही सुधार के दो विस्तृत खाके मौजूद हैं. पहला 2024 की के. राधाकृष्णन समिति की रिपोर्ट और दूसरा 2025 की संसदीय स्थाई समिति की रिपोर्ट. दोनों ने NTA की कमजोरियों की पहचान की थी और परीक्षा लीक रोकने के लिए ठोस सुझाव दिए थे. लेकिन इनमें से कई सिफारिशें अब तक लागू नहीं हुई हैं. ऐसे में सवाल यह है कि तीसरा पैनल ऐसा क्या खोजेगा जो पहले दो पैनल नहीं खोज पाए?

भारत सरकार की एजेंसी NTA देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करती है. इनमें इंजीनियरिंग कॉलेजों के लिए JEE, विश्वविद्यालयों के लिए CUET और मेडिकल में ग्रेजुएशन लेवल पर एडमिशन के लिए NEET-UG शामिल हैं. इनमें NEET सबसे संवेदनशील परीक्षा मानी जाती है क्योंकि एक ही परीक्षा 20 लाख से ज्यादा मेडिकल अभ्यर्थियों का भविष्य तय करती है.

3 मई को आयोजित NEET-UG परीक्षा रद्द करनी पड़ी क्योंकि लीक हुई सामग्री का बड़ा हिस्सा असली प्रश्नपत्र से मेल खाता था. बताया गया कि हाथ से लिखे गए 'गेस पेपर' के लगभग 120 सवाल परीक्षा में पूछे गए थे. NTA ने 12 मई को देशभर में परीक्षा रद्द कर दी और 21 जून को दोबारा परीक्षा कराई.

पेपर कहां से लीक हुआ, यह बेहद महत्वपूर्ण है. 2024 की तरह इस बार प्रश्नपत्र किसी प्रिंटिंग प्रेस, कूरियर वैन या स्ट्रॉन्गरूम से गायब नहीं हुआ. यह सबसे ऊपरी स्तर से बाहर आया, जहां प्रश्न तैयार और अनुवाद किए जाते हैं. यह चूक और भी गंभीर है क्योंकि राधाकृष्णन समिति ने इसी तरह की कमजोरी को लेकर पहले ही चेतावनी दी थी.

2024 के NEET-UG विवाद के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने इसरो के पूर्व अध्यक्ष के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में सात सदस्यीय उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति बनाई थी. समिति ने 23 दिन की पूर्ण बैठकें कीं, 37 हजार से अधिक लोगों के फीडबैक का अध्ययन किया और अक्टूबर 2024 में 101 सिफारिशें सौंपीं. इसके दायरे में प्रश्नपत्र तैयार करना, डेटा सुरक्षा, प्रश्नपत्र का परिवहन, परीक्षा केंद्र, NTA की आंतरिक संरचना और तकनीक शामिल थे. इसके बाद सरकार ने नवंबर 2024 में इन सिफारिशों के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए एक हाई-पावर्ड स्टीयरिंग कमेटी बनाई.

राधाकृष्णन समिति ने प्रश्नपत्र तैयार करने को लेकर बेहद स्पष्ट सुझाव दिए थे. समिति ने भरोसेमंद और सत्यापित विशेषज्ञों का समूह बनाने, प्रश्नपत्र तैयार करने वालों और उसकी जांच करने वालों के चयन के स्पष्ट नियम बनाने, हितों के टकराव की घोषणा अनिवार्य करने और गोपनीयता समझौते लागू करने की सिफारिश की थी. सुझाव था कि प्रश्नपत्र तैयार करने वाले विशेषज्ञ अपने होम टाउन में काम न करें. अलग-अलग टीमें कई प्रश्नपत्र तैयार करें और भाषा विशेषज्ञ यह प्रमाणित करें कि सामग्री किसी बाहरी व्यक्ति ने नहीं देखी है. समिति ने बड़े प्रश्न बैंक बनाने का भी सुझाव दिया था, जिनसे सुरक्षित और रैंडम प्रक्रिया के जरिए प्रश्नपत्र तैयार किए जाएं. इससे किसी एक विशेषज्ञ और अंतिम प्रश्नपत्र के बीच सीधा संबंध खत्म हो जाता.

ये सुझाव उसी चरण को सुरक्षित बनाने के लिए थे, जहां 2026 में कथित तौर पर पेपर लीक हुआ. दस्तावेजों में दर्ज जांच के अनुसार, कुछ विशेषज्ञ एक साथ प्रश्नपत्र तैयार करने और उसका अनुवाद करने दोनों काम कर रहे थे. इससे एक छोटे समूह को परीक्षा के बड़े हिस्से तक पहुंच मिल गई. अगर भूमिकाओं का अलग-अलग बंटवारा, हितों के टकराव की जांच, सुरक्षित प्रश्न बैंक और रैंडम चयन जैसी सिफारिशें लागू होतीं, तो कथित अंदरूनी लोगों को शायद यह पता ही नहीं चलता कि अंतिम प्रश्नपत्र में कौन से सवाल होंगे. ऐसे में लीक रोका जा सकता था या कम से कम उसका दायरा काफी सीमित हो सकता था.

फिर भी सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती सुधार अधूरे रह गए. सत्यापित विशेषज्ञों का प्रस्तावित समूह, सुरक्षित प्रश्नपत्र तैयार करने की व्यवस्था, नियंत्रित पहुंच वाली गोपनीय प्रक्रिया और छेड़छाड़-रोकने वाली वितरण प्रणाली लागू नहीं की गई. कंप्यूटर असिस्टेड सिक्योर पेन-एंड-पेपर सिस्टम भी लागू नहीं हुआ जिसमें एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र परीक्षा केंद्रों तक इलेक्ट्रॉनिक रूप से भेजे जाते और परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले प्रिंट किए जाते.

इस साल पेपर लीक के बाद सरकार ने घोषणा की है कि अगले साल से कंप्यूटर बेस्ड परीक्षा शुरू की जाएगी. बहुत बड़ी परीक्षाओं के लिए मल्टी-सेशन टेस्टिंग और मल्टी-स्टेज NEET की व्यवस्था भी अभी तक लागू नहीं हुई है. ये दोनों कदम पहले से प्रश्नपत्र तक पहुंच की संभावना कम करते और किसी एक प्रश्नपत्र के लीक होने से पूरी राष्ट्रीय परीक्षा प्रभावित नहीं होती.

राधाकृष्णन समिति की 101 सिफारिशों में से सरकार ने सभी स्वीकार कर ली थीं. इनमें 57 पूरी तरह लागू हो चुकी हैं. 10 आंशिक रूप से लागू हैं, तीन पर काम चल रहा है, चार की घोषणा हो चुकी है और 27 अब भी लंबित हैं. सबसे तेजी से लागू किए गए कदम वे थे जो दिखने वाले और लॉजिस्टिक्स से जुड़े थे. जैसे आधार प्रमाणीकरण, बायोमेट्रिक दोबारा सत्यापन, सरकारी स्वामित्व वाले परीक्षा केंद्र और AI आधारित CCTV निगरानी.

जो कदम टाले गए, वे संरचनात्मक थे. इनमें बहुत बड़ी परीक्षाओं के लिए मल्टी-सेशन टेस्टिंग, मल्टी-स्टेज NEET-UG और वह हाइब्रिड मॉडल शामिल था, जिसमें एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र डिजिटल रूप से भेजे जाते और परीक्षा केंद्र पर प्रिंट किए जाते. 2025 के लिए किए गए सुधारों ने लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को तो मजबूत किया, लेकिन प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया लगभग जस की तस रही. 2026 में सिस्टम की सबसे बड़ी विफलता भी इसी स्तर पर हुई. संसद भी पहले ही चेतावनी दे चुकी थी.

शिक्षा संबंधी संसदीय स्थाई समिति, जिसकी अध्यक्षता दिग्विजय सिंह कर रहे थे, ने 8 दिसंबर 2025 को अपनी 371वीं रिपोर्ट पेश की थी. समिति ने पाया कि 2024 में NTA की तरफ से आयोजित 14 प्रतियोगी परीक्षाओं में से कम से कम पांच गंभीर समस्याओं का शिकार हुईं. UGC-NET, CSIR-NET और NEET-PG स्थगित करनी पड़ीं. NEET-UG में पेपर लीक हुआ और CUET के नतीजों में देरी हुई. समिति ने साफ कहा कि NTA का प्रदर्शन 'ज्यादा भरोसा पैदा नहीं करता' और समिति ने एजेंसी से अपनी व्यवस्था सुधारने को कहा क्योंकि ये विफलताएं टाली जा सकती थीं.

समिति ने यह भी सिफारिश की कि प्रश्नपत्र तैयार करने, परीक्षा संचालन या मूल्यांकन में गड़बड़ी करने वाली कंपनियों की देशव्यापी ब्लैकलिस्ट बनाई जाए. उसने संसद में हर साल रिपोर्ट पेश करने और प्राइवेट वेंडर्स पर कड़ा नियंत्रण रखने की भी मांग की. लेकिन जून 2026 में शिक्षा मंत्रालय की ओर से RTI के जवाब में कहा गया कि ऐसी किसी राष्ट्रीय ब्लैकलिस्ट की जानकारी उसके पास नहीं है.

RTI के जवाब NTA की आंतरिक कमजोरियों को और स्पष्ट करते हैं. 1 जनवरी 2024 से 1 जून 2026 के बीच 30 महीनों में NTA की गवर्निंग बॉडी की केवल दो बैठकें हुईं. एजेंसी ने गोपनीयता का हवाला देते हुए इन बैठकों की कार्यवाही सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया. 39 स्वीकृत स्थाई पदों में से केवल 24 भरे गए थे. 15 प्रमुख राष्ट्रीय परीक्षाएं आयोजित करने के लिए एजेंसी 73 संविदा कर्मचारियों और 124 आउटसोर्स कर्मचारियों पर निर्भर थी. 13 स्वीकृत निदेशक पदों में से केवल चार भरे गए थे. करोड़ों छात्रों का भविष्य तय करने वाली एजेंसी बड़े पैमाने पर खाली पदों और अस्थाई कर्मचारियों के भरोसे चल रही थी.

समिति ने यह भी बताया कि NTA के पास धन की कमी नहीं थी. छह वर्षों में एजेंसी ने परीक्षा शुल्क के रूप में लगभग 3,512.98 करोड़ रुपए जुटाए और 3,064.77 करोड़ रुपए खर्च किए. इसके बाद भी उसके पास लगभग 448 करोड़ रुपए का सरप्लस बचा. समिति ने सिफारिश की कि इस राशि का उपयोग NTA की अपनी परीक्षा क्षमता विकसित करने या सर्विस प्रोवाइडर की निगरानी बेहतर करने में किया जाए. 22 जुलाई को राज्यसभा में दिए गए जवाब के अनुसार, 2019-20 से 2023-24 के बीच एजेंसी की बचत करीब 520 करोड़ रुपए रही. इसके बावजूद RTI में सामने आई संस्थागत कमियों को दूर करने के लिए इस धन का उपयोग नहीं किया गया. एजेंसी अब भी स्थाई कर्मचारियों की कमी और आउटसोर्स कर्मचारियों पर निर्भरता से जूझ रही है.

ऐसे में नई टास्कफोर्स का गठन तब तक ज्यादा मायने नहीं रखता जब तक उसका पहला काम यह जांचना न हो कि पहले की सिफारिशें लागू क्यों नहीं हुईं. नीलेकणी समिति एक भी नई सिफारिश लिखने से पहले एक पुराने सवाल का जवाब तलाशे. आखिर पिछली 101 सिफारिशें पर्याप्त क्यों साबित नहीं हुईं?
 

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