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जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से पीछे हटने को तैयार क्यों नहीं CJP?

केंद्र सरकार ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाकर रामलीला मैदान, बुराड़ी और शाहदरा में विकल्प दिए हैं

जुलाई में जंतर-मंतर पर हुआ CJP का विरोध प्रदर्शन
अपडेटेड 14 अक्टूबर , 2026

केंद्र सरकार ने दो दशक पुराने नियम को पलटते हुए दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शनों के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित कर दिया. इसके 24 घंटे भी नहीं बीते थे कि 13 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सदस्यों ने आदेश की खुलेआम अवहेलना की. वे राष्ट्रीय ध्वज लेकर बैरिकेडिंग वाले इलाके में घुस गए. इसके बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया.

CJP ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने और धरना-प्रदर्शन के लिए तीन वैकल्पिक जगहें दिए जाने के विरोध में यह कदम उठाया. इन जगहों में रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और शाहदरा का सीबीडी मैदान शामिल हैं.

CJP के संस्थापक और राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके ने कहा, "आप विरोध की आवाज को अधिसूचना रद्द करके नहीं मिटा सकते. जंतर-मंतर नक्शे पर मौजूद महज एक जगह नहीं है. यहां नागरिक सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछने के लिए जुटते रहे हैं. कोई भी प्रशासनिक आदेश लोकतंत्र की इस भावना को खत्म नहीं कर सकता."

13 अक्टूबर की सुबह CJP के सह-संयोजक आशुतोष रांका और सौरव दास, राष्ट्रीय संगठन प्रभारी अजिंक्य शिंदे और संगठन के अन्य सदस्य जंतर-मंतर इलाके में पहुंचे. पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया.

जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की अधिसूचित सूची से हटाने का फैसला इसलिए भी अहम है, क्योंकि 30 साल से अधिक समय पहले इंडिया गेट के पास बोट क्लब के लॉन में प्रदर्शनों पर रोक लगने के बाद जंतर-मंतर दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र बन गया था.

13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर पहुंचे आशुतोष रांका और सौरव दास
13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर पहुंचे आशुतोष रांका और सौरव दास

आजादी के बाद कई दशकों तक राजपथ (अब कर्तव्य पथ) के किनारे स्थित बोट क्लब के लॉन भारत में राजनीतिक विरोध-प्रदर्शनों के सबसे पहचाने जाने वाले स्थलों में से एक थे. ऐतिहासिक महत्व के अलावा उनकी भौगोलिक स्थिति भी अहम थी. प्रदर्शनकारी केंद्र सरकार के लगभग दरवाजे पर अपनी बात रख सकते थे.

इन लॉन में देश के कई बड़े राजनीतिक आंदोलन हुए. भारतीय किसान यूनियन के नेता महेंद्र सिंह टिकैत 1988 में किसानों को लेकर दिल्ली के केंद्र में पहुंचे थे. वहां कई दिनों तक आंदोलन चला. राजनीतिक दलों, ट्रेड यूनियनों, किसानों और अन्य संगठनों की रैलियों के लिए भी यह जगह अक्सर इस्तेमाल होती थी.

1993 में यह स्थिति बदल गई. अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ गई थीं. इसी दौरान दिल्ली में BJP की ओर से बड़े प्रदर्शन की तैयारी भी थी. इन परिस्थितियों के बीच पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने बोट क्लब के लॉन में प्रदर्शनों पर रोक लगा दी. इसके बाद धीरे-धीरे विरोध-प्रदर्शन जंतर-मंतर की ओर जाने लगे.

अगले 30 से अधिक वर्षों में जंतर-मंतर विरोध-प्रदर्शनों का गढ़ बन गया. यहां भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, वन रैंक वन पेंशन के लिए प्रदर्शन, किसानों के कई आंदोलन, महिला पहलवानों का धरना और छात्रों व मजदूरों के अनगिनत प्रदर्शन हुए.

बड़ी खबरें बनने वाले आंदोलनों के अलावा जंतर-मंतर लगभग स्थाई प्रदर्शन स्थल बन गया. आम दिनों में भी सड़क के अलग-अलग हिस्सों में पेंशनभोगियों, नौकरी से निकाले गए कर्मचारियों, किसानों, कार्यकर्ताओं और परिवारों के छोटे-छोटे समूह सरकार से मदद की मांग करते दिख जाते थे. कुछ लोग अस्थाई ठिकाने बनाकर हफ्तों या महीनों तक वहां रहते थे.

बोट क्लब पर धरना देते किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत (फाइल फोटो)
बोट क्लब पर धरना देते किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत (फाइल फोटो)

जंतर-मंतर की सीमित जगह भी उसकी उपयोगिता की एक वजह थी. वहां किसी प्रदर्शन को लोगों की नजर में लाने के लिए हजारों लोगों की जरूरत नहीं पड़ती थी. संसद और सरकारी मंत्रालयों की इमारतें भी पास में थीं. प्रदर्शनकारियों के लिए उतना महत्व होना जरूरी नहीं है. इसी वजह से सरकार की ओर से सुझाए गए वैकल्पिक स्थल प्रदर्शनकारियों के लिए जंतर-मंतर जितने उपयोगी नहीं हैं.

रामलीला मैदान लंबे समय से राजनीतिक सभाओं का पारंपरिक स्थल रहा है और यहां बड़े पैमाने पर प्रदर्शन भी हुए हैं. लेकिन इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से बड़े आयोजनों के लिए होता है. यहां आयोजन मुफ्त नहीं होते, शुल्क देना पड़ता है और धार्मिक, सांस्कृतिक समेत कई तरह के कार्यक्रम भी होते हैं. ऐसे में 50 छात्रों या कुछ सौ मजदूरों के लिए अचानक प्रदर्शन करना यहां बिल्कुल अलग मामला है.

बुराड़ी मैदान के मामले में भी जगह के आकार और उसकी स्थिति से जुड़ी चुनौतियां हैं. इस विशाल मैदान में हजारों लोग जुट सकते हैं लेकिन यह संसद और प्रशासनिक केंद्र से काफी दूर है. जंतर-मंतर पर कुछ सौ प्रदर्शनकारी भी आसानी से लोगों का ध्यान खींच सकते हैं जबकि बुराड़ी के विशाल मैदान में वे गुम हो जाएंगे.

शाहदरा का सीबीडी मैदान भी उन जगहों में शामिल नहीं है जहां प्रदर्शनकारी आम तौर पर अपनी बात लोगों और सरकार तक पहुंचाने के लिए दिल्ली आते हैं. इसके आसपास रिहायशी और व्यावसायिक इलाके भी हैं.

आखिर प्रदर्शन की जगह क्यों मायने रखती है? CJP की राष्ट्रीय नीति प्रमुख और राष्ट्रीय प्रवक्ता मेहर पसरीचा कहती हैं कि प्रदर्शन का मकसद अपनी बात लोगों तक पहुंचाना और सुनाना है. खासकर उन संस्थानों तक, जिनके खिलाफ प्रदर्शन किया जा रहा हो. उन्होंने कहा कि प्रदर्शनों को सत्ता के केंद्रों से कई किलोमीटर दूर ले जाने से उनके उद्देश्य का बड़ा हिस्सा खत्म हो जाता है.

पसरीचा ने कहा, "अगर प्रदर्शन से किसी पर कोई असर ही नहीं पड़ता और हमें सत्ता के केंद्रों से कई किलोमीटर दूर जाकर प्रदर्शन करना है तो फिर हम अपने घरों में बैठकर ही विरोध क्यों न करें?"

आशुतोष रांका ने भी इस बात से सहमति जताई. उन्होंने कहा, "आप नागरिकों से यह नहीं कह सकते कि प्रदर्शन करने की अनुमति के लिए अधिकारियों के पास जाएं और फिर जब वे अनुमति मांग रहे हों उसी दौरान नियम बदल दें."

CJP के मुताबिक, उसने 12 अक्टूबर को संसद मार्ग थाने को पत्र लिखकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए तारीख और समय मांगा था. संगठन ने 24 घंटे के भीतर जवाब देने का अनुरोध किया था. उसी दिन जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की अधिसूचित सूची से हटाए जाने का फैसला सामने आया. अगले दिन CJP के सदस्यों ने जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराया और संदेश दिया कि यह जगह अब भी ‘जनता की’ है.

सुरक्षा, यातायात और सार्वजनिक जगहों के अलग-अलग इस्तेमाल को लेकर सरकार और पुलिस की अपनी जायज जिम्मेदारियां हैं. सुप्रीम कोर्ट भी पहले जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के अधिकार और वहां रहने वाले लोगों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के मुद्दे पर फैसला सुना चुका है.

लेकिन जंतर-मंतर की खासियत यह है कि वह शुरू से ही सत्ता के केंद्र के करीब रहा है. वहां कुछ नागरिक भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकते हैं और उनकी बात पर ध्यान दिया जा सकता है. दूसरे प्रदर्शन स्थलों पर पर्याप्त जमीन उपलब्ध होने भर से यह सुविधा नहीं मिल सकती.

इस लिहाज से मौजूदा विवाद में इतिहास खुद को दोहराता दिख रहा है. 1990 के दशक में दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को बोट क्लब से जंतर-मंतर की ओर भेजा गया था. अब 30 साल से अधिक समय बाद उन्हें फिर दूसरी जगह जाने को कहा जा रहा है लेकिन इस बार उन्हें राजनीतिक सत्ता के केंद्र से और दूर जाना होगा.

CJP ने इस फैसले का विरोध जारी रखने का संकल्प लिया है. पसरीचा के शब्दों में, सरकार को "इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि हम पीछे हट जाएंगे."

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