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विदेश में दाखिले के लिए अब नए दौर के अंग्रेजी टेस्ट आए!

AI आधारित इंटरव्यू से लेकर एडैप्टिव टेस्टिंग तक, विदेश में पढ़ाई का सपना देखने वालों के लिए अंग्रेजी दक्षता की परीक्षाएं अब रटकर सीखने की बजाय बातचीत की क्षमता पर आधारित होती जा रही हैं

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 7 जुलाई , 2026

विदेश में पढ़ाई का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों के लिए अंग्रेजी भाषा की परीक्षा सिर्फ एक ऐसी औपचारिकता होती थी जिसे किसी तरह पूरा करना होता था. हालांकि अब यह सोच बदलने लगी है.

अब विश्वविद्यालय सिर्फ यह नहीं देखना चाहते कि कोई छात्र अंग्रेजी भाषा की परीक्षा पास कर सकता है या नहीं. वे यह भी जानना चाहते हैं कि क्या छात्र लेक्चर समझ सकता है और कक्षा की डिबेट में भाग ले सकता है.

विदेशी विश्वविद्यालय यह भी जांचना चाहते हैं कि उनके यहां आने वाले छात्र असाइनमेंट लिख सकता है और कैंपस की जिंदगी में आत्मविश्वास के साथ खुद को ढाल सकता है या नहीं. वहीं, छात्र भी चाहते हैं कि परीक्षाएं तेज, आसान और उस डिजिटल दुनिया के अनुरूप हों, जिसमें वे बड़े हुए हैं.

जब दोनों पक्षों की अपेक्षाएं बदल रही हैं तो भाषा की परीक्षाएं भी बदल रही हैं. विदेश में पढ़ाई के लिए इच्छुक छात्रों के लिए दो मुख्य परीक्षा 'टेस्ट ऑफ इंग्लिश एज ए फॉरेन लैंग्वेज' (TOEFL) और 'ग्रेजुएट रिकॉर्ड एग्जामिनेशन' (GRE) को कराने वाली संस्था ईटीएस के दक्षिण एशिया के कार्यकारी निदेशक करण ललित हैं. करण ललित कहते हैं, "आज के समय में मूल्यांकन सिर्फ प्रवेश पाने के लिए नहीं है. यह छात्रों को यह समझने में मदद करता है कि वे पढ़ाई में सफल होने और आगे चलकर अच्छा करियर बनाने के लिए कितने तैयार हैं."

कुछ साल पहले तक कई छात्र भाषा परीक्षा को सिर्फ एक जरूरी औपचारिकता मानते थे. आज इसे अकादमिक तैयारी का पैमाना माना जा रहा है. आखिरकार, विश्वविद्यालय में दाखिला मिलना सिर्फ शुरुआत है. जो छात्र लेक्चर समझने, चर्चा में भाग लेने या लिखित असाइनमेंट पूरा करने में कठिनाई महसूस करते हैं, उनके लिए विदेश के विश्वविद्यालय में खुद को ढालना उम्मीद से कहीं ज्यादा मुश्किल हो सकता है. इसलिए मूल्यांकन करने वाली संस्थाएं अब व्याकरण और शब्दावली के बजाय व्यवहारिक संवाद कौशल पर ज्यादा जोर दे रही हैं.

पिछले एक दशक में छात्रों का समूह भी काफी बदल गया है और परीक्षाएं भी उसी के अनुसार बदल रही हैं. अब डिजिटल अनुभव कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं बल्कि एक उम्मीद बन चुका है. लंबी कागजी परीक्षाओं को कंप्यूटर पर कराने की बजाय अब आधुनिक भाषा परीक्षाएं शुरू से ही डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए तैयार की जाती हैं. ये छोटी होती हैं, इस्तेमाल में आसान होती हैं और इनके नतीजे भी पहले की तुलना में कहीं जल्दी मिल जाते हैं.

ललित कहते हैं, "छात्र तेजी और पारदर्शिता चाहते हैं. वे यह जानना चाहते हैं कि उनका मूल्यांकन किन आधारों पर हो रहा है और वे परिणाम के लिए लंबे समय तक इंतजार नहीं करना चाहते." सबसे बड़ा बदलाव एडैप्टिव टेस्टिंग के रूप में आया है.

पारंपरिक परीक्षा में हर छात्र को लगभग एक जैसे सवाल मिलते हैं लेकिन एडैप्टिव परीक्षा अलग तरीके से काम करती है. जैसे-जैसे छात्र सवालों के जवाब देते हैं, सिस्टम उनके प्रदर्शन के आधार पर सवालों की कठिनाई का स्तर बदलता रहता है. इसका उद्देश्य परीक्षा को आसान बनाना नहीं, बल्कि छात्र की वास्तविक क्षमता को ज्यादा सही तरीके से समझना है.

ललित बताते हैं, "अगर कोई छात्र एक निश्चित स्तर पर प्रदर्शन कर रहा है तो उसे सिर्फ इसलिए नुकसान नहीं होना चाहिए कि अचानक उससे उसकी क्षमता से कहीं ज्यादा कठिन सवाल पूछ लिए जाएं." इसका परिणाम एक अधिक व्यक्तिगत मूल्यांकन के रूप में सामने आता है, जिसका उद्देश्य बिना अनावश्यक दबाव बनाए छात्र की भाषा दक्षता को मापना है.

AI अब शिक्षा के लगभग हर क्षेत्र का हिस्सा बनता जा रहा है और भाषा परीक्षाएं भी इससे अलग नहीं हैं. इसका एक उदाहरण स्पीकिंग टेस्ट है. अब छात्रों को किसी इंसान के सामने बैठने की बजाय AI इंटरव्यूअर के साथ बातचीत करनी होती है, जो उनसे व्यवहारिक और बातचीत जैसे सवाल पूछता है. किसी अनजान विषय पर बात करने के बजाय छात्रों से उन जगहों, अनुभवों या रोजमर्रा की स्थितियों के बारे में पूछा जा सकता है, जिनसे वे आसानी से जुड़ सकें.

इसका उद्देश्य साफ है. परीक्षा यह नहीं जानना चाहती कि छात्र किसी विषय के बारे में कितना जानता है. वह यह समझना चाहती है कि छात्र अंग्रेजी में स्वाभाविक रूप से बातचीत कर सकता है या नहीं. AI के इस्तेमाल से प्रक्रिया में एकरूपता भी बनी रहती है. इससे हर छात्र एक जैसी प्रक्रिया से गुजरता है और मूल्यांकन पर किसी इंसान की व्यक्तिगत सोच या पक्षपात का असर नहीं पड़ता.

भाषा परीक्षाएं अब विश्वविद्यालय के वास्तविक जीवन के ज्यादा करीब होती जा रही हैं. लंबे और काल्पनिक विषयों पर निबंध लिखने की बजाय अब छात्रों से ईमेल लिखने या किसी शैक्षणिक चर्चा में अपनी बात रखने जैसे काम कराए जा सकते हैं. ये वही काम हैं, जिनका सामना उन्हें विदेश में पढ़ाई शुरू करने के बाद करना पड़ सकता है. यह बदलाव इस बात को भी दिखाता है कि संवाद का तरीका बदल रहा है.

आज के छात्र लंबे औपचारिक निबंधों की तुलना में ईमेल, संदेश और मिलकर लिखे जाने वाले जवाब ज्यादा लिखते हैं. इसलिए परीक्षाएं भी धीरे-धीरे इस वास्तविकता को स्वीकार कर रही हैं. हालांकि, AI परीक्षा की तैयारी में मदद कर सकता है लेकिन परीक्षा के दौरान उसकी कोई जगह नहीं है.

छात्रों को तैयारी के समय व्याकरण सुधारने, लेखन का अभ्यास करने या शब्दावली मजबूत करने के लिए AI टूल्स इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. हालांकि, परीक्षा शुरू होने के बाद इन टूल्स का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित रहता है.

ललित कहते हैं, "स्कोर से छात्र की क्षमता का पता चलना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होगा तो यह निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं माना जाएगा." सुरक्षित परीक्षा व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि छात्र लेखन से जुड़े सभी कार्य खुद करें ताकि विश्वविद्यालय परिणामों पर भरोसा कर सकें.

भारत के महानगरों से बाहर के कई छात्रों के लिए आत्मविश्वास के साथ अंग्रेजी बोलना चुनौतीपूर्ण लग सकता है लेकिन ललित का मानना है कि यह चिंता अक्सर बेवजह होती है. आधुनिक परीक्षाएं किसी खास लहजे या पूरी तरह सही व्याकरण को महत्व देने के लिए नहीं बनाई गई हैं. सबसे अहम बात यह है कि छात्र अपनी बात साफ तरीके से कह सके और सामने वाले की बात समझ सके. वे कहते हैं, "अगर आपकी बातचीत प्रभावी है तो परीक्षा उसी को देखती है."

इससे छोटे शहरों के छात्रों के लिए प्रक्रिया ज्यादा निष्पक्ष हो जाती है. भले ही उन्हें बोलचाल की अंग्रेजी का उतना अनुभव न मिला हो लेकिन अगर उनमें अंतरराष्ट्रीय कक्षा में सफल होने की क्षमता है तो वे अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं.

तकनीक ने भाषा परीक्षाओं को बदल दिया है लेकिन एक सलाह आज भी वही है, तैयारी जल्दी शुरू करें. मॉक टेस्ट छात्रों को परीक्षा का प्रारूप समझने, अपनी कमजोरियां पहचानने और परीक्षा से पहले आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद करते हैं. आधिकारिक तैयारी सामग्री भी उन्हें यह समझने में मदद करती है कि परीक्षा में क्या अपेक्षित है.

आखिर में, सबसे अच्छी भाषा परीक्षा वह नहीं है जो सिर्फ एक स्कोर दे, बल्कि वह है जो छात्रों में भरोसा दे. भरोसा ऐसा कि जब वे अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर किसी विश्वविद्यालय के लेक्चर हॉल में प्रवेश करेंगे तो वे सिर्फ बातचीत समझने के लिए नहीं, बल्कि उसका हिस्सा बनने के लिए भी पूरी तरह तैयार हों.

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